अनुराधा ने छोड़ा मुलायम का साथ, वजह बने आजम!
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समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव अनुराधा चौधरी ने नगर विकास मंत्री आजम खां पर निशाना साधते हुए शुक्रवार को महासचिव पद और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफे का ऐलान कर दिया।
उन्होंने सपा की बदहाली के लिए आजम खां को जिम्मेदार ठहराया। मुजफ्फरनगर दंगे, कानून व्यवस्था और किसानों के मुद्दों पर उन्होंने सरकार को कटघरे में खड़ा किया।
कहा, अगली रणनीति का ऐलान समर्थकों से विचार-विमर्श के बाद किसानों के बीच जाकर करेंगी। पूर्व मंत्री एवं पूर्व अध्यक्ष अनुराधा चौधरी 2012 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राष्ट्रीय लोकदल छोड़कर सपा में शामिल हुई थीं।
बिजनौर से थीं प्रत्याशी
सपा ने उन्हें बिजनौर लोकसभा सीट से प्रत्याशी बनाया गया था। बाद में उनका टिकट बदलकर शाहनवाज राणा को उम्मीदवार बना दिया गया था।
इसके बाद उन्हें विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग का अध्यक्ष बनाकर कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया था। तीन दिन पहले उन्हें इस ओहदे से हटा दिया गया।
इससे आहत अनुराधा चौधरी ने शुक्रवार को सपा और महासचिव पद छोड़ने का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव में सपा की शर्मनाक पराजय हुई है। पार्टी पहले 40 सीट जीतने का दावा कर रही थी।
मतदान होने के बाद यह दावा 15 सीटों तक सिमट गया था। नतीजे आए तो केवल पांच लोकसभा सीटों पर जीत हासिल हुई है।
आजम खां हैं हार के लिए जिम्मेदार
उन्होंने पार्टी की दुर्गति के लिए आजम खां को जिम्मेदार ठहराया। कहा कि पार्टी और सरकार में उनका दखल सपा को भारी पड़ा। मुजफ्फरनगर में आजम खां के दखल देने से स्थिति बिगड़ी।
सरकार चाहती तो समय से स्थिति को संभाल सकती था। दंगे को भी नियंत्रित किया जा सकता था। चुनाव के दौरान उन्होंने कारगिल शहीदों को लेकर विवादित बयान दिया।
चुनाव आयोग ने उन पर पाबंदी लगाई तो आयोग के खिलाफ ही प्रदर्शन कराने लगे। उनके इस रुख को लोगों ने पसंद नहीं किया। पार्टी में संदेश गया कि पश्चिमी यूपी में आजम खां के अलावा किसी और की नहीं सुनी जाती।
जबकि सपा का आम कार्यकर्ता भी आजम खां के रवैये से नाखुश है। उन्होंने कहा कि सपा को मुजफ्फरनगर दंगे, किसानों के मुद्दों की अनदेखी और कानून व्यवस्था ठीक न होने का खामियाजा भुगतना पड़ा।
सपाईयों ने कहा वो अवसरवादी
सपा के पूर्व प्रदेश सचिव और उत्तर प्रदेश बीज विकास निगम के उपाध्यक्ष राजपाल सिंह ने कहा कि अच्छा हुआ अनुराधा खुद ही पार्टी से चली गईं। वह विचार और आचरण से कभी समाजवादी नहीं रहीं।
पहले वह भाजपा में थी और फिर रालोद में आ गईं। पिछले विधानसभा चुनाव से पहले सपा में शामिल हो गईं। उनके जाने से पार्टी पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, उल्टे इसका अच्छा संदेश जाएगा।
अनुराधा जैसे अवसरवादी नेताओं के लिए सपा में जगह नहीं होनी चाहिए। गौरतलब है कि हार के बाद पार्टी सदस्य एक दूसरे पर निशाना साध रहे हैं और उनके आपसी मतभेद खुलकर नजर आ रहे हैं।