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जानिए, मसूद की सजा से कैसे 'डिरेल' होगी सियासत?
राजेन्द्र सिंह/लखनऊ
Updated Wed, 02 Oct 2013 11:22 AM IST
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काजी रशीद मसूद को चार साल की सजा से हिंसा प्रभावित पश्चिमी यूपी के सियासी समीकरणों पर खासा असर पड़ सकता है।
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कांग्रेस-रालोद जिस गणित को पुख्ता कर चुनाव मैदान में उतरने की कोशिश में थे, वह बिगड़ता दिख रहा है।
कुछ दंगे का असर कहिए या मसूद की सजा का नतीजा, दोनों दलों की परेशानियों में इजाफा हुआ है।
सजा ऐसे माहौल में हुई है, जब वेस्ट यूपी में दंगे के बाद मुस्लिम राजनीति उफान पर है।
मसूद ऐसे नेता हैं जो दंगों के बाद मुसलमानों में सपा के प्रति पनपी नाराजगी को कुछ हद तक कांग्रेस के वोट में तब्दील कर सकते थे।
सपा के मुकाबले के लिए मसूद को मुस्लिम चेहरा के तौर पर पेश करने की कांग्रेसी मुहिम की धार भी अब कुंद पड़ेगी।
पश्चिमी यूपी की राजनीति में उदार छवि के कद्दावर मुस्लिम नेता के रूप में पहचान रखने वाले रशीद मसूद ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पढ़ाई के फौरन बाद चौधरी चरण सिंह की अगुवाई में सक्रिय राजनीति शुरू की।
इमरजेंसी के दौरान वह भारतीय लोकदल के महासचिव बनाए गए।
सहारनपुर सीट से पहली बार 1977 में चुनाव जीतने वाले मसूद पांच बार लोकसभा और तीन बार राज्यसभा में पहुंचे। 1989 में वह केंद्र में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बने।
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चरण सिंह के जमाने में किसान-मुसलमान समीकरण बनाने में अन्य नेताओं के साथ रशीद मसूद ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। वह पश्चिमी यूपी में ऐसे मुस्लिम फेस के तौर पर देखे जाते रहे हैं जिसकी स्वीकार्यता सभी वर्गों में थी।
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सीबीआई कोर्ट से चार साल की सजा मिलने के बाद रशीद मसूद और उनकी सियासत संकट में है। बेटे शादान मसूद का कॅरियर भी दांव पर है। मसूद की राज्यसभा सदस्यता चली जाएगी और एपीडा चेयरमैन का पद भी नहीं बचेगा।
पिछले विधानसभा चुनाव से पहले जब वह सपा छोड़कर कांग्रेस में गए तो उन्हें हाथों-हाथ लिया गया। उन्हें न केवल राज्यसभा में भेजा गया, वरन कांग्रेस की शीर्ष बॉडी सीडब्लूसी का विशेष सदस्य भी नामित किया गया।
हालांकि, विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को पश्चिमी यूपी से खास कामयाबी नहीं मिली पर उनका कद कम होने के बजाय और बढ़ा। 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी उपयोगिता को देखते हुए कांग्रेस ने उन्हें अप्रैल 2013 में एपीडा का अध्यक्ष बनाकर केंद्र सरकार में राज्यमंत्री का दर्जा दिया।
बिगड़ी कांग्रेस की चुनावी रणनीति
कांग्रेस की रणनीति पश्चिमी यूपी में परंपरागत वोटों के साथ किसान-मुसलमान गठजोड़ बनाने की थी। इसमें रशीद मसूद को मुस्लिम चेहरे की भूमिका निभानी थी। चूंकि रालोद यूपीए का हिस्सेदार है, इसलिए कुछ हद तक किसानों की हमदर्दी हासिल होने का भरोसा था।
मुजफ्फरनगर-शामली में हिंसा के चलते पश्चिमी यूपी के सियासी समीकरणों में आए बदलाव की रही-सही कसर रशीद मसूद की सजा ने पूरी कर दी।
सजा का समय भी ऐसा जब मुसलमानों में प्रदेश सरकार से नाराजगी बढ़ी है। कई प्रमुख मुस्लिम संगठन सपा सरकार को बर्खास्त करने की मांग उठा चुके हैं।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी पीड़ितों के जख्मों पर मरहम लगाकर हमदर्दी बटोर चुके हैं।
मसूद जैसे नेता इस हमदर्दी को कांग्रेस के वोट में बदलने में अहम भूमिका निभा सकते थे। वह दंगे से पैदा हुए जख्म भरने में भी काम आते।
कांग्रेस वहां जिस चेहरे को आगे करके परचम लहराने का ख्वाब संजो रही थी, वह विवादित हो गया। उनके जैसा कद और अनुभव वाला कोई दूसरा नेता पश्चिम में कांग्रेस केपास नहीं है। अब कांग्रेस केसामने संकट रहेगा कि किस चेहरे को आगे करके चुनाव लड़ा जाए।
उसके पास कोई ऐसा निर्विवाद और कद्दावर मुस्लिम नेता नहीं है जो रशीद मसूद की तरह भाजपा के साथ ही आजम और मुलायम पर सीधे हमले कर सके। सपा और भाजपा के बड़े नेताओं को एक-दूसरे का मददगार साबित कर सके।
काजी परिवार बंटा, शादान की चुनौतियां बढ़ीं
रशीद मसूद की सजा के बाद काजी परिवार सियासी तौर पर भी बंट गया। उनके बेटे शादान का कॅरियर भी दांव पर है। बदले हालात का फायदा उठाने में सपा ने जरा भी देर नहीं की।
सीबीआई कोर्ट ने 19 सितंबर को रशीद मसूद को दोषी ठहराया और सपा ने 21 सितंबर को उनके भतीजे, पूर्व विधायक इमरान मसूद को सहारनपुर से लोकसभा प्रत्याशी घोषित कर दिया। इससे मसूद को दोहरा झटका लगा।
सजायाफ्ता होने के कारण वह खुद तो चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। अब उनके बेटे शादान मसूद की राह भी मुश्किल हो सकती है। यदि वह लोकसभा चुनाव में उतरे तो भी काजी परिवार न केवल पहली बार दो जगह बंटा दिखाई देगा बल्कि आमने-सामने भी होगा।
सियासत के जानकार अभी पश्चिम के उलझे समीकरणों पर दावे के साथ कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं है। इतना जरूर है कि इमरान को लाने के बाद भी सपा की राह आसान नहीं है।
फिरोज आफताब का टिकट कटने से सहारनपुर में मुस्लिमों की आबादी में सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखने वाली गाढा बिरादरी सपा के खिलाफ लामबंद हो गई है। इनका रुझान समीकरणों पर असर डाल सकता है।
आजम से रहा छत्तीस का आंकड़ा
रशीद मसूद कई साल सपा में रहे लेकिन उनका आजम खां से छत्तीस का आंकड़ा रहा। दोनों नेताओं की छवि और सियासत का अंदाज जुदा है। पिछले विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण में उनकी नहीं चली तो उन्होंने आजम को सीधे निशाने पर ले लिया।
बाद में मुलायम को भी कटघरे में खड़ा किया। दिसंबर 2012 में वह कांग्रेस में शामिल हो गए। मुजफ्फरनगर दंगे में आजम आरोपों से घिरे लेकिन रशीद मसूद विवादों से दूर रहे। हालांकि, हिंसा का यह दौर ऐसे समय चला जब मसूद राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी कानूनी जंग झेल रहे थे।