कपड़े धोने से मिलेगा छुटकारा, यहां पढ़िए कैसे...
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नैनो-मैटेरियल भविष्य में हमारी जिंदगी को बिल्कुल बदल देंगे। कपड़े धोने की झंझट से छुटकारा मिलेगा और कई अन्य सुविधाओं के चलते हमारी जीवन शैली में बदलाव आएगा। ये जानकारी दी सीडीआरआई से रिटायर्ड वैज्ञानिक व साइंटूनिस्ट डॉ. प्रदीप श्रीवास्तव ने।
वह बृहस्पतिवार को सीमैप और भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र (बार्क), की हिंदी में चल रही राष्ट्रीय वैज्ञानिक संगोष्ठी के दूसरे दिन नैनोमैटेरियल के भविष्य पर व्याख्यान दे रहे थे।
उन्होंने कहा कि नैनोफैब्रिक से बने कपड़ों को कई दिन तक बिना धुले या साफ किए पहना जा सकेगा। इससे मेहनत, साबुन के साथ बेशकीमती पानी भी बचेगा। आधुनिक मानी जा रही एलईडी से भी नई तकनीक नैनोलक्स के बल्ब अगली पीढ़ी के जीवन को और आसान बनाएंगे। इसमें ऊर्जा की बहुत कम खपत होगी।
संगोष्ठी में बार्क के वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. तेजेंद्र प्रसाद चतुर्वेदी ने कहा कि उत्सर्जित विकिरण किसी खास अवसर पर ही उपयोगी होता है। गामा किरणों का प्रयोग विज्ञान और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बहुत उपयोगी है। यह लेकिन तभी तक है जब विकिरण की ऊर्जा और तीव्रता को पूर्व में ही निश्चित कर लिया जाए।
लाइफस्टाइल बना रही हृदय रोगी
केजीएमयू के हृदय रोग विषेषज्ञ प्रो. एसके द्विवेदी ने कहा कि हृदय रोग इसलिए बढ़ रहे हैं क्योंकि लोगों की लाइफस्टाइल में शारीरिक मेहनत की कमी का हो चुकी है। हृदय रोगों से बचना है तो नियमित शारीरिक व्यायाम करना होगा।
खान-पान पर विशेष ध्यान देना चाहिए। उनका कहना था कि संक्रामक रोगों में कमी आई है। इसके उलट लाइफस्टाइल से जुड़े मरीजों की संख्या बढ़ी है। सीमैप के पूर्व निदेशक डॉ. एसपीएस खनुजा ने कहा कि स्वास्थ्य का रास्ता खेतों से ही निकलेगा।
उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि वैज्ञानिक न्यूट्रास्युटिकल्स पर ध्यान दें। यह औषधीय पौधों की खेती और इनसे पौषक खाद्य पदार्थ बनाने के काम को पूरा कर किया जा सकता है।
98 प्रतिशत को नहीं पता कैसे ब्रश करें
केजीएमयू के प्रो. प्रो. विजय शाक्य ने कहा कि 98 प्रतिशत लोगों को ब्रश करने का सही तरीका नहीं पता। इसकी वजह से मुंह के हाइजीन का ध्यान नहीं रख पाते। सही ब्रश करने का तरीका यह है कि नाश्ता, लंच और डिनर के बाद अच्छी तरह से ब्रश करना चाहिए।
राजकीय आयुर्वेद कॉलेज के प्राचार्य प्रो. एके गर्ग ने बताया कि औषधीय पौधों को अगर सब्जी या दूसरे रूप में भोजन में शामिल किया जाए तो काफी हद तक बीमारी से बचा जा सकता है।
..तो दवा वापस ले ली गईं
बंगलुरू से आई वैज्ञानिक डॉ. सोनाली दास ने बताया कि हम दवाओं में टॉक्सिसिटी को नापने केलिए एक नया मॉडल विकसित कर चुके हैं। हेप्टॉक्स नाम से बना यह मॉडल इन सिलिका और इन