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यूपी: अब संगठन की ओवरहालिंग में जुटेगी सपा, बढे़ वोटबैंक को बरकरार रखने की कवायद
Mon, 14 Mar 2022 03:53 PM IST
ishwar ashish
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Mon, 14 Mar 2022 03:53 PM IST
सार
समाजवादी पार्टी यूपी चुनाव में अपने बढ़े हुए वोटबैंक को सहेजने में जुट गई है। सपा संगठन को सक्रिय कर स्थानीय निकाय चुनाव में धमाकेदार उपस्थित दर्ज कराने की रणनीति बना रही है।
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सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव।
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
यूपी विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद सपा अब नए सिरे से संगठन की ओवरहालिंग में जुटेगी। चुनाव में सक्रिय भूमिका निभाने वाले नेताओं को चिह्नित कर उन्हें नई जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। पार्टी की रणनीति है कि संगठन को सक्रिय कर स्थानीय निकाय में धमाकेदार उपस्थिति दर्ज कराई जाए। इस रणनीति को पार्टी के बढ़े वोटबैंक को बरकरार रखने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है।
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इस बार के चुनाव में सपा का वोटबैंक 21.82 फीसदी से बढ़कर 32 फीसदी पर पहुंच गया है। विधायकों की संख्या भी 47 से बढ़कर 111 हो गई है। इस चुनाव में अखिलेश यादव पार्टी के अकेले नेतृत्वकर्ता की भूमिका में रहे। ऐसे में माना जा रहा है कि वोटबैंक में हुई बढ़ोतरी अखिलेश के चेहरे की बदौलत हुई है। पार्टी की कोशिश है कि इस ग्राफ को बरकरार रखा जाए। क्योंकि इसी वर्ष नगर निकाय चुनाव भी होने हैं।
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पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि 32 फीसदी वोटबैंक बरकरार रहा तो निकाय चुनाव में काफी फायदा मिलेगा। यह तभी संभव है, जब संगठन निरंतर सक्रिय रहे। इसके लिए विधानसभा चुनाव में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले नेताओं को चिह्नित कर संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जाएगी। इसमें जातीय समीकरण का भी ध्यान रखा जाएगा।
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विधानसभा क्षेत्रवार होगी समीक्षा
होली के बाद नेताओं की सक्रियता का अंदाजा लगाने के लिए उनके बूथ पर मिले वोट और उनके प्रभार वाले जिले में मिले वोट का आकलन किया जाएगा। जिन नेताओं को अलग-अलग जिम्मेदारी दी गई थी, उनके कामकाज की अखिलेश खुद समीक्षा करेंगे। 21 मार्च की बैठक के बाद विधानसभा क्षेत्रवार समीक्षा बैठक शुरू होगी।
चुनाव में देर से सक्रिय हुआ संगठन
पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि विधानसभा चुनाव में संगठन देर से सक्रिय हुआ था। अक्तूबर में प्रदेश कार्यकारिणी घोषित की गई। इसी माह अल्पसंख्यक मोर्चा, अनुसूचित जाति मोर्चा के अध्यक्ष घोषित किए गए। कार्यकारिणी जारी होने में नवंबर बीत गया। इसके बाद अंबेडकर वाहिनी घोषित की गई। देर से घोषणा होने से जनवरी व फरवरी तक संगठन में निरंतर मनोनयन होता रहा। ऐसे में उनके चुनावी दायित्व निर्धारण में चूक हुई। वे अपनी विधानसभा क्षेत्र में जातीय गोलबंदी नहीं कर पाए। भविष्य में ऐसी चूक न हो, इसके लिए अभी से मंथन शुरू होगा।