सहकारी ग्राम्य विकास बैंक पर कब्जे को लेकर सियासी दांवपेंच, दिलचस्प हुआ परिदृश्य
सहकारी ग्राम्य विकास बैंक के चुनाव की घोषणा होते ही इस पर कब्जे को लेकर सियासी दांवपेंच तेज हो गए हैं। सत्ताधारी भाजपा की कोशिश दूसरी सहकारी संस्थाओं की तरह इस पर अपने लोगों को बैठाने की है। दूसरी तरफ विपक्ष ने लंबे समय से बैंक की राजनीति करने वाले पूर्व मंत्री शिवपाल सिंह यादव के खेमे की अगुवाई में भाजपा का रास्ता रोकने के लिए कायदे-कानून का पेंच फंसाना शुरू कर दिया है।
इस खेमे ने सहकारी समिति निर्वाचन आयोग, निबंधक सहकारिता और प्रबंध निदेशक सहकारी ग्राम्य विकास बैंक सहित सभी जगह इन सदस्यों की वैधानिकता को चुनौती देते हुए आपत्ति भेजी है। सहकारी ग्राम्य विकास बैंक की राजनीति को लेकर हर सरकार के समय भारी उठापटक होती है।
लेकिन बीच में एक-दो साल को छोड़ दें तो बैंक पर 1991 से अब तक ज्यादातर समय शिवपाल का ही कब्जा रहा है। सिर्फ 1998 में भाजपा के सुरजन लाल वर्मा बैंक के सभापित बने थे। इस बार ऐसा लगा था कि शायद भाजपा के रास्ते में कोई बाधा न आए क्योंकि सहकारिता चुनाव के धुरंधर माने जाने वाले शिवपाल व सपा इस समय अलग-अलग हैं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
शिवपाल खेमे के प्रमुख चेहरे व बैंक के पूर्व उपसभापति राकेश सिंह ने बख्शी का तालाब में बनाए गए नए सदस्यों की वैधानिकता पर सवाल उठाने के बहाने सदस्यों की अर्हता पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने 2013 के बाद बने सदस्यों को अयोग्य बताते हुए पेंच फंसाने की कोशिश की है।
ये थी भाजपा की रणनीति
सिंह की आपत्ति पर क्या होता है, यह तो भविष्य बताएगा। पर, ताजा घटनाक्रम से ये चुनाव खासे दिलचस्प होते जा रहे हैं। बता दें, पहले यह बैंक राज्य सहकारिता निबंधक के यहां पंजीकृत था और एक राज्य स्तरीय संस्था थी। लेकिन उत्तराखंड अलग राज्य बनने से बैंक की कुछ शाखाएं वहां रह गईं।
दूसरे राज्य में शाखाएं होने के नाते केंद्रीय सहकारिता निबंधक ने इसे बहुराज्यीय संस्था घोषित कर दिया और तत्कालीन बोर्ड ने सदस्य बनाने और ऋण स्वीकृत करने का अधिकार भी सभी शाखाओं पर शाखा सदस्य की अध्यक्षता में बनी समिति को दे दिया था। 2012 में प्रदेश में सपा सरकार बनने के बाद 2013 में बैंक को भी राज्य निबंधक के यहां पंजीकृत कराते हुए इसे राज्यस्तरीय संस्था अधिसूचित कर दिया गया।
सरकार बनने पर अन्य सत्तारूढ़ दलों की तरह भाजपा ने भी सहकारी संस्थाओं पर चुनाव के जरिए अपने लोगों की ताजपोशी शुरू कराई। सहकारी ग्राम्य विकास बैंक की प्रबंध समिति पर भी अपने लोगों को बैठाने के लिए सदस्य बनाए। अब जब चुनाव घोषित हो गया है तो नए सदस्यों की सदस्यता पर सवाल उठाया गया है। ऐसे में सहकारी समिति निर्वाचन आयोग का फैसला अहम भूमिका निभाएगा।