मोदी के लखनऊ दौरे के पीछे है एक खास सियासी मकसद
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प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी शुक्रवार को पहली बार लखनऊ में होंगे। वैसे तो उनकी यह यात्रा पूरी तरह गैर राजनीतिक है, लेकिन जिस तरह का कार्यक्रम है, उसे देखते हुए साफ है कि इस दौरे के सियासी मायने भी हैं। मोदी ने इस दौरे को 2017 के चुनावी समीकरण साधने का जरिया भी बनाने की तैयारी की है।
प्रधानमंत्री मोदी अपने संबोधनों के दौरान क्या बोलेंगे, यह तो शुक्रवार को साफ होगा, पर उनका दौरा जिस तरह डॉ. अंबेडकर के नाम से शुरू होकर अंबेडकर के नाम पर ही खत्म हो रहा है, उससे अपने साफ है कि मोदी ने बहुत ही करीने के साथ समीकरण साधने का खाका खींचा है।
उनके कार्यक्रम के स्वरूप को देखकर लगभग याद आ जाती है डेढ़ साल पहले बतौर भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के मुंह से निकली वह बात, ‘अटल सही कहते थे कि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश और लखनऊ से होकर जाता है। यह तभी होगा जब हमलोग शिक्षा, समरसता और रोजगार पर काम करें। उनकी बात में बड़ा वजन है। समृद्ध भारत का सपना तभी पूरा होगा जब हमारा उत्तर प्रदेश समृद्ध होगा। भाजपा को मजबूती भी तभी मिलेगी जब उत्तर प्रदेश में मजबूत होंगे। यहां की नींव मजबूत होगी। सरकार बनी तो अटल की राह पर यूपी संवरेगा और लखनऊ भी बनेगा।' ऐसा लगता है कि मोदी ने उसी राह पर चलते हुए लखनऊ के लिए अपने दौरे का एजेंडा सेट किया है।
ये देखिए बानगी, तीन मोर्चों पर संदेश देने की कोशिश
मोदी का लखनऊ दौरा बाबा साहब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में दीक्षांत समारोह में हिस्सा लेने के साथ शुरू होगा। इसके बाद वे ई-रिक्शा वितरण कार्यक्रम का शुभारंभ करेंगे।
तीसरा कार्यक्रम अंबेडकर स्मारक में बाबा साहब के अस्थिकलश पर पुष्पांजलि अर्पित करने का है। गौर करें तो एक कार्यक्रम शिक्षा, दूसरा रोजगार और तीसरा सामाजिक समरसता से जुड़ा है।
साफ है, मोदी को पता है कि लखनऊ उत्तर प्रदेश की राजधानी है। यहां का संदेश पूरे प्रदेश की सियासत को प्रभावित कर सकता है। शायद इसी वजह से उन्होंने लखनऊ दौरे से तीनों ही मोर्चों पर सियासी संदेश देने का खाका खींचा है।
संघ ने पहले से ही तैयार कर रखी है जमीन
अगर अंबेडकर महासभा जाने के मोदी के कार्यक्रम को संघ परिवार में चल रहे कुछ कार्यक्रमों से जोड़ें तो यह साफ तौर से समझ में आ सकता है कि इसमें कहीं न कहीं राजनीतिक लक्ष्य और यूपी में 2017 की चुनावी चिंता भी छिपी हुई है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरफ से दलित बस्तियों में काम बढ़ाने की चिंता, विश्व हिंदू परिषद की ओर से शुरू किया गया छुआछूत विरोधी अभियान, सामूहिक समरसता भोज और केंद्र सरकार द्वारा अंबेडकर से जुड़े स्थलों के विकास के लिए किए जा रहे काम तथा अब लखनऊ में स्मारक में रखे अस्थिकलश पर पुष्पांजलि के पीछे कहीं न कहीं 2017 के लिए सूबे की 24 प्रतिशत दलित आबादी को अपनी तरफ आकर्षित करने की कोशिश ही दिखती है। यह सब वे यूं ही नहीं कर रहे हैं।
उन्हें पता है कि सूबे की दलित आबादी के बड़े हिस्से को अगर वे बसपा से अलग करके अपने साथ जोड़ लें और पिछड़ों को साथ ले लें तो यूपी में सरकार बनाने का सपना आसानी से साकार हो सकेगा।