नौ महीने में अस्पतालों में संसाधन बढ़े, नई दवाओं, तकनीक के बेहतर मिले परिणाम
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ऑक्सीजन देने के तरीके में आया बदलाव
पहले कोरोना की चपेट में आने पर मरीज की सांस फूलती थी और ऑक्सीजन देने की स्थिति स्पष्ट होने से पहले ही हालत बिगड़ जाती थी। अब बिना वेंटिलेटर के भी काम चलाने का विकल्प मिल गया है। हाई फ्लो ऑक्सीजन मशीन से फेफड़ों को राहत दी जा रही है।
वहीं, अभी तक वेंटिलेटर चलाने वाले चिकित्सकों की संख्या कम थी, लेकिन कोरोना मरीजों के लिए अलग-अलग टीमें लगाई गईं। इन्हें ऑक्सीजन देने की मात्रा और तरीके के बारे में प्रशिक्षित किया गया है। इसका फायदा दूसरे मरीजों को भी मिलेगा। जिन अस्पतालों को कोविड हॉस्पिटल बनाया गया, वहां संसाधन भी बढ़े हैं।
12 मार्च को मिला पहला मरीज
राजधानी में 12 मार्च को कोरोना का पहला मरीज मिलने पर चिकित्सक खाली हाथ थे। ऑक्सीजन से लेकर दवाओं तक की स्थिति स्पष्ट नहीं थी। इस बीच बीसीजी, आवरमेक्टिन, रेमडेसिविर जैसी दवाओं के बेहतर परिणाम मिले।
धीरे-धीरे इनकी खुराक तय कर दी गई। प्लाज्मा थेरेपी दी गई। पहले तय नहीं था कि थेरेपी कैसे और किन परिस्थितियों में देनी है। अब इसकी खुराक से लेकर देने के तरीके, मरीजों में प्रभाव से चिकित्सक वाकिफ हैं।
इसी तरह मरीजों को कब स्टेरॉयड देना है, यह भी तय नहीं था। मरीजों पर प्रयोग के बाद इसकी खुराक, देने के तरीके, मरीजों में बदलाव की जानकारी मिल गई है। फिर उसी हिसाब से दवाओं का प्रयोग किया जा रहा है।
अस्पताल में मरीज को रखने का समय हुआ कम
मरीजों का स्वप्रबंधन भी बढ़ा
कोरोना के बाद मरीजों का स्व प्रबंधन बढ़ा है। लोग घर पर ऑक्सीजन जांचने लगे हैं। इम्यूनिटी को लेकर सतर्कता आई है। विभिन्न ट्रायल में आयुर्वेदिक औषधियों के सकारात्मक परिणाम मिले हैं। लेकिन अधिक मात्रा में इनके प्रयोग से परिणाम हानिकारक भी होने लगते हैं।
आम जनता में कम हुआ डर
वायरस को लेकर चिकित्सकों, कर्मियों और आम जनता में भय का माहौल कम होने लगा है। वहीं, अस्पतालों में बेड से लेकर आईसीयू और एचडीयू की व्यवस्थाएं सुधारी गई हैं। राजधानी में सरकारी क्षेत्र में लेवल-3 के तीन अस्पताल हो गए हैं।