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राज्यसभा चुनाव : भाजपा के सियासी दांव से विपक्ष चित, रणनीति बदलकर उलझाया
Thu, 29 Oct 2020 12:22 AM IST
पंकज श्रीवास्तव
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: पंकज श्रीवास्तव
Updated Thu, 29 Oct 2020 12:22 AM IST
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- फोटो : amar ujala
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सामान्य तौर पर राज्यसभा चुनाव की चौसर पर सपा हारकर भी सियासी बाजी जीती हुई दिखती है। ऐसा लगता है कि वह भाजपा और बसपा में सांठगांठ का संदेश देने में सफल रही है । कुछ हद तक इसे सही भी मान लिया जाए तो भी गहराई से विश्लेषण करने पर पता चलता है कि सपा से ज्यादा भाजपा अपनी रणनीति में सफल रही। भाजपा के रणनीतिकारों के हाथों विपक्ष एक बार फिर सियासी अखाड़े में चारों खाने चित हुआ है। भाजपा के इस दांव ने 2022 के चुनाव में विपक्षी एकता की रही सही संभावनाओं के लिए भी संकट खड़ा कर दिया।
आमतौर पर आक्रमक राजनीति के लिए पहचानी जाने वाली भाजपा ने इस बार सुरक्षात्मक सियासी खेल खेला। शुरुआती तौर पर देखने में तो यह भाजपा की रणनीतिक चूक लगी कि उसने क्षमता होते हुए भी राज्यसभा चुनाव के लिए नौ की जगह सिर्फ आठ उम्मीदवार उतारे। पर, गहराई से देखने पर अब लगता है कि राज्यसभा की नौ सीटें जीतने की क्षमता होने के बावजूद सिर्फ आठ उम्मीदवार उतारना उसकी रणनीतिक चाल थी।
विपक्ष के विखराव का संदेश
विपक्ष को एक सीट के जाल में उलझाकर भाजपा ने एक बार फिर यह संदेश दे दिया कि उससे निपटने का एलान करने वालों की प्राथमिकता आपस में ही एक-दूसरे से निपटने और निपटाने की है। वह यह साबित करने में भी सफल रही कि विपक्ष के पास कोई सकारात्मक मुद्दा नहीं है सिवाय विरोध के लिए भाजपा का विरोध करने के। जिस तरह सपा विधायकों के समर्थन से नामांकन की अवधि समाप्त होने से कुछ मिनट पहले प्रकाश बजाज का निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन हुआ उससे वह कहीं न कहीं यह संदेश दिलाने में वह कामयाब रही कि अनुसूचित जाति के लोगों को कौन आगे बढ़ने से रोकना चाहता है?
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कारण ये भी
बसपा ने सपा पर अनुसूचित जाति के लोगों की तरक्की बर्दाश्त न कर पाने का आरोप लगाकर इसी संदेश को आगे बढ़ाया। देखने में तो यह लगता है कि राज्यसभा चुनाव के जरिये सपा ने बसपा के विधायकों में तोड़फोड़ कराकर यह साबित कर दिया कि भाजपा से मुकाबले की क्षमता वही रखती है। पर, रामजी गौतम और बजाज के नामांकन को खारिज कराने तथा बचाने की बुधवार को दिन भर चली खींचतान ने कहीं न कहीं न सिर्फ दोनों दलों के बीच खाईं को ज्यादा गहरा कर दिया है बल्कि विपक्ष को भी बिखरा दिया है। एक तो इस सियासी चौसर पर सपा की हार को किसी न किसी रूप में बसपा और भाजपा दोनों मुद्दा बनाएंगी और सपा को अनुसूचित जाति विरोधी साबित करने की कोशिश करेंगी तो भगवा टोली यह कोशिश भी करेगी कि बसपा के उम्मीदवार रामजी गौतम की जीत के संदेश का सियासी लाभ उसे भी कुछ न कुछ जरूर मिले।
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आमतौर पर आक्रमक राजनीति के लिए पहचानी जाने वाली भाजपा ने इस बार सुरक्षात्मक सियासी खेल खेला। शुरुआती तौर पर देखने में तो यह भाजपा की रणनीतिक चूक लगी कि उसने क्षमता होते हुए भी राज्यसभा चुनाव के लिए नौ की जगह सिर्फ आठ उम्मीदवार उतारे। पर, गहराई से देखने पर अब लगता है कि राज्यसभा की नौ सीटें जीतने की क्षमता होने के बावजूद सिर्फ आठ उम्मीदवार उतारना उसकी रणनीतिक चाल थी।
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विपक्ष के विखराव का संदेश
विपक्ष को एक सीट के जाल में उलझाकर भाजपा ने एक बार फिर यह संदेश दे दिया कि उससे निपटने का एलान करने वालों की प्राथमिकता आपस में ही एक-दूसरे से निपटने और निपटाने की है। वह यह साबित करने में भी सफल रही कि विपक्ष के पास कोई सकारात्मक मुद्दा नहीं है सिवाय विरोध के लिए भाजपा का विरोध करने के। जिस तरह सपा विधायकों के समर्थन से नामांकन की अवधि समाप्त होने से कुछ मिनट पहले प्रकाश बजाज का निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन हुआ उससे वह कहीं न कहीं यह संदेश दिलाने में वह कामयाब रही कि अनुसूचित जाति के लोगों को कौन आगे बढ़ने से रोकना चाहता है?
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कारण ये भी
बसपा ने सपा पर अनुसूचित जाति के लोगों की तरक्की बर्दाश्त न कर पाने का आरोप लगाकर इसी संदेश को आगे बढ़ाया। देखने में तो यह लगता है कि राज्यसभा चुनाव के जरिये सपा ने बसपा के विधायकों में तोड़फोड़ कराकर यह साबित कर दिया कि भाजपा से मुकाबले की क्षमता वही रखती है। पर, रामजी गौतम और बजाज के नामांकन को खारिज कराने तथा बचाने की बुधवार को दिन भर चली खींचतान ने कहीं न कहीं न सिर्फ दोनों दलों के बीच खाईं को ज्यादा गहरा कर दिया है बल्कि विपक्ष को भी बिखरा दिया है। एक तो इस सियासी चौसर पर सपा की हार को किसी न किसी रूप में बसपा और भाजपा दोनों मुद्दा बनाएंगी और सपा को अनुसूचित जाति विरोधी साबित करने की कोशिश करेंगी तो भगवा टोली यह कोशिश भी करेगी कि बसपा के उम्मीदवार रामजी गौतम की जीत के संदेश का सियासी लाभ उसे भी कुछ न कुछ जरूर मिले।