केजीएमयू में प्लाज्मा थेरेपी के ट्रायल के नतीजे सकारात्मक, डॉक्टरों में उत्साह
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राजधानी लखनऊ में प्लाज्मा थेरेपी को लेकर चिकित्सकों में उत्साह है। केजीएमयू में मरीजों पर इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की गाइडलाइन के तहत चल रहे ट्रायल में सकारात्मक नतीजे मिले हैं।
सूत्र बताते हैं कि अब तक करीब 12 मरीजों पर यह प्रयोग किया जा चुका है। ट्रायल में शामिल छह ऐसे मरीजों को ठीक करने में कामयाबी मिली है जो कई गंभीर बीमारियों की भी चपेट में थे। इन मरीजों पर अन्य दवाओं का असर नहीं हो रहा था। प्लाज्मा थेरेपी के बाद उनकी रिकवरी तेजी से बढ़ी। करीब आठ दिन बाद ये मरीज डिस्चार्ज होकर घर भी चले गए हैं। ट्रायल में शामिल मरीजों के घर जाने के बाद भी उनकी निगरानी की जा रही है।
ये सभी मरीज स्वस्थ बताए जा रहे हैं। दो दिन पहले बीएचयू को भी केजीएमयू से एक यूनिट प्लाज्मा उपलब्ध कराया गया है। राजधानी में प्लाज्मा थेरेपी की शुरुआत 26 अप्रैल को की गई थी। केजीएमयू के कोरोना वार्ड में भर्ती उरई निवासी चिकित्सक को पहली खुराक दी गई थी। हालांकि उस चिकित्सक को बचाया नहीं जा सका, लेकिन इस प्रयोग के बाद केजीएमयू को प्लाज्मा थेरेपी के ट्रायल के लिए मंजूरी मिल गई।
पीजीआई में भी डोनेशन शुरू, तीन मरीजों ने डोनेशन किया
एसजीपीजीआई में अब तक तीन मरीजों ने डोनेशन किया है। यहां एक मरीज को प्लाज्मा थेरेपी देने की तैयारी की गई थी, लेकिन कुछ तकनीकी कारणों से उसे थेरेपी नहीं दी गई। पीजीआई प्रशासन की ओर से आईसीएमआर के नियमों को लेकर लगातार मशविरा चल रहा है। अगले सप्ताह यहां भी प्लाज्मा थेरेपी देने की उम्मीद है।
लोहिया संस्थान भी तैयारी में : कोरोना मरीजों से प्लाज्मा डोनेशन कराने के लिए लोहिया संस्थान ने भी सभी तकनीकी कार्रवाई पूरी कर ली है। आईसीएमआर से भी संस्तुति ली गई है। हालांकि अभी तक यहां कोरोना से ठीक होने वाले मरीज से प्लाज्मा डोनेशन नहीं कराया गया है।
जानिए, क्या होता है प्लाज्मा
खून में रेड ब्लड सेल्स, व्हाइट ब्लड सेल्स, प्लेटलेट्स और प्लाज्मा होता है। हर किसी के खून में 50 से 55 फीसदी प्लाज्मा होता है, जिसमें करीब 92 प्रतिशत पानी होता है। सात फीसदी वाइटल प्रोटीन और बचे हुए भाग में विटामिंस, हार्मोंस, फैट होता है। कोई मरीज कोरोना से ठीक हो जाता है तो उसके शरीर में कोरोना वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी तैयार हो जाती है, जो वायरस से लड़ने में कारगर होती है। कोरोना से स्वस्थ हुए व्यक्ति का प्लाज्मा बीमार को दिया जाता है तो उसका भी शरीर वायरस के खिलाफ लड़ने में सक्षम हो जाता है। स्टेम सेल्स इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। शरीर से प्लाज्मा निकालने के लिए चिकित्सा संस्थानों में मशीन लगी हुई है। इसे फेरेसिस तकनीक कहा जाता है। यह मशीन खून से प्लाज्मा या प्लेटलेट्स को निकालकर बाकी खून को शरीर में वापस डाल देती है।
समझिए, डोनेशन की प्रक्रिया
कोरोना से ठीक होने के बाद मरीज की दो बार जांच होती है। शरीर के एंटीबॉडीज देखने के बाद दो हफ्ते के बाद संबंधित व्यक्ति को डोनेशन के लिए बुलाया जाता है। 18 से 50 साल की उम्र वाला व्यक्ति डोनेशन कर सकता है। इस दौरान उसकी सभी प्रमुख बीमारियों की जांच कराई जाती है। आईसीएमआर की गाइडलाइन में यह भी कहा गया है कि जो महिलाएं मां बन चुकी हैं, उनका प्लाज्मा न लिया जाए। इसी तरह डायबिटीज, कैंसर, दिल और हाइपरटेंशन के मरीजों के साथ ही जिनका बीपी 140 से ज्यादा है, वे प्लाज्मा नहीं दे सकते।
इतिहास : 1890 में हुई थी प्लाज्मा की खोज
जर्मनी के फिजियोलॉजिस्ट एमिल वॉन बेह्निंग ने 1890 में प्लाज्मा की खोज की। इसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार भी मिला था। इसके बाद से प्लाज्मा के जरिये मरीजों को ठीक करने की प्रक्रिया शुरू की गई। केजीएमयू में वर्ष 2018 से अब तक करीब 12 किडनी, दो टिटनेस और अन्य संक्रामक बीमारियों के मरीजों पर भी प्लाज्मा थेरेपी कारगर साबित हुई है।
मैंने भी डोनेट किया प्लाज्मा
केजीएमयू के रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. तौसीफ का कहना है कि केजीएमयू में मरीज का इलाज करते वक्त मैं वायरस की चपेट में आ गया था। ठीक होने के बाद मैंने प्लाज्मा डोनेट किया। उस वक्त रोजा चल रहा था फिर भी मैं पीछे नहीं हटा। मैं पूरी तरह स्वस्थ हूं। कोरोना से स्वस्थ होने वाले हर किसी को प्लाज्मा डोनेट करना चाहिए।
19 लोग कर चुके हैं प्लाज्मा डोनेट
केजीएमयू में अब तक 19 लोग प्लाज्मा डोनेट कर चुके हैं। यहां से ठीक होने वाले मरीजों को प्लाज्मा डोनेशन के लिए प्रेरित किया जाता है। काउंसलिंग से लोग डोनेशन के लिए आगे आ रहे हैं। यहां जीआरपी के पांच सिपाही भी प्लाज्मा डोनेट कर चुके हैं। कई लोगों के नामांकन कर लिए गए हैं। हमारा प्रयास है कि दूसरे संस्थानों को भी प्लाज्मा उपलब्ध कराएं। मरीजों पर इसके परिणाम सकारात्मक मिल रहे हैं।
डॉ. तूलिका चंद्रा, विभागाध्यक्ष, ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन