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मंत्रियों की बर्खास्तगी के बाद ये है अखिलेश-मुलायम की बड़ी चुनौती

Sat, 31 Oct 2015 01:23 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 31 Oct 2015 01:23 AM IST
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Next challenges for Akhilesh and Mulayam in UP.

मंत्रियों की बर्खास्तगी तो हो गई पर अब सभी की नजरें मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के अगले कदम पर हैं। आठ मंत्रियों की बर्खास्तगी और इससे पहले आनंद सिंह, मनोज पारस और तेजनारायण पाण्डेय ‘पवन पाण्डेय’ की मंत्री पद से विदाई, दो मंत्रियों की आकस्मिक मृत्यु से मंत्रिपरिषद में आए असंतुलन को दुरुस्त करने के लिए सपा मुखिया क्या कदम उठाते हैं, इसे लेकर उत्सुकता बनी हुई है।

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उम्मीद यह भी है कि शायद इस बार महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और बुंदेलखंड को हिस्सेदारी देने की काम पूरा हो जाए।

दरअसल, हाल के घटनाक्रम से मंत्रिपरिषद का न सिर्फ क्षेत्रीय संतुलन बिगड़ा है, बल्कि जातीय संतुलन भी गड़बड़ाया है। साथ ही, दिवंगत चितरंजन स्वरूप व राजेन्द्र सिंह राणा जैसे वफादार तो अंबिका, रामगोविंद जैसे सपा की पहचान बन चुके बड़े चेहरों की भरपाई की चुनौती भी सामने खड़ी है। ऐसी परिस्थति में अखिलेश व मुलायम को काफी मेहनत करनी होगी।
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देखने वाली बात तो यह होगी कि किसी भूमिहार को जगह मिली है या पूर्वांचल में अच्छी संख्या में मौजूद इस बिरादरी के हाथ खाली ही रह जाते हैं। लोगों के बीच यह अटकलें भी जारी हैं कि अभी तक मंत्रिपरिषद में हिस्सेदारी से बाहर रहे क्षेत्रों जिलों को हिस्सेदारी किस तरह दी जाती है।

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इस पर भी एक चुनौती

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महिला प्रतिनिधित्व के नाम पर मंत्रिपरिषद में अभी तक सिर्फ एक सदस्य अरुण कुमारी कोरी ही हैं। बुंदेलखंड सहित कुछ जिलों को भी मंत्रिपरिषद में भागीदारी देना मुलायम के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।

खासतौर से इलाहाबाद, बुलंदशहर, बदायूं, संतकबीरनगर, मिर्जापुर, सोनभद्र, श्रावस्ती, महराजगंज, महामायानगर, एटा, चंदौली जैसे जिलों की मंत्रिपरिषद में भागीदारी की उम्मीदों को पूरी करना। कुछ अध्यक्ष व उपाध्यक्ष बनाकर इस कमी को पूरा करने की कोशिश जरूर की गई है। पर, दर्जाधारी मंत्रियों को लालबत्ती व रुतबे पर न्यायालय की चली छुरी ने इन पदों का भी आकर्षण कम कर दिया है। इस नाते सपा नेतृत्व के सामने इनका रुतबा बरकरार रखना चुनोती भरा होगा।

बढ़ गया क्षेत्रीय अंसुतलन
मंत्रिपरिषद से जिन आठ लोगों को बर्खास्त किया गया है, उनमें यादव, ब्राह्मण, भूमिहार, शाक्य, कुर्मी, दलित से एक-एक और दो ठाकुर हैं। क्षेत्रवार नजर डालें तो अंबिका, नारद राय व शिवाकांत ओझा तीन पूर्वाचंल, आलोक शाक्य, महेन्द्र अरिदमन सिंह व भगवतशरण गंगवार तीन पश्चिम, शिवकुमार बेेरिया और योगेश प्रताप सिंह मध्य उत्तर प्रदेश के हैं।

पूर्व में हटाए गए मंत्रियों और मृत मंत्रियों को जोड़ लें तो मंत्रिपरिषद से मनोज पारस और दिवंगत मंत्री चितरंजन स्वरूप व राजेन्द्र सिंह राणा को मिलाकर पश्चिम से छह लोगों का प्रतिनिधित्व कम हुआ है। वहीं, आनंद सिंह व पवन पाण्डेय को मिलाकर मध्य यूपी से चार लोगों का प्रतिनिधित्व कम हुआ है। पूर्वांचल के इन 3 चेहरों को मिलाकर जनवरी 2014 में बनी मंत्रिपरिषद से अब तक 13 लोग कम हो गए हैं। जाहिर है कि इस संतुलन को सपा नेतृत्व को ठीक ही करना होगा।

जातीय आधार पर घटता गया प्रतिनिधित्व

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आनंद सिंह, मनोज पारस व पवन पाण्डेय की विदाई से पहले मंत्रिपरिषद में 59 सदस्य थे। तब मंत्रिपरिषद में 10 मुस्लिम, 11 ठाकुर, 09 यादव, 07 दलित, 06 ब्राह्मण, 04 कुर्मी, 02 वैश्य, 01 भूमिहार, 01 जाट,  02 लोधी, 01 चौरसिया, 01 निषाद, 01 गूजर, 01 प्रजापति (कुम्हार), 01 पाल (गड़रिया), व 01 शाक्य (मौर्य/कुशवाहा) चेहरे थे। ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य को मिलाकर 20 अगड़े, 10 मुस्लिम, 07 दलित व 22 पिछड़े चेहरे हो गए थे।

इन्हें हटाए जाने के बाद 56 सदस्य बचे थे। इनमें 10 मुसलमान, 9 यादव, 10 ठाकुर, 5 ब्राह्मण, 4 कुर्मी, 2 वैश्य, 2 लोध, 6 दलित, 6 अति पिछड़ी जातियों के  थे। इसके अलावा एक-एक भूमिहार व जाट बिरादरी का प्रतिधित्व रह गया था। अब जिन 8 मंत्रियों को बर्खास्त किया गया है उनमें यादव, ब्राह्मण, भूमिहार, शाक्य, कुर्मी, दलित एक-एक और दो ठाकुर हैं। इनकी बरखास्तगी व दो मंत्रियों के दिवंगत होने के बाद मंत्रिपरिषद से अब चार ठाकुर, दो ब्राह्मण, एक भूमिहार, दो एससी, तीन पिछड़े (इनमें एक यादव, एक कुर्मी व एक शाक्य) तथा एक वैश्य का प्रतिनिधित्व घट गया है।

जिलों का दबदबा घटा
बर्खास्तगी से मंत्रिपरिषद में बलिया व गाजीपुर के अब तीन के बजाय दो ही मंत्री रह गए हैं। गोंडा से तीन मंत्रियों की जगह अब एक मात्र विनोद सिंह उर्फ पंडित सिंह ही मंत्री के रूप में प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। अलबत्ता बाराबंकी, अंबेडकरनगर व आजमगढ़ से अब भी तीन-तीन मंत्री हैं। आगरा, फैजाबाद, बिजनौर, जे.पी. नगर, सीतापुर, प्रतापगढ़, बस्ती से भी दो-दो मंत्री हैं।

कानपुर से दो की जगह अब सिर्फ एक ही मंत्री अरुणा कुमारी कोरी रह गई है। प्रतापगढ़ से दो मंत्री थे। शिवाकांत ओझा के बर्खास्त होने के बाद अब राजा भैया ही बचे हैं। राजेंद्र सिंह राणा के निधन से सहारनपुर और चितरंजन स्वरूप के निधन से मुजफ्फरनगर का प्रतिनिधित्व नहींरह गया है। आगरा से दो मंत्री थे, रामसकल गुर्जर और राजा महेंद्र अरिदमन सिंह। अरिदमन के जाने के बाद आगरा से एक ही प्रतिनिधत्व बचा है।

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