ई राहुल कै माई तो होईं नाहीं बहुरिया है का...
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यूपी में बिछे चुनावी चौसर और उस पर हो रही सियासी बयानबाजी से इतर एक तबका ऐसा भी है, जिसके लिए सब कुछ अनोखा है।
राह चलते, किसी नुक्कड़ पर या किसी पार्टी कार्यालय की चौखट पर उसे नजर आने वाली सियासी हलचल एक अलग ही रूप लिए होती है।
उसके लिए न रैली अहम है, न उसमें दिए जाने वाले चुनावी चाशनी में लिपटे आंकड़े। उसके लिए आज भी रोटी, कपड़ा और मकान
मूलभूत समस्या है।
इसी बुनियादी सवाल के साथ अमर उजाला टीम घूम रही है प्रदेशभर में और आपके लिए इसी से निकाल रही है खास चुनावी चकल्लस।
ई सोनिया तौ लागत नाहीं...
कांग्रेस के चुनाव प्रचार अभियान की महिला सुरक्षा को लेकर किए गए एक वादे की होर्डिंग में राहुल की बड़ी-सी तस्वीर से सटी एक युवती की तस्वीर छपी है।
बादशाहनगर ओवरब्रिज से निशातगंज फ्लाईओवर पर आते हुए यह होर्डिंग साफ नजर आती है। बाराबंकी से अपनी बेटी का इलाज कराने आई इस महिला को किसी ने सिविल हॉस्पिटल जाने के लिए इसी फ्लाईओवर का रास्ता बता दिया।
60-62 की यह बुजुर्ग महिला अपनी बेटी के साथ इसी फ्लाईओवर के रास्ते पैदल जाते हुए होर्डिंग देखकर ठिठक गई। बेटी से पूछ बैठी, इम्मा का लिखा है।
कक्षा दस पढ़ी उसकी बिटिया ने बताया, ई राहुल गांधी हैं। चुनाव का प्रचार करि रहे हैं। माई ने पूछा, बेटी ...ई सोनिया तौ लागत नाहीं.. का राहुल की बहुरिया है ई..।
लड़की को यह नहीं पता कि ई न सोनिया हैं और न ही राहुल की बहुरिया। वह सामने से आ रहे एक मोटरसाइकिल वाले को रोक अपनी मां की जिज्ञासा शांत करने के लिए वही सवाल दुहराने लगी।
मोटरसाइकिल वाले ने सच्चाई बताई तो वह भी यह कह कर आगे बढ़ गई, हम तो इंदिरा के समय से इन्हीं लोगन का वोट देईत है।
हाथ जोड़कर दनादन पहुंचे ‘बारातियों’ ने छीना चैन
लखनऊ में सियासी समर की रणभेरी क्या बजी, हाथ जोड़े लकझक कुर्ता-पैजामा वालों की सेना सड़कों, गली-कूचों में निकल पड़ी।
चौराहे से लेकर यहां-वहां तक हर जगह फूल मालाओं से लदे बंदे बस वोट मांगते ही दिख रहे हैं।
लेकिन रामनवमी वाले दिन कानपुर रोड स्थित एक धार्मिक प्रतिष्ठान में चल रहे सामूहिक वैवाहिक आयोजन में फूल मालाओं से लदे स्पेशल बारातियों का जमघट एक के बाद एक वहां ऐसे पहुंचा कि आयोजकों का चैन छिन गया।
पहले तो वहां अपने कमल वाले छोटे ठाकुर जी समर्थकों के साथ हाथ जोड़कर पिताजी के लिये वोट बटोरने पहुंचे। वो निकले ही थे कि प्रदेश की बहिनजी के करीबी हाथी वाले पंडित जी भी लाव-लश्कर के साथ पहुंच गये।
पंडितजी ने बकायदा हर जोड़े के साथ फोटो खिंचवाई, भारी भरकम भीड़ देखकर कुछ वादे भी कर दिए। वो गेट से निकल ही रहे थे कि झाड़ु वाले साहबान का अमला दाखिल हो गया।
दो बारातियों के बेवक्त आने से खैरियाये जनातियों का चेहरा टीवी कलाकार को देख खिल गया। बच्चे भी कमर मचकाते, हाथ डुलाते उन्हीं केसाथ हो लिये।
इन सबके बीच आयोजन में व्यवस्थाएं देख रहे कुछ लोग एक के बाद एक पहुंचे इन बारातियों से उकताए तो सड़क पर जा विराजे तो वहां से खाकी वालों ने ये कहकर उन्हें भीतर समेट दिया कि ‘किनारे हो जाओ सूबे के मुखिया की फ्लीट निकलने वाली है..’।
... और खिसक लिए भाजपाई
राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव क्षेत्र होने की वजह से लखनऊ में ‘बाहरी’ भाजपाइयों का सैलाब आ गया है।
हर कोई यहां जिम्मेदारी चाहता है, छोटी हो या बड़ी। लेकिन स्थानीय संगठन उन्हें कोई तवज्जो नहीं दे रहा। एक ‘बाहरी’ नेता ने कुछ कार्यकर्ताओं से सेटिंग करके अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की।
वह इन कार्यकर्ताओं के साथ पार्टी के एक संगठन मंत्री के पास पहुंच गए और खुद को किसी विधानसभा क्षेत्र का प्रभारी बनाने की मांग कर डाली।
कार्यकर्ताओं ने भी हां में हां मिलाई। संगठन मंत्री ने उन्हें ध्यान से सुना और कार्यकर्ताओं से कहा, ‘आपकी बात नहीं टाल सकते। लेकिन नेताजी के रहने-खाने और घूमने के लिए गाड़ी की व्यवस्था तो आप लोगों को ही करनी होगी।
संगठन केवल उन्हीं नेताओं की व्यवस्था कर रहा है, जो पार्टी की योजना के तहत यहां भेजे गए हैं।’ इतना सुनते ही कार्यकर्ता एक-एक करके खिसक लिए। बेचारे ‘बाहरी’ नेता भी सिर खुजलाते हुए बाहर निकल गए। तब से दिखे नहीं हैं।