अल्ट्रासाउंड मशीन ही बचाएगी मरीज की जान
इमरजेंसी में अंदरूनी चोटों का पता लगाने के लिए एक्स-रे, सीटी और एमआरआई नहीं अल्ट्रासाउंड मशीन ही काफी है, वो भी पोर्टेबल।
दुर्घटना में घायल मरीज के फेफड़ों में हवा भर जाए, या पेट के अंदर ब्लीडिंग हो रही हो तो इसका पता अल्ट्रासाउंड से लगाया जा सकता है। इससे समय पर जरूरी इलाज मिल जाएगा और जान बच जाएगी।
संजय गांधी पीजीआई के इमरजेंसी मेडिसिन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. संदीप साहू ने ये जानकारी इमरजेंसी एंड ट्रॉमा वर्कशॉप में शुक्रवार को दी।
इंडोयूएस इमरजेंसी मेडिसिन समिट के तहत पीजीआई के मिनी ऑडिटोरियम में आयोजित कार्यशाला में नर्स, टेक्निशियन व अन्य पैरामेडिकल स्टाफ को इसकी हैंड्स ऑन ट्रेनिंग (लाइव प्रशिक्षण) दी गई।
108 एंबुलेंस में पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीन देने की सिफारिश
एम्स दिल्ली से आए यूटीएलएस कोर्स कोआर्डिनेटर एडिशनल प्रोफेसार डॉ. दीपक अग्रवाल ने बताया कि इमरजेंसी व ट्रॉमा में अल्ट्रासाउंड की भूमिका को देखते हुए उसे हर 108 एंबुलेंस में रखने की सिफारिश स्वास्थ्य मंत्रालय से की गई है।
दुर्घटनास्थल पर पहुंचने के बाद एंबुलेंस में तैनात पैरामेडिकल स्टाफ घायल की जांच कर उसे जरूरत के अनुसार अस्पताल पहुंचा सकता है। या फिर डॉक्टर को पहले ये जानकारी दे सकता है ताकि वो इलाज के मुताबिक विशेषज्ञों की पहले से व्यवस्था कर सके।
डॉ. दीपक ने बताया कि भारत जैसे में देश में सभी जगह एक्स-रे, सीटी स्कैन और एमआरआई के लिए उपकरण लगाना संभव नहीं है, क्योंकि इसके लिए विशेषज्ञों की कमी और बजट आड़े आएगा।
पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीन तीन से पांच लाख रुपये में उपलब्ध है। इसके लिए रेडियोलॉजिस्ट की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। नर्स व पैरामेडिकल स्टाफ को प्रशिक्षित कर इमरजेंसी में अल्ट्रासाउंड जांच का कार्य लिया जा सकता है।