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Lucknow News : नाबालिग से दुराचार की कोशिश में पड़ोसी को दस साल कैद
Fri, 30 Sep 2022 11:17 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
माई सिटी रिपोर्टर, अमर उजाला, लखनऊ
माई सिटी रिपोर्टर, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: लखनऊ ब्यूरो
Updated Fri, 30 Sep 2022 11:17 AM IST
सार
कोर्ट ने मामले में विवेचना के दौरान लापरवाही करने पर विवेचक अनुराधा सिंह के खिलाफ कठोर टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि विवेचक ने एक महिला होते हुए भी मामले को गंभीरता से न लेकर लीपापोती की है।
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कोर्ट।
- फोटो : amar ujala
विस्तार
ढोलक देने के बहाने देर रात घर में घुसकर नाबालिग से दुराचार की कोशिश करने वाले विजय शुक्ला उर्फ बबलू शुक्ला को कोट ने दोषी ठहराया है। पॉक्सो एक्ट के विशेष न्यायाधीश अरविंद मिश्रा ने दोषी को दस वर्ष के कारावास और एक लाख रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई है। कोर्ट ने अर्थदंड की पूरी राशि पीड़िता को बतौर हर्जाना दिए जाने का आदेश दिया है। कोर्ट ने दंडित करते हुए कहा कि भारतीय परिवेश में बच्चियों से होने वाले अपराध को घृणित माना जाता है। ऐसे अपराध बच्चियो के मन मस्तिष्क पर ऐसी नकारात्मक अमिट छाप छोड़ते हैं, जिससे पीड़िता जीवनपर्यंत प्रभावित रहती है और इसके प्रभाव को पीड़िता ही समझ सकती है।
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कोर्ट ने दोषी को कम सजा देने से इनकार करते हुए कहा कि मामले की पीड़िता के मन पर इस घटना के 6-7 साल भी इतना प्रभाव है कि कोर्ट में प्रश्न पूछे जाने के दौरान वह फूटफूटकर रोने लगी।इससे पहले अभियोजन की ओर से विशेष अधिवक्ता सुखेंद्र प्रताप सिंह का तर्क था कि घटना की रिपोर्ट गोमती नगर थाने में दर्ज कराई गई थी। इसमें बताया था कि 18 अगस्त 2014 को वादी अपनी पत्नी के साथ पपनामऊ आश्रम गया था। इस दौरान रात करीब एक बजे नशे की हालत में ढोलक देने के बहाने आरोपी विजय शुक्ला वादी के घर में घुस आया और पीड़िता से जबरदस्ती करने लगा। विरोध करने पर विजय धमकी देता हुआ भाग निकला था।
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कोर्ट की तल्ख टिप्पणी : महिला होते हुए भी विवेचक ने की घोर लापरवाही
कोर्ट ने मामले में विवेचना के दौरान लापरवाही करने पर विवेचक अनुराधा सिंह के खिलाफ कठोर टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि विवेचक ने एक महिला होते हुए भी मामले को गंभीरता से न लेकर लीपापोती की है। यह भी कहा कि पीड़िता ने पूरी आपबीती विवेचक को बताई थी। इसके बावजूद विवेचक ने कलम बंद बयान मजिस्ट्रेट के समक्ष नहीं कराया। कोर्ट ने कहा कि विवेचक ने अपराध की गंभीरता को कम कर आरोप पत्र कोर्ट में भेजा। विवेचक ने पीड़िता का बयान दर्ज करते समय महज खानापूर्ति की जबकि पीड़िता से विस्तृत पूछताछ करनी चाहिए थी। क्योंकि पीड़िता का व्यक्तित्व ऐसा है कि यदि उससे घटना के संदर्भ में सीधे व स्पष्ट प्रश्न नहीं पूछे जाएंगे तो वह स्वयं नहीं बता पाएगी। पीड़िता का कलमबंद बयान न दर्ज कराने को लेकर विवेचक ने केवल इतना लिखा कि पीड़िता ने इनकार किया है, जिसे विवेचक ने बाद में खानापूर्ति करने के लिए दूसरे पेन से लिखा है। कोर्ट ने आदेश की प्रति उचित कार्रवाई के लिए पुलिस कमिश्नर, अपर पुलिस महानिदेशक, अभियोजन, पुलिस महानिदेशक उत्तर प्रदेश शासन एवं प्रमुख सचिव गृह उत्तर प्रदेश शासन को अभिलंब भेजे जाने का आदेश दिया है।
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