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अपमान से बुरी तरह आहत हैं मुलायम, दे रहे नए सियासी संकेत

Sun, 02 Apr 2017 08:52 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sun, 02 Apr 2017 08:52 PM IST
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 Political indications after Mulayam specch in mainpuri.
मुलायम सिंह यादव व अखिलेश यादव

पिछले 50 साल से राजनीति की मुख्य धारा में रहने वाले मुलायम सिंह यादव काफी आहत हैं। शनिवार को मैनपुरी में ‘अपनों’ के बीच ‘अपनों’ से मिला उनका दर्द छलक उठा।

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उन्होंने मैनपुरी से अगली लड़ाई लड़ने का संकेत भी दिया। माना जा रहा है कि समाजवादी पार्टी में हाशिए पर आए मुलायम व शिवपाल यादव सियासत की नई धारा बहा सकते हैं।
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मुलायम 1967 में पहली बार यूपी से विधायक चुने गए थे। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वे विधानमंडल के दोनों सदनों में नेता प्रतिपक्ष रहे। मुख्यमंत्री, देश के रक्षा मंत्री जैसे ओहदों पर रहे।
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उन्होंने अपने परिवार को भी राजनीति में खूब आगे बढ़ाया। उनके परिवार से 6 सांसद, एक विधायक समेत 21 लोग किसी न किसी पद पर हैं। मुलायम ने 1992 में समाजवादी पार्टी की स्थापना की थी। इसके रजत जयंती वर्ष में मुलायम को बड़ा झटका लगा।

अब भी नहीं दी जा रही मुलायम की राय को तवज्जो

 Political indications after Mulayam specch in mainpuri.
मुलायम सिंह यादव

1 जनवरी 2017 को सपा का विशेष अधिवेशन बुलाकर उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटा दिया गया। विधानसभा चुनाव में भूमिका सीमित कर दी गई।

उम्मीद थी कि चुनाव में करारी हार के बाद परिवार में एकजुटता होगी लेकिन मुलायम की कोशिशों के बावजूद इसकी संभावना फिलहाल धूमिल ही लग रही है। अब भी मुलायम की राय को तवज्जो नहीं दी रही। परिवार की इसी रार के चलते आने वाले वाले समय में कोई राजनीतिक फैसला हो सकता है।

शिवपाल ले सकते हैं कोई फैसला

 Political indications after Mulayam specch in mainpuri.

शिवपाल यादव सपा में हाशिए पर आ गए हैं। उन्हें मुलायम सिंह का सबसे भरोसेमंद माना जाता है। विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें मंत्री पद से हटा दिया गया था। एक जनवरी 2017 को प्रदेश अध्यक्ष पद से भी हटा दिया गया।

अखिलेश यादव के हाथ में पार्टी की कमान आने के बाद विधानसभा चुनाव में शिवपाल के नजदीकी लोगों के टिकट काट दिए गए थे। जिला और प्रदेश स्तर पर संगठन में उनके करीबियों का पत्ता साफ हो चुका है। चुनाव में शिवपाल अपने निर्वाचन क्षेत्र जसवंतनगर तक सीमित रहे।

तीसरे चरण में वहां चुनाव हो जाने के बावजूद वे कहीं प्रचार के लिए नहीं निकले। चूंकि अखिलेश यादव से उनके संबंध ठीक नहीं थे, इसलिए किसी ने उन्हें बुलाना तो दूर, बातचीत करना भी मुनासिब नहीं समझा।

शिवपाल ने विधानसभा चुनाव के दौरान संकेत दिया था कि यदि पार्टी में सम्मान न मिला तो नई पार्टी बनाने का विकल्प खुला हुआ है। पार्टी ने उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष नहीं बनाया। राष्ट्रीय कार्यकारिणी में उन्हें शामिल नहीं किया गया है। ऐसे में वह कोई राजनीतिक फैसला ले सकते हैं। यह फैसला मुलायम की सहमति से ही होगा।

मुलायम की पीड़ा यूं ही नहीं

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मुलायम सिंह यादव

मुलायम ने मैनपुरी में शनिवार को यूं ही पीड़ा जाहिर नहीं की है। उनकी आंखों से छलके आंसुओं के मायने हैं। मैनपुरी मुलायम का कर्मक्षेत्र रहा है। इसी सीट से सबसे ज्यादा वोटों से जीतकर वह लोकसभा पहुंचते रहे हैं।

उन्होंने कहा, ‘मैनपुरी के लोग अपने हैं। उन्हें कभी भूल नहीं सकता। ‘अपनों’ से मिले अपमान की पीड़ा भी इसीलिए ‘अपनों’ के बीच बयां कर रहा हूं।’ मुलायम ने लंबे समय बाद अखिलेश पर सीधा हमला किया। नाम लिए बिना रामगोपाल की हैसियत भी बताई।

मुलायम के इस रुख से माना जा रहा है कि वह अब शायद ही शांत बैठें। जैसा कि उन्होंने कहा, मैं हर लड़ाई की शुरुआत मैनपुरी से की है। अगली जंग की शुरुआत भी यहीं से होगी

योगी से अपर्णा और प्रतीक की मुलाकात के निकाले जा रहे मायने

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मुलायम सिंह के छोटे बेटे प्रतीक व बहू अपर्णा यादव की सीएम योगी आदित्यनाथ से नजदीकियां भी कुछ सियासी गुल खिला सकती हैं।

अपर्णा और प्रतीक पिछले सप्ताह जब योगी आदित्यनाथ से मिले तो भी इसके राजनीतिक मायने तलाश गए थे। शुक्रवार को योगी आदित्यनाथ के कान्हा उपवन में उनकी गौशाला में जाने के बाद इस चर्चा ने और जोर पकड़ ली है।

भाजपा में शामिल होने संबंधी सवाल का अपर्णा ने सीधे-सीधे जवाब नहीं दिया था। हो सकता है कि उनकी राह भगवा खेमे की ओर बढ़े।

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