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कुछ कहती हैं ये खामोश कोठियां (पार्ट-3)
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क
Updated Sat, 27 Jul 2013 04:52 PM IST
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कोठी फरहत बख्श- आखिर पानी से क्यों भरी रहती थी यह कोठी?
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यह भी कम शान की बात नहीं कि एक कोठी के तीन-तीन नाम हों। छतर मंजिल, अंब्रेला पैलेस और कोठी फरहत बख्श्ा...ये तीन एक ही कोठी के नाम हैं।
इसे जनरल क्लाउड मार्टिन ने अपने लिए साल 1781 में गोमती नदी के किनारे बनवाया था। हालांकि, इसे नवाब सआदत अली खान ने खरीद लिया था और बाद में नवाब गाजीउद्दीन हैदर ने इसमें और निर्माण करवाया।
इस कोठी में अवध के नवाब और उनकी बेगमों की रिहाइश थी। 1897 की क्रांति के दौरान यह भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों का केंद्र बन गया।
देश के आजाद होने तक यह कोठी अंग्रेजों के कब्जे में रही और वे इसे युनाइटेड सर्विसेज क्लब के तौर पर इस्तेमाल करते रहे।
इस क्लब में भारतीयों के जाने पर सख्त मनाही थी और इसी की देन रही कि गोलागंज इलाके में 1883 में भारतीय शाही परिवारों ने रीफा-ए-आम-क्लब-लखनऊ का निर्माण कराया।
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यह कोठी 1950 से केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान के अधिकार क्षेत्र में है। कुछ ही लोग जानते होंगे कि इस कोठी के दो मंजिल पानी से भरे रहते थे, गोमती नदी से आने वाले पानी का रास्ता भी किसी को नहीं पता था।
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हालांकि, ऐसा क्यों किया जाता था यह किसी को नहीं पता। कहा जाता है कि गर्मी में कोठी को ठंडा रखने के मकसद से ऐसा किया जाता होगा।
इसे छतर मंजिल नाम इसलिए दिया गया क्योंकि इसका गुंबद एक छतरी के आकार का है, जो कभी चमकदार हुआ करता था। इस कोठी के ठीक बगल में एक और कोठी है, जिसे जनरल की कोठी कहते हैं।