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सियासी दलों की नजरों से दूर ये छोटी जातियां पलट सकती हैं चुनाव की बाजी

Wed, 01 Mar 2017 02:14 PM IST
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ Updated Wed, 01 Mar 2017 02:14 PM IST
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other castes neglected parties may change scene of election
डेमो प‌िक - फोटो : demo
प्रदेश में कई ऐसी जातियां हैं, जिन्हें सियासी तौर पर कमजोर माना जाता रहा है। पूर्वांचल के हर विधानसभा क्षेत्र में इनकी मौजूदगी है, लेकिन इनके मतदाताओं की संख्या कम होने की वजह से सियासी दल अति पिछड़ी श्रेणी में आने वाली इन जातियों को वोट बैंक नहीं मानते। 
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मौजूदा चुनाव में भी ये जातियां सियासी दलों के एजेंडे से बाहर हैं। इनसे जुड़े मुद्दे पर कोई दल न तो बात करता है और न ही टिकट बंटवारे में ही इन्हें कोई खास तरजीह दी गई। 
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बात दीगर है कि नाई, बिंद, मल्लाह, लोहार, पाल, राजभर, चौहान, काची समेत कई जातियां पूर्वांचल के वाराणसी, गाजीपुर, बलिया, सोनभद्र, मिर्जापुर आजमगढ़, मऊ, जौनपुर व भदोही आदि जिलों की करीब 40 सीटों केचुनाव परिणामों पर असर डालती रही हैं।
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संगठ‌ित नहीं ये जात‌ियां

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डेमो प‌िक
दरअसल पूर्वांचल के कई जिलों में कई ऐसी जातियां हैं, जो न तो संगठित हैं न और न ही इनकी संख्या ही इतनी है कि ये सियासी दलों का ध्यान अपनी ओर खींच सकें। इसका ही नतीजा है कि कोई भी दल चुनावों में इन्हें तरजीह नहीं देता। 

मौजूदा चुनाव में पिछड़ी जातियों पर तो सभी दलों ने फोकस किया है, लेकिन कम संख्या वाली गोंड, लोहार, कुम्हार, बिंद, मल्लाह जैसी जातियां इनके एजेंडे से बाहर हैं। 

इनसे जुड़े मुद्दों को लेकर ही कोई चर्चा नहीं हो रही है। हालांकि विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से देखें तो इनकी संख्या इतनी है कि अगर बिखराव न हो तो ये चुनाव परिणाम पलट सकते हैं।

ये जातियां नहीं सियासी दलों के एजेंडे में

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डेमो प‌िक
बिंद : इस बिरादरी की सबसे अधिक संख्या मिर्जापुर व गाजीपुर में है। वाराणसी व चंदौली में भी इनकी उपस्थिति है। इस इलाके में इनकी कुल संख्या 6-7 लाख के करीब है। मूल रूप से खेतीबाड़ी में लगी इस बिरादरी के अधिकांश परिवार भूमिहीन हैं और दूसरे की जमीन पर खेती कर रोजी-रोटी चलाते हैं। इसके बावजूद इनके विकास का मुद्दा किसी दल के एजेंडे में नहीं है।

चौहान : पूर्वांचल के कई जिलों में इन्हें स्थानीय भाषा में नोनिया के नाम से जाना जाता है। विशेषकर मऊ, गाजीपुर और जौनपुर के अधिकतर विधानसभा क्षेत्रों में इनकी संख्या अच्छी-खासी है। पूर्वांचल में इनकी भी संख्या 8-9 लाख के करीब है। फिर भी सियासत में इनको तरजीह नहीं के बराबर ही मिलती रही है।

राजभर : गाजीपुर, बलिया, मऊ, आजमगढ़, चंदौली, भदोही, वाराणसी व मिर्जापुर में इस बिरादरी की आबादी 12 लाख से अधिक है। इस बिरादरी के नेता के तौर पर ओमप्रकाश राजभर को पहचान तो मिली, लेकिन विकास के नाम इस बिरादरी की स्थिति पहले जैसी ही है। आज भी ये मछली पालने व खेती जैसे पारंपरिक कार्य में ही लगे हैं।

लोहार : पूर्वांचल की अधिकांश सीटों पर इस बिरादरी के 3 से 7 हजार मतदाता हैं। इनकी उपेक्षा का ही आलम है कि आजादी के बाद से इस बिरादरी से कोई बड़ा नेता नहीं पैदा हो सका। चुनावों में इनका दर्द सुनने की कोई दल जहमत नहीं उठाता।

कुम्हार : पूर्वांचल के वाराणसी समेत आसपास के जिलों में कुम्हार बिरादरी की भी 6-7 लाख तक आबादी है, लेकिन इस बिरादरी की दशा भी अच्छी नहीं है। सियासी तौर पर इस बिरादरी का नाम पूर्वांचल से नहीं जुड़ सका। ऐसे में चुनावों में इनकी पूछ नहीं होती।

मल्लाह- चंदौली, मिर्जापुर, गाजीपुर, बलिया व वाराणसी की करीब 32 सीटों पर इनकी संख्या 7-8 लाख के करीब है, पर आजादी के छह दशक बाद भी इनकी दशा में कोई सुधार नहीं हुआ।  सिर्फ मछली मारने और नाव चलाने में इनका जीवन बीत जाता है। इसलिए सियासी दलों की नजरों में इनकी कोई गिनती नहीं होती।
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