ये हैं वो कारण जिनसे हो रही है कांग्रेस की दुर्दशा
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चुनाव नतीजे अभी घोषित नहीं हुए हैं लेकिन कांग्रेस के पास बेहतर परिणाम के लिए कोई कारण भी नहीं है। देखें वो कारण जिसने कांग्रेस की प्रदेश में दुर्दशा कर दी।
इस बार आम चुनाव में कांग्रेस की लय-चाल शुरू से ही बिगड़ी नजर आई। विरोधियों के हमलों के आगे वह टिक नहीं सकी और मुकाबले से बाहर नजर आई।
रायबरेली को छोड़ दिया जाए तो किसी भी सीट पर कांग्रेस मजबूती से खड़ी नहीं दिखाई दी।
यहां तक कि राहुल गांधी तक को अपनी परंपरागत सीट अमेठी को बचाने के लिए पहली बार मतदान के दिन क्षेत्र में घूम-घूमकर बूथ मैनेजमेंट तक संभालना पड़ा। यह कहना गलत नहीं होगा कि इस बार प्रदेश में कांग्रेस की साख दांव पर लगी है।
भाजपा ने किया बाहर
2009 के चुनाव में 22 सीटों पर जीत हासिल करने वाली कांग्रेस एग्जिट पोल के नतीजों के मुताबिक पांच से आठ सीटों पर सिमटती नजर आ रही है।
एग्जिट पोल के रुझानों से पार्टी के दिग्गज नेताओं के माथे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती हैं।
इन हालातों के लिए कांग्रेस खुद ही जिम्मेदार है, क्योंकि वह विरोधियों, खासकर भाजपा की चुनावी रणनीति को समझ नहीं पाई और पार्टी के रणनीतिकार जब तक कोई काट तलाशते, भाजपा कई कदम आगे निकल चुकी थी।
चुनावी तैयारियों में पिछड़े
भाजपा, सपा व बसपा जहां चुनाव का ऐलान होने के काफी पहले से ही चुनावी तैयारियों में जुटे थे और लोकसभा क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करके रणनीति बनाने में लगे थे, वहीं यूपी कांग्रेस हाथ पर हाथ धरे बैठी थी।
चुनाव के ऐलान से ठीक पहले कांग्रेस हरकत में आई लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।
प्रत्याशियों के नाम तय करने से लेकर अन्य तैयारियों में शुरुआती दौर से पिछड़ना आखिरकार पार्टी के लिए बड़ा झटका साबित हुआ।
ध्रुवीकरण की आस
दरअसल भाजपा की ओर से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद कांग्रेस के रणनीतिकार यह गलतफहमी पाल बैठे कि मुस्लिम वोटरों का पार्टी के पक्ष में ध्रुवीकरण हो जाएगा।
लेकिन, मुस्लिम मतों का बंटवारा हो जाने से पार्टी की रणनीति धरी रह गई। इतना नहीं मुस्लिम वोटों के छिटकने के साथ ही कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक भी भाजपा और सपा की ओर चला गया, जिससे पार्टी को खासा नुकसान होता दिखाई दे रहा है।
मुस्लिम वोटों के लालच में कांग्रेस अपने परंपरागत वोट बैंक को भी सहेजकर नहीं रख पाई।
बचाव ही करती रही कांग्रेस
चुनाव की घोषणा से पहले ही नरेंद्र मोदी और अन्य नेताओं ने कांग्रेस पर तीखे हमले शुरू कर दिए थे। अंतिम चरण के चुनाव तक मोदी और उनकी टीम कांग्रेस खास तौर पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर हमलावर रही।
ईंट का जवाब पत्थर से देने की रणनीति अपनाने के बजाय कांग्रेसी सूरमा बचाव की मुद्रा में दिखाई दिए। सोनिया और राहुल भी भाजपा को जोरदार जवाब देने में सफल नहीं रहे जितने जोरदार तरीके से मोदी ने उन पर हमले बोले।
तीसरे चरण के बाद रायबरेली और अमेठी में मोर्चा संभालने पहुंची प्रियंका वाड्रा ने जरूर कुछ तेवर दिखाए लेकिन तब तक काफी देर चुकी थी।
पार्टी में नहीं दिखी एकजुटता
प्रदेश कांग्रेस के कमजोर मैनेजमेंट का खामियाजा भी उसे उठाना पड़ा। चुनाव प्रचार अभियान से लेकर बूथ मैनेजमेंट तक का काम प्रत्याशियों को ही संभालना पड़ा, संगठन का दम-खम नहीं दिखाई दिया।
लखनऊ जैसे कुछ चुनिंदा क्षेत्रों को छोड़ दें तो ज्यादातर सीटों पर संगठन की कोई भूमिका ही नहीं दिखाई दी।
प्रदेश कमेटी से लेकर स्थानीय स्तर तक नेताओं की आपसी खींचतान और उठापटक के चलते कांग्रेस संगठन के दम पर कहीं लड़ती हुई नहीं दिखाई दी।
प्रचार तंत्र भी कमजोर
एक तरफ भाजपा सोशल मीडिया से लेकर गांवों तक आक्रामक तरीके से प्रचार अभियान चलाती रही तो दूसरी ओर कांग्रेस फिसड्डी साबित हुई।
कहने को तो पार्टी मुख्यालय पर वार रूम बनाया गया लेकिन वह भी महज हिसाब-किताब तक सीमित रहा। कौन सा स्टार कैंपेन के लिए कहां पहुंच रहा है, उसे कब कौन सा विमान या हेलीकॉप्टर मुहैया कराना है, इसी की चिंता करता रहा।
आंकड़ों के हिसाब से तो कांग्रेस की 490 जनसभाएं हुई। सोनिया गांधी ने आठ तो राहुल ने 30 जनसभाएं व रोड शो करके हवा बनाने की कोशिश की, लेकिन यह बहुत प्रभावी साबित नहीं हुआ।
अभी नेतृत्व की तलाश
सबसे दिलचस्प यह कि इस लोकसभा चुनाव में यूपी कांग्रेस का नेतृत्व करने वाला कोई नहीं था। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष निर्मल खत्री खुद फैजाबाद से चुनाव लड़ रहे थे।
इसलिए किसी अन्य प्रत्याशी के क्षेत्र में जाने का वक्त ही नहीं निकाल पाए। रही बात प्रदेश प्रभारी मधुसूदन मिस्त्री की तो उन्हें अमित शाह के जवाब में कांग्रेस ने यूपी की कमान सौंपी थी।
चुनाव के पहले तो मिस्त्री कोई करिश्मा दिखा नहीं सके, चुनाव आया तो उन्हें दिल्ली में प्रत्याशियों के चयन के काम में लगा दिया। प्रत्याशी चयन करते-करते वह खुद मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने वड़ोदरा चले गए और चुनाव के वक्त यूपी कांग्रेस भगवान भरोसे हो गई।
न अध्यक्ष, न प्रभारी। अविनाश पांडेय को प्रभारी बनाकर भेजा तो गया लेकिन उनके पास ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं थी जो कांग्रेस को रातोंरात खड़ा करके मुकाबले में ला देते।
खूब रही एंटी एंकेंबेंसी
रही सही कसर यूपीए के खिलाफ एंटी एंकेंबेंसी फैक्टर ने पूरी कर दी। महंगाई, भ्रष्टाचार, विकास जैसे मुद्दों पर मोदी समेत अन्य भाजपा नेताओं ने कांग्रेस की जमकर खिंचाई की।
चुनाव में विरोधियों ने ऐसा माहौल बनाया कि लोग यूपीए से निजात चाहते हैं और वोटरों ने बदलाव के लिए वोट भी खूब किया।