लोकतंत्र सेनानी बोले, अंग्रेजों की बर्बरता से कम नहीं थे आपातकाल के दौरान हुए अत्याचार
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44 साल हो गए आपातकाल के। तब जेल जाने वाले, उत्पीड़न और अत्याचार का शिकार बने किशोर आज बुढ़ापे की ओर हैं। युवा पूरी तरह बुढ़ा गए। जो बुजुर्ग थे, उनमें शायद ही आज कुछ जीवित हों। भुक्तभोगियों की मानें तो आपातकाल में हुए अत्याचार आजादी के आंदोलन में अंग्रेजी हुकूमत की तरफ से स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के साथ हुई बर्बरता से कम नहीं थे।
तब कई को झूठे मुकदमों में फंसाकर फांसी के फंदे पर लटका दिया गया था। आपातकाल में झूठे मुकदमों में बंद वरिष्ठ समाजवादी रामसागर मिश्र और मलिहाबाद के पास महमूदनगर के हिदायत अली जैसे कई लोगों की जेल में ही मौत हो गई।
आपातकाल के विरुद्ध तत्कालीन शासन व प्रशासन के अत्याचारों को झेलने वालों का कहना है कि 2006 में मुलायम सिंह यादव सरकार ने उन्हें ‘लोकतंत्र सेनानी’ नाम दिया। मुफ्त बस यात्रा की सुविधा और पेंशन भी शुरू की। सवाल सुविधाओं का नहीं, बल्कि आपातकाल के इतिहास को भावी पीढ़ी तक पहुंचाने का है, इसलिए केंद्र सरकार कुछ दे या न दे लेकिन लोकतंत्र सेनानियों को पहचान तो दे और यह विषय पाठ्यक्रम में शामिल हो, ताकि दोबारा कभी ऐसी स्थिति बने तो लोगों में यह भरोसा रहे कि वे विरोध करेंगे तो आगे उनके संघर्ष का सम्मान होगा।
भाजपा से ज्यादा उम्मीद थी कि लोकतंत्र सेनानियों को सम्मान देगी
लखनऊ के पूर्व महापौर डॉ. दाऊजी गुप्त कहते हैं, जेल जाने या वहां हुए अत्याचारों का कोई दुख नहीं है। मुझे संतोष है कि लोकतंत्र बहाली के लिए जेल गया। पर, दुख इस बात का जरूर है कि वे लोग भी उन क्षणों के इतिहास को भावी पीढ़ी को बताने व समझाने के लिए चिंतित नहीं दिखते हैं जिनका कांग्रेस से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रहा।
मौजूदा केंद्र सरकार से विशेष रूप से यह उम्मीद थी कि आपातकाल के सेनानियों को पहचान व सम्मान देगी। आपातकाल को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाएगी जिससे भावी पीढ़ी यह जान सके कि स्वतंत्र भारत में जब एक शासक ने संविधान की धज्जियां उड़ाने की कोशिश की तो उसका प्रतिकार किस तरह हुआ। आपातकाल के बाद की एक सरकार ने कैसे लोकतंत्र सेनानियों के संघर्ष को सम्मान दिया, लेकिन अब तक इस दिशा में कुछ न हुआ।
भावी पीढ़ी को यह पता चलना ही चाहिए कि वे दिन कैसे थे?
छात्र नेता रहे निर्मल सिंह भी आपातकाल के दौरान जेल में बंद रहे। वे बताते हैं, ‘माया सरकार में दायर एक याचिका पर हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने भी कहा है कि आपातकाल के दौरान संघर्ष करने वालों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए।’
बकौल निर्मल राज्य सरकारों ने आपातकाल सेनानियों को सम्मान दिया है। केंद्र सरकार कुछ और नहीं तो भावी पीढ़ी तक यह जानकारी पहुंचाने के लिए कदम उठाए। गोरखपुर के श्याम तिवारी कहते हैं कि आपातकाल के किसी बंदी की तबीयत खराब होती और जमानत मिल जाती तो प्रशासन रिहा होने से पहले ही दूसरी धारा ठोंक देता। उससे जमानत लेता तो तीसरी धारा लगा दी जाती। यह उम्मीद ही खत्म हो चुकी थी कि कभी जेल से बाहर आ पाएंगे। भावी पीढ़ी को यह पता चलना ही चाहिए कि वे दिन कैसे थे?
ऐसे कौन जानेगा उन अत्याचारों के बारे में
विद्यार्थी परिषद के जरिये छात्र राजनीति कर रहे राजेंद्र तिवारी बताते हैं कि अंग्रेजों से कम जुल्म इंदिरा गांधी ने भी नहीं कराए। बरेली के वीरेंद्र अटल के नाखून उखाड़ लिए गए। निर्मल सिंह के मुंह में अंगोछा ठूंसकर पिटाई की गई।
लविवि के प्रो. आरसी नागपाल को यातनाएं दी गईं। लखनऊ के किशन लाल को पेशाब पिलाई गई और नाखून नोच लिए गए। लखीमपुर के स्वदेश कुमार के शरीर को कई जगह से जला दिया गया। ये जुल्म युवा पीढ़ी नहीं जाती है।
पूर्व मंत्री शारदा प्रताप शुक्ल कहते हैं कि यह विषय पाठ्यक्रम में शामिल हो जिससे पता चले कि जेल में बंद समाजवादी नेता रामसागर मिश्र की मौत के बाद भी प्रशासन उनकी लाश परिवार को इसलिए नहीं देना चाहता था कि मीसा लगा है। मतलब लाश पर भी मीसा।
'इंदिरा गांधी के सत्ता बचाव अभियान का हिस्सा था आपातकाल'
लोकतंत्र सेनानी इसलिए केंद्र सरकार से पहचान, सम्मान, सुविधाएं और केंद्र व राज्य सरकारों से इस विषय को पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग कर रहे हैं जिससे कभी किसी सरकार का मुखिया इंदिरा जैसा कदम उठाए तो लोगों में विरोध का हौसला रहे।