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यूपीः बिजली ट्रांसमिशन की दरें बढ़ाने का विरोध
Fri, 03 Jul 2020 02:09 PM IST
ishwar ashish
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Fri, 03 Jul 2020 02:09 PM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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यूपी पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन के वार्षिक राजस्व आवश्यकता प्रस्ताव पर जनसुनवाई के दौरान बिजली ट्रांसमिशन की दरें बढ़ाने का विरोध किया। राज्य विद्युत नियामक आयोग ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जनसुनवाई की। इसमें उपभोक्ता संगठनों की ओर से कुल संयोजित भार के मुकाबले ट्रांसमिशन क्षमता में लगभग दो करोड़ किलोवाट के अंतर पर भी सवाल उठाए गए।
पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन की ओर से 2020-21 के लिए दाखिल एआरआर पर नियामक आयोग चेयरमैन आरपी सिंह, सदस्य केके शर्मा व वीके श्रीवास्तव की पूर्ण पीठ ने जनसुनवाई की। ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन ने प्रस्तुतिकरण के जरिये ट्रांसमिशन टैरिफ बढ़ाने की मांग उठाई जबकि उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने एआरआर पर आपत्ति उठाते हुए कहा कि ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन पहले अपना सिस्टम सही करे फिर टैरिफ बढ़ाने की बात करे।
मौजूदा ट्रांसमिशन टैरिफ 18 पैसा प्रति यूनिट को बढ़ाकर 34 पैसा प्रति यूनिट प्रस्तावित किया जाना गलत है। यही नहीं ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन की ओर से बताया गया 4810 करोड़ रुपये का कैपिटल इन्वेस्टमेंट भी बहुत ज्यादा है। वर्मा ने कहा कि फिजूलखर्ची पर अंकुश लगाने में नाकाम ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन के कामों पर पिछले दिनों सीएजी नेे भी सवाल उठाते हुए टिप्पणी की थी कि बिना उपयोगिता प्रमाणपत्र लिए ठेकेदारों को 492 करोड़ का भुगतान कर दिया गया जो गंभीर मामला है।
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वर्मा ने 3.50 प्रतिशत प्रस्तावित ट्रांसमिशन लाइन हानियों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि अन्य राज्यों की तरह यह 2.86 प्रतिशत से ज्यादा अनुमोदित नहीं की जानी चाहिए। ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन मौजूदा ट्रांसमिशन टैरिफ में 84 प्रतिशत की वृद्धि चाहता है, लेकिन जितना लोड है उतनी ट्रांसमिशन क्षमता नहीं है।
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पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन की ओर से 2020-21 के लिए दाखिल एआरआर पर नियामक आयोग चेयरमैन आरपी सिंह, सदस्य केके शर्मा व वीके श्रीवास्तव की पूर्ण पीठ ने जनसुनवाई की। ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन ने प्रस्तुतिकरण के जरिये ट्रांसमिशन टैरिफ बढ़ाने की मांग उठाई जबकि उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने एआरआर पर आपत्ति उठाते हुए कहा कि ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन पहले अपना सिस्टम सही करे फिर टैरिफ बढ़ाने की बात करे।
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मौजूदा ट्रांसमिशन टैरिफ 18 पैसा प्रति यूनिट को बढ़ाकर 34 पैसा प्रति यूनिट प्रस्तावित किया जाना गलत है। यही नहीं ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन की ओर से बताया गया 4810 करोड़ रुपये का कैपिटल इन्वेस्टमेंट भी बहुत ज्यादा है। वर्मा ने कहा कि फिजूलखर्ची पर अंकुश लगाने में नाकाम ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन के कामों पर पिछले दिनों सीएजी नेे भी सवाल उठाते हुए टिप्पणी की थी कि बिना उपयोगिता प्रमाणपत्र लिए ठेकेदारों को 492 करोड़ का भुगतान कर दिया गया जो गंभीर मामला है।
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वर्मा ने 3.50 प्रतिशत प्रस्तावित ट्रांसमिशन लाइन हानियों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि अन्य राज्यों की तरह यह 2.86 प्रतिशत से ज्यादा अनुमोदित नहीं की जानी चाहिए। ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन मौजूदा ट्रांसमिशन टैरिफ में 84 प्रतिशत की वृद्धि चाहता है, लेकिन जितना लोड है उतनी ट्रांसमिशन क्षमता नहीं है।
विद्युत (संशोधन) विधेयक पर फैसला लेने पर इंजीनियरों ने जताया विरोध
प्रदेश के करीब 2.85 करोड़ उपभोक्ताओं का कुल भार 6.19 करोड़ किलोवाट है। जबकि ट्रांसमिशन क्षमता 4.53 करोड़ किलोवाट ही है। यानी सिस्टम व उपभोक्ताओं के भार के बीच लगभग 2 करोड़ किलोवाट का अंतर है। इससे उपभोक्ताओं को उच्च गुणवत्ता की बिजली नहीं मिल पाएगी। आयोग के चेयरमैन ने कहा कि आयोग सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार करके अपना फैसला सुनाएगा।
विद्युत (संशोधन) अधिनियम 2020 पर फैसला लेने के लिए केंद्रीय विद्युत मंत्री द्वारा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये बुलाई गई सभी राज्यों के ऊर्जा मंत्रियों की बैठक का इंजीनियरों ने विरोध किया है। ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन ने इस पर कड़ा एतराज जताया है।
गौरतलब है कि इस बैठक में विद्युत (संशोधन) विधेयक 2020 के अलावा बिजली कंपनियों की वित्तीय स्थिति और सुधार आधारित नई वितरण योजना पर भी फैसला लिया जाएगा। फेडरेशन के चेयरमैन शैलेंद्र दुबे ने बताया कि बैठक में विद्युत (संशोधन) विधेयक पर चर्चा के लिए महज 35 मिनट रखा गया है। इतने कम समय में सभी राज्यों की बात कैसे सुन ली जाएगी।
इससे केंद्र सरकार की मंशा का पता चलता है कि बिना गंभीर चर्चा के वह इस बिल पर राज्यों की राय लेने की औपचारिकता पूरी कर संसद के आगामी मानसून सत्र में पारित कराना चाहती है। जबकि सभी राज्यों के मुख्यमंत्री व ऊर्जा मंत्री पत्र लिखकर प्रधानमंत्री व केंद्रीय विद्युत मंत्री से एतराज जाहिर कर चुके हैं।
दुबे ने बताया कि फेडरेशन ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों व ऊर्जा मंत्रियों को ईमेल कर अपील की है कि वे बैठक में विधेयक पर जल्दबाजी में निर्णय लेने का विरोध करें। पहले की तरह विस्तृत विचार-विमर्श के लिए बिल को संसद की ऊर्जा मामलों की स्टैंडिंग कमेटी को भेजा जाए। जिससे सभी स्टेक होल्डरों खासकर किसानों, उपभोक्ताओं और बिजली कर्मियों को बात रखने का पूरा अवसर मिल सके।
विद्युत (संशोधन) अधिनियम 2020 पर फैसला लेने के लिए केंद्रीय विद्युत मंत्री द्वारा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये बुलाई गई सभी राज्यों के ऊर्जा मंत्रियों की बैठक का इंजीनियरों ने विरोध किया है। ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन ने इस पर कड़ा एतराज जताया है।
गौरतलब है कि इस बैठक में विद्युत (संशोधन) विधेयक 2020 के अलावा बिजली कंपनियों की वित्तीय स्थिति और सुधार आधारित नई वितरण योजना पर भी फैसला लिया जाएगा। फेडरेशन के चेयरमैन शैलेंद्र दुबे ने बताया कि बैठक में विद्युत (संशोधन) विधेयक पर चर्चा के लिए महज 35 मिनट रखा गया है। इतने कम समय में सभी राज्यों की बात कैसे सुन ली जाएगी।
इससे केंद्र सरकार की मंशा का पता चलता है कि बिना गंभीर चर्चा के वह इस बिल पर राज्यों की राय लेने की औपचारिकता पूरी कर संसद के आगामी मानसून सत्र में पारित कराना चाहती है। जबकि सभी राज्यों के मुख्यमंत्री व ऊर्जा मंत्री पत्र लिखकर प्रधानमंत्री व केंद्रीय विद्युत मंत्री से एतराज जाहिर कर चुके हैं।
दुबे ने बताया कि फेडरेशन ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों व ऊर्जा मंत्रियों को ईमेल कर अपील की है कि वे बैठक में विधेयक पर जल्दबाजी में निर्णय लेने का विरोध करें। पहले की तरह विस्तृत विचार-विमर्श के लिए बिल को संसद की ऊर्जा मामलों की स्टैंडिंग कमेटी को भेजा जाए। जिससे सभी स्टेक होल्डरों खासकर किसानों, उपभोक्ताओं और बिजली कर्मियों को बात रखने का पूरा अवसर मिल सके।