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टेनिस बॉल की सिलाई से संवार दिया बच्चों का भविष्य
नितिन यादव/मेरठ
Updated Sat, 26 Oct 2013 08:16 PM IST
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सड़क से हटकर पगडंडी से जाता एक रास्ता। कुछ कच्चे और पक्केघरों के बीच बैठी महिलाएं मजदूरी और कामकाज की बातें कर रही हैं।
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यहीं पर एक युवा कंप्यूटर एप्लीकेशन की किताब लिए बैठा है। एक महिला उसे झिड़क ते हुए कहती है कि बेटा पढ़ाई पर ध्यान दे, ये सब तेरे लिए ही तो है।
यह महिला टेनिस बॉल पर चढ़ने वाले कपड़े को सीलने वाली मुन्नी देवी है।
मेरठ के न्यू मुल्तान नगर क्षेत्र में खेतों के बीच बसे इलाके में रहने वाली मुन्नी देवी ने मजदूरी करके करके बच्चों को पढ़ाने का जो सपना देखा तो दो बेटे बीसीए की पढ़ाई कर रहे हैं।
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यह बात और है कि इस क्षेत्र के घरों में बिजली भी नहीं है। मुन्नी की देखादेखी दूसरे परिवारों में भी बच्चों को मजदूरी न कराके पढ़ाई करने भेजा जा रहा है।
मुन्नी देवी की उम्र लगभग पचास साल है। तीन साल पहले उसके पति की मौत हुई तो परिवार को खाने के लाले पड़ गए।
पति के रहते भी हुए भी मुन्नी ने अपने बच्चों को पढ़ाने की वकालत की थी। पति की मौत के बाद मुन्नी देवी को बच्चों की पढ़ाई की चिंता हुई।
उसने टेनिस बॉल के कपड़े को सीलने का काम शुरू हुआ। इससे वह प्रतिदिन दो सौ रूपए तक कमाती है। मुन्नी देवी के छह बच्चों में से चार पढ़ रहे हैं।
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बीसीए की पढ़ाई कर रहा संजीव कहता है कि वह केवल अपनी माँ के कारण पढ़ पाया। पिता की मौत के समय वह कक्षा दस में पढ़ता था।
पढ़ाई चालू न रहने के कारण वह फेल हो गया। इसके बाद उसकी माँ ने उसे व उसके दूसरे भाईयों को पढ़ाने का बीड़ा उठाया।
संजीव का बड़ा भाई राजीव भी मेरठ के एक कॉलेज से बीसीए कर रहा है। दोनों भाई काम में मां की मदद करते हैं और पार्ट टाइम नौकरी करते हैं। दो छोटे भाई भी पढ़ाई कर रहे है।
मुन्नी जिस छोटे से मोहल्ले में रहती हैं वहां की दूसरी महिलाओं ने भी पढ़ाई के महत्व को पहचाना।
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उसी मोहल्ले के मुकेश और उसका पति निवाड़ बनाने का काम करते हैं। दोनों पति-पत्नी अपने चारों बच्चों को पास के स्कूलों में पढ़ने भेजते हैं। मुकेश के पति अशोक का कहना है कि वह नहीं चाहते कि उनके बच्चे मजदूरी करें।
पूरे मुहल्ले में केवल एकमात्र शिक्षित महिला मंजू देवी कक्षा दस तक पढ़ीं हैं। मंजू का कहना है कि वह अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए परचून की दुकान चलाती है।
बच्चों को पढ़ाकर उन्हें बेहतर भविष्य देना ही उनका लक्ष्य है। महिलाओं के बीच बैठी मुन्नी देवी कहती है कि मैं पढ़ी लिखी नहीं हूं और लेकिन मेरे बच्चों पर अशिक्षा का कलंक नहीं रहना चाहिए।
वह आने वाले दिनों में भी लगातार काम करने की योजना बना रही हैं ताकि अपने बेटों को बड़े शहरों के कॉलेजों में पढ़ाई के लिए भेज सके।
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