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11 विधानसभा क्षेत्रों में थमा उपचुनाव का शोर, आज रवाना होंगी पोलिंग पार्टियां, कल डाले जाएंगे वोट
Sun, 20 Oct 2019 12:51 AM IST
Amulya Rastogi
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: Amulya Rastogi
Updated Sun, 20 Oct 2019 12:51 AM IST
सार
- बसपा व कांग्रेस के बड़े नेता चुनाव से दूर रहे, सपा मुखिया केवल रामपुर पहुंचे प्रचार करने
- विपक्षी दलों के बिखराव से भाजपा को राहत, नौ सीटों को बचाने, दो सीटें छीनने की चुनौती
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
विधानसभा की 11 सीटों पर उपचुनाव के लिए प्रचार का शोर शनिवार शाम पांच बजे थम गया। आखिरी दिन सभी दलों व प्रत्याशियों ने प्रचार में ताकत झोंकी। रविवार को पोलिंग पार्टियां रवाना होंगी। कड़ी सुरक्षा के बीच सोमवार सुबह 7 से शाम 6 बजे तक वोट डाले जाएंगे। इन सीटों पर 110 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। वोटों की गिनती 24 अक्तूबर को होगी।
चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने 36 सभाओं व सम्मेलनों से चुनावी बिसात सजाई तो सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने केवल एक चुनावी सभा की। बसपा व कांग्रेस के बड़े नेता भी प्रचार से दूर रहे। सपा, बसपा व कांग्रेस ने अपने प्रदेश अध्यक्षों को ही चुनाव की बागडोर सौंपे रखी।
राजनीतिक नजरिये से ये उपचुनाव कई मायनों में अहम हो गए हैं। लंबे समय बाद प्रदेश के सभी प्रमुख राजनीतिक दल अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। जाहिर है, इनके नतीजे न सिर्फ हर दल की प्रदेश में मौजूदा जमीनी पकड़-पहुंच बताएंगे, बल्कि उनके परस्पर दावों को भी परखेंगे।
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उपचुनावों का महत्व इससे भी समझा जा सकता है कि बिखरे विपक्ष के बावजूद भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी। प्रदेश सरकार के मंत्रियों ने भी सभाएं कीं। विपक्ष से किसी बड़े दिग्गज के बजाय ज्यादातर सीटों पर द्वितीय पंक्ति के हाथों में प्रचार की बागडोर रही।
सिर्फ सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ही रामपुर में डॉ. तजीन फातमा के पक्ष में सभा की। अखिलेश चुनाव से पहले भी रामपुर गए थे और आजम खां के उत्पीड़न व फर्जी मुकदमों से मायूस कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया।
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चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने 36 सभाओं व सम्मेलनों से चुनावी बिसात सजाई तो सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने केवल एक चुनावी सभा की। बसपा व कांग्रेस के बड़े नेता भी प्रचार से दूर रहे। सपा, बसपा व कांग्रेस ने अपने प्रदेश अध्यक्षों को ही चुनाव की बागडोर सौंपे रखी।
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राजनीतिक नजरिये से ये उपचुनाव कई मायनों में अहम हो गए हैं। लंबे समय बाद प्रदेश के सभी प्रमुख राजनीतिक दल अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। जाहिर है, इनके नतीजे न सिर्फ हर दल की प्रदेश में मौजूदा जमीनी पकड़-पहुंच बताएंगे, बल्कि उनके परस्पर दावों को भी परखेंगे।
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उपचुनावों का महत्व इससे भी समझा जा सकता है कि बिखरे विपक्ष के बावजूद भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी। प्रदेश सरकार के मंत्रियों ने भी सभाएं कीं। विपक्ष से किसी बड़े दिग्गज के बजाय ज्यादातर सीटों पर द्वितीय पंक्ति के हाथों में प्रचार की बागडोर रही।
सिर्फ सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ही रामपुर में डॉ. तजीन फातमा के पक्ष में सभा की। अखिलेश चुनाव से पहले भी रामपुर गए थे और आजम खां के उत्पीड़न व फर्जी मुकदमों से मायूस कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया।
वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश में हुए लोकसभा की तीन और विधानसभा की एक सीट पर उपचुनाव में मिली पराजय से सचेत भाजपा के रणनीतिकारों ने इन 11 सीटों के उपचुनावों को प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर तैयारी की।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने चुनाव की अधिसूचना जारी होने से पहले ही इन सभी सीटों पर अलग-अलग सभाएं और सम्मेलन किए। मुख्यमंत्री ने प्रत्येक क्षेत्र में विकास योजनाओं के शिलान्यास और लोकार्पण के सहारे भी समीकरण दुरुस्त करने की कोशिश की।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने सभी जगह बूथ समितियों तक बैठक की। चुनाव के दौरान भी मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष ने नौ साझा सभाएं कीं, जबकि मुख्यमंत्री ने दो और प्रदेश अध्यक्ष ने तीन सम्मेलनों को अकेले संबोधित किया। प्रदेश महामंत्री संगठन सुनील बंसल और क्षेत्रों के प्रभारियों ने भी संगठनात्मक बैठकें कर जमीन मजूबत बनाए रखने का प्रयास किया।
यही नहीं, पार्टी ने प्रदेश सरकार के एक मंत्री और प्रदेश संगठन के एक पदाधिकारी को नियुक्त कर चुनावी समीकरणों को ठीक रखने की जिम्मेदारी सौंपी। एक सीट पर पार्टी के पांच-पांच विधायकों को भी लगाया गया।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने चुनाव की अधिसूचना जारी होने से पहले ही इन सभी सीटों पर अलग-अलग सभाएं और सम्मेलन किए। मुख्यमंत्री ने प्रत्येक क्षेत्र में विकास योजनाओं के शिलान्यास और लोकार्पण के सहारे भी समीकरण दुरुस्त करने की कोशिश की।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने सभी जगह बूथ समितियों तक बैठक की। चुनाव के दौरान भी मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष ने नौ साझा सभाएं कीं, जबकि मुख्यमंत्री ने दो और प्रदेश अध्यक्ष ने तीन सम्मेलनों को अकेले संबोधित किया। प्रदेश महामंत्री संगठन सुनील बंसल और क्षेत्रों के प्रभारियों ने भी संगठनात्मक बैठकें कर जमीन मजूबत बनाए रखने का प्रयास किया।
यही नहीं, पार्टी ने प्रदेश सरकार के एक मंत्री और प्रदेश संगठन के एक पदाधिकारी को नियुक्त कर चुनावी समीकरणों को ठीक रखने की जिम्मेदारी सौंपी। एक सीट पर पार्टी के पांच-पांच विधायकों को भी लगाया गया।
अखिलेश सिर्फ आजम के गढ़ में गए
विपक्षी पार्टियां उपचुनाव से पहले प्रदेश सरकार पर हमलावर थीं, उसे देखते हुए लग रहा था कि इनके दिग्गज प्रचार की बागडोर खुद संभालेंगे। पर, चुनाव के दौरान यह नहीं दिखा। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव सिर्फ रामपुर गए। एक बार चुनाव की घोषणा से पहले और दूसरी बार प्रचार के आखिरी दिन।
मायावती, आकाश नहीं दिखे
बसपा सुप्रीमो मायावती या लोकसभा चुनाव के दौरान प्रचार अभियान में सक्रिय दिखे भतीजे आकाश ने भी उपचुनाव में कहीं सभा नहीं की। बसपा विधायक दल के नेता लालजी वर्मा अपनी पुत्री के चुनाव में जलालपुर में ही लगे रहे। कुछ सीटों पर प्रदेश अध्यक्ष मुनकाद अली जरूर गए। ज्यादातर सीटों पर क्षेत्रीय नेता व कोऑर्डिनेटर मोर्चा संभाले रहे।
बघेल को छोड़ कोई कांग्रेसी दिग्गज नहीं आया
वर्ष 2022 में प्रदेश की सत्ता संभालने का दावा करने वाली कांग्रेस के दिग्गज भी उपचुनाव में नहीं दिखे। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जरूर बाराबंकी के जैदपुर में तनुज पुनिया के पक्ष में दो सभाएं कीं। कांग्रेस ने उपचुनाव के दौरान ही संगठनात्मक फेरबदल किया। प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू चुनिंदा सीटों पर ही प्रचार के लिए जा सके।
मायावती, आकाश नहीं दिखे
बसपा सुप्रीमो मायावती या लोकसभा चुनाव के दौरान प्रचार अभियान में सक्रिय दिखे भतीजे आकाश ने भी उपचुनाव में कहीं सभा नहीं की। बसपा विधायक दल के नेता लालजी वर्मा अपनी पुत्री के चुनाव में जलालपुर में ही लगे रहे। कुछ सीटों पर प्रदेश अध्यक्ष मुनकाद अली जरूर गए। ज्यादातर सीटों पर क्षेत्रीय नेता व कोऑर्डिनेटर मोर्चा संभाले रहे।
बघेल को छोड़ कोई कांग्रेसी दिग्गज नहीं आया
वर्ष 2022 में प्रदेश की सत्ता संभालने का दावा करने वाली कांग्रेस के दिग्गज भी उपचुनाव में नहीं दिखे। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जरूर बाराबंकी के जैदपुर में तनुज पुनिया के पक्ष में दो सभाएं कीं। कांग्रेस ने उपचुनाव के दौरान ही संगठनात्मक फेरबदल किया। प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू चुनिंदा सीटों पर ही प्रचार के लिए जा सके।