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कहीं फिर न सिर्फ शोभा बनकर रह जाए यूपी प्रभारी का पद, 2013 में अमित शाह ने बदल दी थी सूरत

Wed, 02 Dec 2020 10:26 AM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Wed, 02 Dec 2020 10:26 AM IST
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See the role of UP BJP incharge in Uttar Pradesh.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

भाजपा के फर्श से अर्श पर पहुंचने के 2013 से 2020 तक सात साल की यात्रा में पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राधामोहन सिंह चौथे नेता हैं जिन्हें पार्टी हाईकमान ने उत्तर प्रदेश के मोर्चे पर बतौर प्रभारी नियुक्त किया है। पर मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और समीकरणों को देखते हुए यह सवाल पार्टी के कार्यकर्ताओं के दिमाग में कौंधने लगा है कि उनकी भूमिका क्या होगी। वे अमित शाह और जेपी नड्डा जितने ही प्रभावी प्रभारी होंगे या दूसरे इन पर भारी पड़ेंगे। ये प्रदेश से जुड़े फैसलों का केंद्र दिल्ली के बजाय फिर लखनऊ को बना पाएंगे?

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दरअसल, 2013 में जब अमित शाह को प्रदेश प्रभारी बनाकर उत्तर प्रदेश भेजा गया था, तबसे लेकर 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए भेजे गए प्रभारियों के कालखंड के अलग-अलग प्रसंगों से ये प्रश्न उठ रहा है। साथ ही परिस्थितियों में आया बदलाव भी इस बारे में सवाल कर रहा है। इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि प्रभारियों की प्रदेश में कभी कोई भूमिका नहीं रही है।
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कुशाभाऊ ठाकरे, सुंदर सिंह भंडारी, गोविंदाचार्य से लेकर अमित शाह तक कई ऐसे प्रभारी रहे जिनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जिनके मुंह से निकली बात ही निर्णयों का रूप लेती थी लेकिन ज्यादातर प्रभारियों के मामले में यह बात बिल्कुल उल्टी साबित हुई। सिर्फ प्रभारी बन जाने के कारण भाजपा के प्रदेश से जुड़े फैसलों में कोई प्रभावी नहीं हुआ। उसका कद और राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने उसकी सिफारिशों का वजन ही प्रदेश प्रभारियों की कद-काठी तय करता रहा है।

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अमित शाह के आने तक ये थी यूपी में भाजपा की हालत

वर्ष 2013 में जब अमित शाह को प्रदेश का प्रभारी बनाकर भेजा गया तो उनके पक्ष में जो बात सबसे ज्यादा जाती थी, वह थी प्रदेश में पार्टी की दुर्दशा और गुटबाजी। विधानसभा में पार्टी के 50 से भी कम विधायक थे। लोकसभा में यूपी से सिर्फ 10 सांसद थे।

- प्रदेश में अध्यक्ष से लेकर पदाधिकारियों की भारी-भरकम टीम थी, लेकिन यह संदेश भी सार्वजनिक हो चुका था कि खींचतान और खेमेबाजी के चलते राज्य के किसी नेता के लिए पार्टी को एकजुट करके चुनावी मैदान में उतारना मुश्किल है। ऐसे में शाह जैसी कड़क छवि के नेता को यहां भेजा गया। ऊपर से उनकी पीठ पर उस समय प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित हो चुके नरेंद्र मोदी का हाथ और मोदी को प्रधानमंत्री बनवाने का संकल्प ले चुके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अप्रत्यक्ष भूमिका ने भी शाह को खूब ताकत दी।

- शाह ने इसका ठीक से इस्तेमाल किया और सबसे पहले प्रदेश के जमे-जमाए नेताओं को दूसरी भूमिका में पहुंचाने के साथ फैसलों में उनका हस्तक्षेप खत्म किया। वर्ष 2014 में वह प्रदेश में भाजपा के गठबंधन के साथ 70 से ज्यादा सांसद जिता ले गए तो प्रदेश के नेताओं के मुंह पर ताला लग जाना स्वाभाविक ही था।

आज पूरी तरह अलग हैं समीकरण

शाह के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने पर ओम माथुर को प्रभारी बनाकर यूपी भेजा गया। वह शाह जितने प्रभावी तो नहीं दिखे, फिर भी प्रधानमंत्री मोदी की नजदीकी ने उनका कद बनाए रखा। इसकी एक वजह शाह का राष्ट्रीय अध्यक्ष होना था। शाह राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के बावजूद प्रदेश के फैसलों में दखल रखते थे। एक तरह से यही माना जाता था कि फैसले उन्हीं के हैं। हालांकि इस परिस्थिति के चलते प्रदेश प्रभारी माथुर और प्रदेश में महामंत्री संगठन सुनील बंसल के बीच खींचतान की खबरें भी सार्वजनिक हुईं, लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत ने इस पर पर्दा डाल दिया।

माथुर के बाद जेपी नड्डा प्रदेश प्रभारी बने और उनकी देखरेख में लोकसभा चुनाव हुआ। तब भी शाह ही एक तरह से यूपी से जुड़े फैसलों के केंद्र में रहे। पर, आज वह परिस्थिति नहीं है। प्रदेश में मजबूत सरकार और सुदृढ़ संगठन है। प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह पिछड़े वर्ग के मजबूत नेता और प्रदेश सरकार में मंत्री रहे हैं।

प्रदेश में प्रभारी रहकर राष्ट्रीय अध्यक्ष बने नड्डा खुद शाह की तरह राज्य के निर्णयों में भूमिका निभाते हैं। इसीलिए यह सवाल अहम हो जाता है कि ऐसे में राधामोहन सिंह की प्रभारी के रूप में प्रदेश में भूमिका क्या होगी।

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