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पीलीभीत एनकाउंटर: कोई फोटो देखकर जिंदा रहा तो कोई बच्चों की खातिर

Tue, 05 Apr 2016 12:51 PM IST
विवेक त्रिपाठी/अमर उजाला, लखनऊ
विवेक त्रिपाठी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Tue, 05 Apr 2016 12:51 PM IST
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pilibhit encounter victim's family shres experience
पुल‌िस ने छीना सहारा - फोटो : Amar Ujala

पीलीभीत में 25 साल पहले हुई फर्जी मुठभेड़ में पुलिस ने किसी की मांग का सिंदूर उजाड़ दिया तो किसी के बुढ़ापे की लाठी छीन ली। औलादों के आतंकवादी होने का कलंक अलग से लग गया। हालात कुछ ऐसे कर दिए कि फर्जी मुठभेड़ में मारे गए लोगों के परिजनों का जीना मुश्किल हो गया था। 

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समाज ने उन्हें अलग-थलग कर दिया। जहां जाते, लोग मुंह फेर लेते। पड़ोसियों के साथ हुक्का-पानी बंद हो गया। जो रोजाना घर आते थे, उन्होंने गली ही छोड़ दी। ताने कसने वालों ने भी कसर बाकी नहीं रखी। 
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जिंदगी बेगैरत सी लगने लगी। इन मुश्किल हालातों में भी यह परिवार बिखरे नहीं। कोई लाडले की फोटो देख-देखकर जिया तो कोई बच्चों की खातिर जिंदा रहा। सभी का मकसद था इंसाफ। 
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25 साल में न जाने कैसे-कैसे हालातों से सामना हुआ। गिरते-जूझते जीत की दहलीज तक पहुंचे यह परिवार आज भी संभल नहीं सके हैं। इनके जख्म आज भी हरे हैं। अमर उजाला से बातचीत में सबने अपना दर्द बयां किया।

मेरे सामने पति को बस से खींच ले गई थी पुलिस

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पुल‌िस ने पत‌ि को बस से खींचकर उतारा - फोटो : Amar Ujala

पंजाब के गुरुदासपुर के अर्जुनपुर निवासी बलजीत सिंह (24) के साथ पत्नी बलविंदरजीत कौर, मां सुरजीत कौर और छोटा भाई जसवंत भी तीर्थयात्रा पर गए थे।

बलविंदरजीत ने बताया कि उसकी शादी मात्र सात महीने पहले ही हुई थी। वह दो महीने की गर्भवती थी। सुबह करीब आठ बजे पुलिस ने बस को घेरकर रुकवा लिया।

उसके पति व अन्य लोगों को बस से खींचकर उतार लिया। बस में सवार युवकों को पुलिस एक दूसरी बस में बैठाकर अपने साथ ले गई। बस में सिर्फ महिलाएं बचीं, दिन भर बस में घुमाने के बाद देर शाम पीलीभीत में एक गुरुद्वारे में महिलाओं को छोड़ दिया गया। 

पति के बारे में पूछने पर बताया गया कि छानबीन पूरी होने के बाद छोड़ दिया जाएगा। तीन दिन बाद पता चला कि पति सहित बस से उतारे गए सभी लोगों को एनकाउंटर में मार दिया गया है।

बकौल बलविंदरजीत, सात महीने बाद बेटा हुआ जिसका नाम यशवंत सिंह है। इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन से बीटेक किया है और इस समय नौकरी की तलाश कर रहा है। बलजीत की मां इस मुकदमे की गवाह थीं। बेटे की लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने से पहले ही उन्होंने दम तोड़ दिया।

ससुर विक्षिप्त हुए तो बहू ने लड़ी इंसाफ की लड़ाई

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परमजीत कौर: जेठ के ल‌िए लड़ी लड़ाई - फोटो : Amar Ujala

पंजाब के मानिकपुर निवासी सरदार करनैल सिंह के जवान बेटे सुरजा सिंह को पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में मार दिया था। 

इस घटना ने परिवार को तोड़कर रख दिया। कुछ महीने बाद ही सुरजा के छोटे भाई जसवीर सिंह की परमजीत कौर से शादी हुई। 

परमजीत कौर सोमवार को कोर्ट आई थीं। उन्होंने बताया कि जब ससुराल आई थीं तो जेठ की हत्या का दर्द सबके चेहरे पर महसूस किया। 

ससुर सरदार करनैल सिंह की मानसिक स्थिति धीरे-धीरे बिगड़ती जा रही थी। उधर, पति जसवीर भी शराब का लती होता जा रहा था। ऐ

से में जेठ जी के लिए इंसाफ की लड़ाई की बागडोर परमजीत ने अपने हाथ में ले ली। आज 25 साल बाद जब इंसाफ हुआ तो उसके चेहरे की खुशी देखने लायक थी। परमजीत कौर ने कहा कि बीते 25 साल में जो भी कष्ट झेला, सब एक पल में मिट गया।

बेटा चला गया तो बहू को बेटी की तरह पाला

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अजीत स‌िंह - फोटो : Amar Ujala

पंजाब के गुरुदासपुर सतपोहा गांव में रहने वाले सरदार अजीत सिंह आज भी बेटे हरमिंदर सिंह मिंटा की याद में तड़प रहे हैं। उनका गला रुंध जाता है। 


होंठ कांपने लगते हैं। आंखें झर-झर बहने लगती हैं। मुंह से शब्द नहीं निकलते। सीबीआई कोर्ट में भी उनकी यही हालत दिखी।

अजीत ने भर्राए गले से बताया कि मिंटा एक प्राइवेट शुगर मिल में काम करता था। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी इसलिए वह दुबई जाकर नौकरी करना चाहता था।
 
उसने पासपोर्ट भी बनवा लिया था। दुबई जाने से पहले वह तीर्थयात्रा पर गया और कभी लौटकर नहीं आया। उन्होंने बताया कि मिंटा की शादी हुए सात महीने ही हुए थे।

पुलिसवालों ने जब उसे आतंकवादी बताकर मार डाला तब बहू स्वर्णजीत तीन महीने की गर्भवती थी। मिंटा की मौत के पांच महीने बाद उसने बेटी को जन्म दिया। बेटे के जाने के बाद स्वर्णजीत ही सबकुछ थी। 

उसे बेटी की तरह रखा। मिंटा की बेटी कुछ बड़ी हुई तो बहू ने नौकरी कोशिशें शुरू कर दीं। उसने नर्सिंग का कोर्स करने को कहा तो कहीं से रकम का इंतजाम किया। आज वही घर का खर्च चला रही है।

बेटे को इंसाफ दिलाने की खातिर बेच दिए जमीन-गहने

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संतोख स‌िंह: बेटे के ल‌िए बेच द‌िया सबकुछ - फोटो : Amar Ujala

संतोख सिंह उम्र के अंतिम पड़ाव में हैं लेकिन बेटे मुखविंदर सिंह को इंसाफ दिलाने के लिए एक पल भी जोश कम नहीं हुआ। 

उन्होंने बताया कि मुखविंदर तीन बेटों में मंझला था और लकड़ी की काश्तकारी करता था। उसकी शादी नहीं हुई थी। बेटे की हत्या ने पूरे परिवार को झकझोर दिया। उसी वक्त लगा था कि पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में उसे मार डाला।

सबने मिलकर फैसला किया कि चाहे कुछ भी हो जाए, अंतिम सांस तक इंसाफ की जंग लड़ेंगे। मुकदमा लड़ने के लिए पैसा कहां से आया? इस सवाल ने संतोख को विचिलित कर दिया। बोले, क्या-क्या बताएं। 

25 साल में जो गया कभी गिना ही नहीं। जमीन बेच डाली। गहने गिरवी रख दिए। संतोष इस बात का है कि बेटे को इंसाफ दिलाकर ही दम लिया।

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