अतीत का झरोखा: रामनरेश यादव भी विधायकों की वोटिंग से बने थे मुख्यमंत्री
समाजवादी नेता और लोकतंत्र सेनानी निर्मल सिंह बताते हैं, चौधरी चरण सिंह एक नेता को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। राजनारायण को इसका पता चला तो वे दिल्ली पहुंच गए। उन्होंने चौधरी साहब से मिलकर बिना परामर्श मुख्यमंत्री का नाम तय करने पर नाराजगी जताई। पढ़ें यह रोचक किस्सा...
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उत्तर प्रदेश में सिर्फ 1989 में ही मुलायम सिंह यादव और चौधरी अजित सिंह के बीच विधायकों के वोट से मुख्यमंत्री का फैसला नहीं हुआ था, बल्कि 1977 में भी इसी तरह फैसला हुआ था। तब रामनरेश यादव मुख्यमंत्री बने थे। आपातकाल के बाद प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके थे। कांग्रेस के विरोध में कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़कर जनसंघ सहित ज्यादातर विपक्षी दल जनता पार्टी के बैनर तले चुनाव लड़े थे। जनता पार्टी को बहुमत मिला। समाजवादी नेता और लोकतंत्र सेनानी निर्मल सिंह बताते हैं, चौधरी चरण सिंह एक नेता को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। राजनारायण को इसका पता चला तो वे दिल्ली पहुंच गए। उन्होंने चौधरी साहब से मिलकर बिना परामर्श मुख्यमंत्री का नाम तय करने पर नाराजगी जताई। चौधरी साहब ने राजनारायण से पूछा, ‘...तो आप नाम बताओ, किसको बनाया जाए।’
राजनारायण ने कहा, नाम नहीं बताऊंगा। लिस्ट भेज रहा हूं।’ उन्होंने चौधरी साहब को लिस्ट भिजवा दी। अगले दिन वह फिर चौधरी साहब के पास पहुंच गए। राजनारायण ने कहा, आपने लिस्ट देखी तो क्या सोचा। उन्होंने कहा, मेरे दिमाग में रामनरेश यादव का नाम बैठ रहा है। सिंह बताते हैं, बहरहाल नेता पद के चयन के लिए 21 जून 1977 की तारीख तय हुई। चंद्रशेखर आजमगढ़ के लालगंज से लोकसभा सदस्य चुने गए रामधन को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे।
जनता पार्टी के घटक जनसंघ और लोकदल रामनरेश के साथ रहे। पर, चंद्रभानु गुप्त की संगठन कांग्रेस सहित जनता पार्टी के अन्य घटक रामधन के समर्थन में रहे। चुनाव में रामनरेश यादव जीत गए और 23 जून 1977 को प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।