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पुराने पन्नों से: कारसेवकों के खून से सना है 90 के दशक का राम मंदिर आंदोलन, पढ़ें ये वाक्या
Tue, 09 Jan 2024 03:44 PM IST
ishwar ashish
अमर उजाला ब्यूरो, अयोध्या
अमर उजाला ब्यूरो, अयोध्या
Published by: ishwar ashish
Updated Tue, 09 Jan 2024 03:44 PM IST
सार
अयोध्या में बन रहे भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण के लिए अनेक रामभक्तों ने जन्मभूमि की मुक्ति के लिए अपने जीवन की आहुति दी।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
30 अक्तूबर 1990 को साधु-संतों के साथ बड़ी संख्या में कारसेवक अयोध्या पहुंच गए। इनके आने का सिलसिला जारी था। यहां देश भर से आए कारसेवकों की भारी भीड़ जुट गई थी। प्रशासन ने अयोध्या में किसी के भी प्रवेश पर पाबंदी लगा रखी थी। विवादित परिसर के डेढ़ किमी के दायरे में बैरिकेडिंग थी। इस बीच कारसेवकों की भीड़ बेकाबू हो गई।
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30 अक्तूबर को पुलिस की ओर से की गई फायरिंग में पांच लोगों की मौत हो गई। इस घटना के बाद अयोध्या ही नहीं पूरे देश में तनाव का माहौल हो गया। इसके दो दिन बाद ही दो नवंबर को हजारों की संख्या में कारसेवक पुलिस की बंदिशों को तोड़ते हुए हनुमानगढ़ी के करीब पहुंच गए। विहिप सुप्रीमो रहे अशोक सिंहल व उमा भारती समेत आरएसएस और विहिप के कई बड़े नेता इनका नेतृत्व कर रहे थे। इनके नेतृत्व में तीन तरफ से हजारों कारसेवकों की भीड़ हनुमानगढ़ी की तरफ बढ़ने की कोशिश करने लगी।
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पुलिस की ओर से सख्ती के साथ इन्हें रोकने की कोशिश की जा रही थी। आसपास के भवनों की छतों पर पुलिसकर्मी तैनात थे। पुलिस की कोशिश थी कि किसी भी सूरत में कोई कारसेवक विवादित परिसर की ओर न बढ़ने पाए।
उधर कारसेवक 30 अक्तूबर के गोलीकांड में कारसेवकों के मारे जाने से गुस्से में थे। दो नवंबर की सुबह का वक्त था, हनुमानगढ़ी के सामने एक सकरी गली में कारसेवक बढ़ते हुए चले आ रहे थे। पहले इन्हे रोकने की कोशिश हुई। जब ये नहीं माने तो पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार दो नवंबर के गोलीकांड में डेढ़ दर्जन लोगों की मौत हो गई थी। कारसेवकों ने मारे गए साथियों के शवों के साथ प्रदर्शन भी किया।