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यूपी में विरोधियों को चित कर देगा माया का ये 'इक्का'

Sun, 05 Apr 2015 01:24 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sun, 05 Apr 2015 01:24 AM IST
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Promotion in reservation will be a big political issue in UP Politics.

लंबे समय तक सूबे की सियासत का ताप बढ़ा चुका प्रमोशन में आरक्षण का मुद्दा फिर प्रदेश में सियासी गर्मी ला सकता है।

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इसकी मुख्य वजह सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति में आरक्षण के सिलसिले में दाखिल अवमानना याचिका को लेकर प्रदेश सरकार का सिंचाई विभाग के मुख्य और अधीक्षण अभियंता के पदों पर तैनात इंजीनियरों को पदावनत करने का आदेश है।

ये सभी इंजीनियर आरक्षित श्रेणी अर्थात अनुसूचित जाति के हैं। इन्हें पदोन्नति में आरक्षण के प्रावधान के चलते प्रमोशन दिया गया था।

भले ही प्रदेश सरकार ने यह फैसला सुप्रीम कोर्ट में दायर अवमानना याचिका के मद्देनजर किया हो लेकिन सूबे में आरक्षित वर्ग के अधिकारी-कर्मचारी निश्चित रूप से इसका विरोध करेंगे।
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आरक्षण समर्थकों को मालूम है कि एक विभाग में अगर डिमोशन की कार्रवाई हो रही है तो भविष्य में इसका असर दूसरे विभागों पर भी पड़ेगा।

आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति ने इसको लेकर आंदोलन की चेतावनी भी दे दी है। उधर, आरक्षण विरोधी खेमे की ओर से लड़ाई लड़ने वाले सर्वजन हिताय संघर्ष समिति के ओमप्रकाश पांडेय कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला सभी विभागों में लागू होना चाहिए।
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इस व्यवस्था के तहत पदोन्नति पाने के साथ सीनियारिटी (परिणामी ज्येष्ठता) भी हासिल करने के चलते सीनियर पदों पर बैठे लोगों को पदावनत किया जाना चाहिए। स्वाभाविक रूप से इस खींचतान की गर्मी से सूबे की सियासत का बचना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन-सा है।

बसपा को है इससे बड़ी उम्मीद

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सूबे में सत्तारूढ़ दल सपा शुरू से ही प्रमोशन में आरक्षण का विरोध करती रही है। 2012 में सपा को प्रदेश में स्पष्ट बहुमत मिलने में भी उसके इस रुख का अहम योगदान माना जाता है। उधर, बसपा शुरू से ही आरक्षण समर्थकों के साथ खड़ी दिखी है।

कानून-व्यवस्था सहित तमाम मुद्दों पर आलोचना का शिकार हो रही सपा की कोशिश होगी कि वह फिर आरक्षण विरोधियों के साथ खड़ी होकर विधानसभा के अगले चुनाव के लिए सूबे में सियासी समीकरणों को दुरुस्त कर ले तो बसपा इस बहाने अपने दलित वोटों को लामबंद रखने की कोशिश करेगी।

भाजपा व कांग्रेस भी नहीं रहेगी अछूती
: भाजपा व कांग्रेस को भी कुछ न कुछ रुख अख्तियार करना होगा। पर, दोनों ही दलों के लिए इस मुद्दे स्पष्ट रुख तय करना आसान नहीं है। जहां तक भाजपा की बात है तो पदोन्नति में आरक्षण व्यवस्था लागू करने के लिए संविधान संशोधन विधेयक का समर्थन करने के कारण आरक्षण विरोधियों के गुस्से का सबसे ज्यादा शिकार वही हुई थी।

इस बार तो सरकार में होने के नाते उसकी मुसीबत और ज्यादा होगी। कारण, सत्ता में होने के नाते उसे कोई न कोई रुख सार्वजनिक करना ही होगा।

अंदरूनी खींचतान भी भाजपा-कांग्रेस के लिए मुसीबत

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संविधान संशोधन के मुद्दे पर हुए आंदोलन के दौरान कांग्रेस और भाजपा दोनों के भीतर दो धड़े दिख चुके हैं।

एक धड़ा संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने का पक्षधर रहा है तो दूसरा इसका विरोधी। संशोधन के पक्षधरों का कहना है कि फैसले को पलटा नहीं गया तो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का वोट छिटक जाएगा। विरोधी खेमा इससे नया संकट खड़ा होने की आशंका जता रहा है। उसका तर्क है कि इससे नुकसान ज्यादा और लाभ कम होगा।

मुलायम व मायावती के दोनों हाथों में लड्डू
: पूरे मामले में सियासी तौर पर मुलायम व मायावती के दोनों हाथ में लड्डू हैं। मायावती इस मुद्दे पर शुरू से ही अदालत के फैसले को पलटने के लिए संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने की मांग कर रही हैं। पर भाजपा अगर संविधान संशोधन कर भी दे तो उसे इसका फायदा मिलने से रहा।

बसपा प्रमुख मायावती यह दावा करने में नहीं चूकेंगी कि उन्होंने दबाव डालकर अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों को पदोन्नति में आरक्षण व परिणामी ज्येष्ठता का लाभ बहाल करवाया है। अगर ऐसा नहीं होता है तो मायावती भाजपा, कांग्रेस व मुलायम सभी को दलित विरोधी बताकर दलित सियासत को धार देंगी।

जहां तक मुलायम सिंह की बात है तो उन्हें आरक्षण का विरोध करने पर ही लाभ है। केंद्र अगर संशोधन की कोशिश करता है तो वह इसे मुद्दा बनाकर अगड़ों व पिछड़ों को भाजपा से खींचने की कोशिश करेंगे। संशोधन नहीं होता है तो भी इसका श्रेय लेने की सर्वाधिक कोशिश उन्हीं की तरफ से होगी।

यह है पूरा मामला

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प्रदेश में 8 मार्च 1973 को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अधिकारियों व कर्मचारियों को प्रोन्नति में आरक्षण देने की व्यवस्था लागू की गई। यह व्यवस्था 1994 तक चलती रही। इसी बीच इंदिरा साहनी केस में सर्वोच्च न्यायालय ने 16 नवंबर 1992 को संविधान प्रदत्त समानता के अधिकार की रक्षा का तर्क देते हुए पदोन्नति में आरक्षण समाप्त कर दिया।

साथ ही राज्य सरकारों से अपेक्षा की कि वे पांच वर्षों में नियमों में परिवर्तन करके पदोन्नति में आरक्षण को समाप्त करें। पर, प्रदेश में सपा व बसपा की साझा सरकार ने इसे रद्द करने के बजाय 1994 में एक आदेश के जरिये पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था को अगले आदेशों तक बढ़ा दिया।

उधर, तत्कालीन केंद्र सरकार ने 17 जून 1995 को 77वें संविधान संशोधन के जरिये इस बारे में राज्य सरकारों को प्रोन्नति में आरक्षण का अधिकार राज्य सरकार को दे दिया। इसके तहत प्रमोशन में आरक्षण फिर लागू हो गया।

प्रमोशन में आरक्षण के साथ सीनियारिटी का लाभ
: अगड़े व पिछड़े अधिकारियों व कर्मचारियों के संगठन इसका विरोध कर ही रहे थे कि वर्ष 2001 में केंद्र की तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी नेतृत्व वाली सरकार ने संविधान में 85वां संशोधन करते हुए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण के साथ परिणामी ज्येष्ठता का लाभ भी दे दिया।

इस फैसले के खिलाफ कर्नाटक के एम. नागराज ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी। न्यायालय ने सुनवाई तो जारी रखी लेकिन कोई व्यवस्था नहीं दी।

मायावती ने लागू किया, मुलायम ने किया रद्द

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18 अक्तूबर 2002 को मायावती सरकार ने सरकारी सेवक ज्येष्ठता नियमावली 1991 में संशोधन कर 17 जून 1995 से अनुसूचित जाति तथा जनजाति के कर्मचारियों व अधिकारियों को पदोन्नति में सीनियारिटी देने की व्यवस्था की। मायावती के बाद सत्ता में आई मुलायम सरकार ने 2005 में इसे रद्द कर दिया।

वर्ष 2007 में प्रदेश में फिर सत्तारूढ़ हुई मायावती सरकार ने इस वर्ग को परिणामी ज्येष्ठता लाभ देने के लिए सेवा नियमावली में 8 (ए) जोड़ा। इसमें यह व्यवस्था की गई कि पदोन्नति पाने वाले कर्मचारी या अधिकारी इस व्यवस्था के तहत प्रमोशन पाने के साथ सीनियारिटी (परिणामी ज्येष्ठता)भी पा जाएगा।

ग्रामीण अभियंत्रण सेवा और पावर कॉरपोरेशन सहित कई विभागों के सामान्य वर्ग के लगभग 50 अधिकारियों व कर्मचारियों ने उच्च न्यायालय में 8 (ए) जोड़े  जाने को चुनौती दी।

2007: उच्च न्यायालय ने सरकार के इस फैसले पर स्टे लगा दिया। इसके चलते सभी विभागों में पदोन्नतियां ठप हो गईं।

2011: हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने 4 जनवरी 2011 को प्रमोशन में आरक्षण और परिणामी ज्येष्ठता के फैसले को रद्द कर दिया।

अदालत ने भी इसे बताया असंवैधानिक

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अदालत ने कहा कि प्रमोशन में आरक्षण और परिणामी ज्येष्ठता का लाभ देने का आदेश असंवैधानिक है। यह भी कहा कि इस फैसले से वर्ष 1986 में नियमों के तहत सामान्य श्रेणी, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के लिए अलग-अलग अर्हता सूचियां बनाने का प्रावधान महत्वहीन हो गया है और आगे प्रभावी नहीं होगा।

साथ ही परिणामी ज्येष्ठता का लाभ देने के लिए राज्य सरकार द्वारा सेवा नियमावली में जोड़े गए 8 (ए) के प्रावधान को भी निरस्त कर नए सिरे से वरिष्ठता सूची बनाई जाए।

राज्य सरकार अगर अपने अधीन सेवाओं में किसी वर्ग या वर्गों को प्रोन्नति में आरक्षण देना चाहती है तो वह संवैधानिक प्रावधानों के तहत कार्रवाई करके ऐसा करने के लिए स्वतंत्र है।

पर यह सब कुछ सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एम. नागराज मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई विधि व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा। इसके खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर कर दी।

हाईकोर्ट के आदेश को सही ठहराया था

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2012: 27 अप्रैल 2012 को सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की एसएलपी को खारिज कर दिया। साथ ही हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के आदेश को सही ठहराया। कहा कि पदोन्नति में आरक्षण व परिणामी ज्येष्ठता देना संविधान की मूल भावना के विपरीत है।

अगर कहीं देना है तो उसके लिए नागराज व इंदिरा साहनी मामले में दिए गए प्रावधानों का पालन करना होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने इंदिरा साहनी केस के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि 16 नवंबर 1997 तक पदोन्नति पाने वाले अधिकारियों व कर्मचारियों को छोड़कर शेष सभी उच्च न्यायालय के फैसले के दायरे में आएंगे।

यह था एम. नागराज के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला
2006 में कर्नाटक के अभियंता एम. नागराज व अन्य की अपील पर सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि राज्य सरकार किसी कर्मचारी को परिणामी ज्येष्ठता देने का प्रावधान कर सकती है। पर, इसके लिए उसे संबंधित कर्मचारी के बारे में तीन प्रमाण पत्र देने होंगे।

1-संबंधित सेवा में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं है।

2-जिसे इसका लाभ दिया जा रहा है, वह सचमुच पिछड़ा है। साथ ही इस पदोन्नति से उसके किसी समकक्षी के हित प्रभावित नहीं होंगे।

3-पदोन्नति के फलस्वरूप सरकारी मशीनरी की कार्यक्षमता प्रभावित नहीं होगी।

क्या है पदोन्नति में आरक्षण

Promotion in reservation will be a big political issue in UP Politics.

अगर 100 पद हैं तो उनमें 21 प्रतिशत पर अनुसूचित जाति के लोगों को और 2 प्रतिशत पर अनुसूचित जनजाति के लोग पदोन्नत होंगे। शेष पर समान्य वर्ग के लोगों की पदोन्नति होगी। अगर कहीं आरक्षित वर्ग का कोई अधिकारी या कर्मचारी पदोन्नति पाने की शर्त पूरी कर रहा है तो उसे ऊपर के पद पर अनारक्षित पद पर भी पदोन्नति दी जा सकती है।

सर्वजन हिताय संरक्षण समिति का तर्क है कि नौकरी में जब आरक्षण मिल चुका है तो पदोन्नति में देने से ज्येष्ठता का सिद्धांत प्रभावित होता है।

क्या है परिणामी ज्येष्ठता: अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के अधिकारी-कर्मचारी को पदोन्नति के पद पर भी वरिष्ठता का लाभ देना। उदाहरण के तौर पर सामान्य या पिछड़े वर्ग के दो लोग 1 जनवरी 1999 को सहायक अभियंता पद पर नियुक्त हुए। अनुसूचित जाति का एक व्यक्ति 1 जनवरी 2000 को नियुक्त हुआ।

अनुसूचित जाति के सहायक अभियंता की 1 जनवरी 2005 को अधिशासी अभियंता पद पर पदोन्नति हो गई। उससे एक वर्ष पहले नियुक्त सामान्य व पिछड़े वर्ग के सहायक अभियंताओं को 1 जनवरी 2008 में पदोन्नति मिली तो अनुसूचित जाति का अभियंता सामान्य व पिछड़े वर्ग के अभियंता से तीन साल सीनियर मान लिया जाएगा। यही नहीं पूरी नौकरी उसे इस ज्येष्ठता का लाभ मिलता रहेगा।

...तो सूबे में 1400-1500 तक का होगा डिमोशन

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पदोन्नति में आरक्षण व परिणामी ज्येष्ठता पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर अमल करते हुए अगर अनुसूचित जाति के अधिकारियों व कर्मचारियों को पदावनत किया जाता है तो प्रदेश में 1400-1500 अधिकारी-कर्मचारियों का डिमोशन होना तय है। जिन विभागों पर मुख्य रूप से इसका असर पड़ेगा, उनमें सिंचाई, बिजली, लोकनिर्माण व पुलिस जैसे महकमे शामिल हैं।

वैसे तो सुप्रीम कोर्ट में सिंचाई विभाग के इंजीनियरों की ओर से दायर अवमानना याचिका के सिलसिले में सरकार के फैसले से फौरी तौर पर 30 इंजीनियर ही प्रभावित हो रहे हैं। इनमें तीन मुख्य अभियंता पद पर तैनात हैं तो 27 अधीक्षण अभियंता हैं।

पर, इसके चलते कुछ और विभागों में उच्च पदों पर बैठे लोग भी जद में आ सकते हैं। इनमें पावर कॉरपोरेशन के चार मुख्य अभियंता और 33 अधीक्षण अभियंता, लोक निर्माण विभाग के पांच मुख्य अभियंता व चार अधीक्षण अभियंता, पुलिस महकमे में दस एसपी व एएसपी शामिल हैं। वहीें व्यापार कर, चिकित्सा, परिवहन, आबकारी विभाग भी इससे प्रभावित होंगे।

सर्वजन हिताय संरक्षण समिति के अध्यक्ष शैलेंद्र दुबे के अनुसार, प्रदेश सरकार ने सिंचाई विभाग के सिलसिले में जो आदेश पारित किया है, उसके अनुसार पदावनति पर रोक लगाने का 28 अप्रैल 2012 का आदेश रद्द कर दिया है।

इससे साफ है कि डिमोशन पर सरकार की तरफ से लगाई गई रोक खत्म हो गई है। लिहाजा इस आदेश का सभी विभागों पर प्रभाव पड़ेगा। न्यायालय से भी इस आदेश को सभी विभागों में लागू कराने की प्रार्थना की जाएगी।

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