खाने-पीने की चीजों को लेकर परेशान हो रहे हैं नेपाल के लोग
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नेपाल में आए भूकंप की जमीनी हकीकत देख रूह कांप गई। वहां पर फंसे लोग एक पल भी रूकना नहीं चाहते हैं। खाने पीने की चीजों से लेकर हर चीज दुश्वार है।
जिंदगी को बचाने की जद्दोजहद का आलम ये है कि लोग टकटकी लगाए देख रहे हैं कि कौन सी बस या गाड़ी उनको इस बर्बाद हो चुके नेपाल से बाहर निकाल दे। अपना सब कुछ लुटा और गवां चुके लोग अब जान बचाने के लिए भूखे प्यासे दौड़ रहे हैं।
ये दास्तां चारबाग रोडवेज डिपो की बस लेकर लौटे ड्राइवर अब्दुल करीम की है। वह बताते हैं कि रविवार रात को वे बस लेकर रवाना हुए और सोमवार रात को दस बजे काठमांडू पहुंचे। नेपाल सीमा में घुसते ही बर्बादी और मौत का सन्नाटा टूट जाता है।
हर ओर अजीब सी शांति है और लोग सिर्फ तबाह हो चुके इलाकों से दूर हो जाना चाहते हैं। करीम बताते हैं कि सिनहौली बॉर्डर से 60 पैसेंजर लेकर निकले तो लोगों के चेहरे पर ऐसी खुशी दिखी जैसे वो अपना सब कुछ पा चुके हैं।
बस में बैठते ही बिलख-बिलख कर रोए लोग
कुछ परिवार ऐसे भी थे जो बस में बैठने के बाद बिलख-बिलख कर रो रहे थे और यही आवाज आ रही थी कि अब सब खत्म हो गया। हर तरफ हड़कंप मचा हुआ था। खाने पीने की चीजें इतनी महंगी हैं कि जिसके पास पैसे न हो वो भूखे प्यासे खत्म हो जाएगा।
प्यास लगी तो पानी की बोतल 100 में मिली। भूख लगी तो दाल रोटी और सब्जी की थाली के लिए 300 रुपए चुकाए। जिसके पास पैसे हैं वो जैसे तैसे सांस ले रहा है लेकिन भूकंप त्रासदी से पीड़ित लोग एक एक दाने को तरस रहे हैं।
सभी 60 सवारी को बुधवा को दोपहर एक बजे गोरखपुर में उतार दिया। गोरखुपर में सवारियों के उतरने के बाद आराम किया और रात आठ बजे चारबाग पहुंचे। बिना रूके 72 घंटे तक लगातार बस चलाई।
थकान हुई, लेकिन लोगों की जिंदगी बचाने की खुशी ने इतना जोश और उमंग भर दिया था कि थकावट फीकी पड़ गई थी। वह बताते हैं कि अभी भी सैकड़ों लोग वहां फंसे हैं और जिंदगी बचाने वालों की राह देख रहे हैं।