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जाने-माने शेफ संजीव कपूर ने बताया, कैसे आता है खाने में स्वाद

Fri, 01 Jul 2016 01:09 PM IST
आलोक पराड़कर/ अमर उजाला, लखनऊ
आलोक पराड़कर/ अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 01 Jul 2016 01:09 PM IST
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sanjeev kapoor interview with amar ujala
लखनऊ में संजीव कपूर - फोटो : amar ujala

संजीव कपूर को इस बात का श्रेय है कि उन्होंने पाक कला के बावर्ची या महाराज कहे जाने वाले रसोइए को न सिर्फ  मास्टर शेफ जैसा खिताब दिलाया बल्कि उसे भी किसी टीवी और फिल्म कलाकार जैसी लोकप्रियता दिला दी। 

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फिर तो चैनलों पर पाक कलाओं के रिएलिटी शो धड़ाधड़ शुरू होते चले गए मगर कपूर इन सबके किसी पितामह की तरह अपनी प्रसिद्धि बनाए हुए हैं। उनकी पहुंच घर-घर में है और महिलाओं की जुबान पर उनके नाम हैं। 
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वे पाककला का चैनल चलाते हैं, रेस्तरां की शृंखला है, किताबें लिखते हैं, सोशल मीडिया और यू-ट्यूब पर सक्रिय रहते हैं तथा देश-विदेश में घूम-घूमकर नए-नए व्यंजनों के नुस्खे बताते रहते हैं। गुरुवार को अपने रेस्तरां के लोकार्पण के अवसर पर लखनऊ आए संजीव कपूर से विस्तार से बातचीत हुई...
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आप कहते रहते हैं कि उत्तर प्रदेश से आपका गहरा लगाव है? इसके बारे में थोड़ा विस्तार से बताएं?
- मेरा जन्म तो हरियाणा में हुआ लेकिन मेरठ में मेरा ननिहाल है। वहां मैं काफी साल रहा और अलग-अलग स्कूलों में पढ़ाई की। फिर सहारनपुर में भी रहना हुआ। पहली नौकरी भी मिली तो उत्तर प्रदेश के बनारस में। तीन साल तक बनारस में रहा। वहां से अक्सर लखनऊ उसी प्रकार आता था जैसे कोई छोटे शहर से बड़े शहर में आता हो।

बताया, कहां से लाते हैं खाना बनाने की व‌िध‌ियां

sanjeev kapoor interview with amar ujala
लखनऊ से प्रभाव‌ित हैं संजीव कपूर - फोटो : amar ujala

इधर फिर बनारस जाना हुआ आपका?
-हां कई बार गया लेकिन बनारस वैसा ही है। मुझे याद है कि एक बार वहां के मण्डलायुक्त ने नगर को बदलने की कोशिश की तो पर्यटकों का विरोध शुरू हो गया। लोग बनारस को वैसे ही देखना चाहते हैं।

लखनऊ में खानपान की अपनी विरासत है। आपको यहां क्या प्रभावित करता है?
-मुझे जो यहां के खानपान में सबसे खास बात लगती है वह है इसकी पाककला की बारीकी। वास्तव में यहां एक इत्मीनान है, सुकून है। जिन्दगी में बहुत भागदौड़ ठीक नहीं, सन्तुष्टि नहीं मिलती। यहां एक ठहराव है और इसी कारण यहां के खानपान में बारीकी है। वास्तव में उत्तर प्रदेश में बहुत कुछ है जिसका हमें विश्व स्तर पर प्रचार करने की जरूरत है।

आप इतनी सारे व्यंजन बताते हैं, उनको बनाने के तरह-तरह के तरीके बताते हैं, कहां से लाते हैं इतनी विधियां?
- मैं विश्व भर में इन्हें ढूंढता रहता हूं और उनमें प्रयोग भी करता रहता हूं। इन्हें जुटाने के लिए काफी मेहनत करता हूं।

क्या कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी ने यह आपत्ति जताई हो कि आपने उसकी विधियां अपनी पुस्तक में दे दीं या चैनल पर बता दीं?
- मैं तो हमेशा यह कहता हूं कि खाना बनाने की कला सबमें बांटनी चाहिए। मैं कभी नहीं कहता कि यह सारा कुछ मेरा है। लेकिन इसका एक पक्ष यह भी है कि मेरे व्यंजन देखकर, मेरे विधियां सीखकर आज बहुत सारे लोग बहुत सारे व्यवसायों में सफलता पा रहे हैं। मैंने उन पर भी अपना कोई दावा नहीं किया। मुझे खुशी होती है।

आपके बाद बहुत सारे लोग मास्टर शेफ बने, कई के नाम लोगों ने अब भुला भी दिए हैं?
-देखिए अगर भेड़चाल होगी तो इसमें वही टिक पाएगा जो मेहनत करेगा।

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संजीव कपूर - फोटो : amar ujala

अक्सर कहा जाता है कि रसोई तो महिलाएं संभालती हैं लेकिन शेफ प्राय: पुरुष होते हैं?
-(हंसते हुए) ऐसा इस कारण है कि महिलाएं स्मार्ट होती हैं। वे जानती है कि शेफ को गधे की तरह मेहनत करनी होती है और इसके लिए पुरुष ही ठीक हैं।

आपके व्यंजन सबको पसन्द आते हैं लेकिन आपको किसका खाना पसन्द है?
- जो भी प्यार से खिलाता है। वास्तव में घर के बने खाने का कोई जवाब नहीं है। खाने में स्वाद व्यक्ति विशेष से नहीं आता, भाव से आता है।

इधर के वर्षों में भारतीयों के खान-पान में किस तरह का बदलाव देखते हैं?
-खाने में क्षेत्रीय प्राथमिकताएं होती हैं लेकिन इधर लोग दूसरे क्षेत्रों की चीजों को पसन्द करने, बनाने लगे हैं। 20 साल पहले तक उत्तर भारत में नाश्ते में इडली या डोसा नहीं बनता था लेकिन अब यह आम है। 

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