अगर आपको भी हो रही है ऐसी खांसी तो जल्द से जल्द कराएं जांच
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शुरुआती एक से डेढ़ साल खांसी-बलगम, इसके बाद सीढ़ियां चढ़ने में सांस फूलना और सांस लेने में आवाज आती हो तो ये सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) के लक्षण हैं। यह फेफड़ों की गंभीर बीमारी है। इसमें फेफड़े पूरी तरह से खराब हो जाते हैं और काम करना बंद कर देते हैं।
सिगरेट पीने, चूल्हे में खाना बनाने वाली महिलाओं, ट्रैफिक सिपाहियों, पेट्रोल पंप कर्मियों और हलवाइयों को ये बीमारी ज्यादा होती है। इसलिए ऐसे कोई भी लक्षण हो तो मरीज को इन सब जगहों पर जाने से बचना चाहिए। विश्व सीओपीडी दिवस के मौके पर केजीएमयू के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के हेड प्रो. सूर्यकांत और डॉ. बीपी सिंह ने एक स्थानीय होटल में आयोजित वर्कशॉप में ये जानकारी दी।
प्रो. सूर्यकांत ने बताया कि अस्थमा जन्मजात होने वाली बीमारी है, जबकि सीओपीडी बीमारी हमारी लापरवाही से होती है। इसमें सांस की नलियां सिकुड़ जाती हैं और उनमें सूजन आ जाता है। मरीज रोजमर्रा के कामों को करने में भी परेशानी महसूस करने लगता है। वक्त रहते इलाज न मिले तो मरीज को अस्पताल में भर्ती करने की नौबत आ जाती है।
उन्होंने बताया कि सीओपीडी की पहचान फेफड़ों के एक्स-रे से नहीं की जा सकती। इसके लिए स्पाइरोमीटरी (फेफड़ों की क्षमता की जांच) ही कारगर है।
डॉक्टरों से जानिए क्या है इस बीमारी का इलाज
सांस की बीमारियों से टीकाकरण से बचा जा सकता है। दो वैक्सीन नीमोकॉकल और इन्फ्लुएंजा से इन बीमारियों से बचा जा सकता है। नीमोकॉकल वैक्सीन की एक डोज और फिर पांच साल बाद बूस्टर डोज से इन बीमारियों से बचा जा सकता है। इसके अलावा इन्फ्लुएंजा का टीका लगवाने से भी सांस के रोगों से बचा जा सकता है। प्रो. सूर्यकांत के अनुसार ये दोनों टीके विशेषज्ञ चिकित्सक के परामर्श से सितंबर और अक्तूबर में लगवाने चाहिए, क्योंकि इसी समय बीमारियों के अटैक का समय होता है।
डॉ. बीपी सिंह
सर्दी में बढ़ती है दिक्कत प्रो. सूर्यकांत ने बताया कि सर्दी की शुरुआत में सीओपीडी दिवस मनाने का कारण यही है कि यह बीमारी इस मौसम में अधिक परेशान करती है। सही इलाज नहीं मिला तो फिर जिंदगी भर खांसने और सांस फूलने की दिक्कत बनी रहती है। जो आगे चलकर जानलेवा साबित होती है।
फेफड़ों की जांच के लिए स्पाइरोमेट्री
प्रो. सूर्यकांत ने बताया कि फेफड़ों में संक्रमण, सांस लेने में दिक्कत, सांस फूलने की शुरुआती दौर में ही जांच कराकर इन्हें गंभीर स्थिति तक पहुंचने से रोका जा सकता है। यह जांच संभव है स्पाइरोमीटर से। सीओपीडी और अस्थमा जैसे पुरानी बीमारियों की जांच स्पाइरोमेट्री से की जा सकती है। इससे फेफड़ों की कार्यप्रणाली और कार्यक्षमता का पता चलता है। डॉ. बीपी सिंह ने बताया कि आधुनिक माइक्रो स्पाइरोमीटर से छह सेकेंड में फेफड़े की जांच कर उसकी स्थिति का पता चल जाता है।
फायदेमंद है इन्हेलर
डॉ. बीपी सिंह ने बताया कि सीओपीडी का प्रभावी इलाज इन्हेलर से संभव है। इन्हेलर से दवा की कम डोज बिना साइड इफेक्ट के सीधे फेफड़ों में जाती है, जबकि खाने वाली दवा पूरे शरीर में फैलती है। इसका साइड इफेक्ट भी होता है। उन्होंने बताया कि सीओपीडी के 20 फीसदी मरीज ही इन्हेलर का प्रयोग कर रहे हैं। भ्रांतियों के कारण लोग इसे इस्तेमाल करने से डरते हैं।