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कहानी ड्योढ़ी नवाब अख्तर महल की
टीम डिजिटल/लखनऊ
Updated Sun, 22 Dec 2013 02:02 PM IST
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पश्चिमी लखनऊ में हाता सितारा बेगम के करीब सड़क के उस पर जैनुल आब्दीन का खूबसूरत इमामबाड़ा है।
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इस उजड़ी हुई इमारत की भी एक अलग ही शान है। सुंदर बेलबूटों से सजी हुई राजपूती मेहराबें इस भवन को और भी खूबसूरत बनाती हैं।
इस इमामबाड़े के अलावा एक मस्जिद, दो मंदिर और कुछ खंडहर आज भी यहां हैं और यह सब किसी जमाने में नवाब अख्तर महल (वाजिद अली शाह की एक प्रिय बेगम) की ड्योढ़ी और जागीर में शामिल था।
सराय माले खां, सरकटा नाला और काकोरी रोड से घिरा हुआ है। अख्तर महल का असली नाम अशफाक उल सुल्ताना था। उनके पिता सल्तनत शाही में वजीर थे।
बादशाह अपनी इस नई बेगम पर फिदा थे। इसी का नतीजा था कि अशफाक उल सुल्ताना को मलिका-ए-अवध नवाब अख्तर महल साहिबा का खिताब मिला।
लखनऊ से कलकत्ता जाने वक्त बादशाह की कुछ बेगमें उनके साथ ही गई थीं लेकिन कुछ कारणों से अख्तर महल को लखनऊ ही रुक जाना पड़ा, क्योंकि अवध के पतन के लिए लोगों को उनके वालिद पर शक था।
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कुछ महीने बाद नवाब अख्तर अपने पिता के साथ, शौहर के पास कलकत्ता पहुंचीं और फिर वहीं रहने लगीं। सन् 1887 को जाने आलम की मौत हो गई ओर नवाब अख्तर महल के हाथों की चूड़ियां टूट गईं।
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इसके बाद अख्तर कलकत्ते से लखनऊ आ गईं। यहां आकर तहसीनगंज की कोठी में रहने लगीं। जिंदगी के आखिरी वक्त में लाला कालीचरण खत्री, उनकी कुल जायदाद की देखभाल करते थे।
सन् 1890 में 51 साल की उम्र में अख्तर महल ने दुनिया छोड़ दी और उन्हें तहसीनगंज की एक मस्जिद के पास दफन कर दिया गया। ड्योढ़ी नवाब अख्तर महल में ही आज कालीचरण कॉलेज बना है।