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30 फीसदी से ज्यादा युवा मोबाइल फोबिया से ग्रसित, वाई-फाई का खुला कनेक्शन बच्चों के लिए खतरनाक

Sun, 03 Feb 2019 02:21 AM IST
Vikas Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: Vikas Kumar Updated Sun, 03 Feb 2019 02:21 AM IST
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More than 30 percent of teenagers suffer from mobile phobia
मोबाइल फोबिया - फोटो : social media

घर में वाई-फाई का खुला कनेक्शन बच्चों के लिए खतरनाक है। इससे वे इंटरनेट के आदी हो जाते हैं। पल भर के लिए इससे दूरी उन्हें बेचैन कर देती है, यह बेचैनी और तनाव धीरे-धीरे मोबाइल फोबिया का रूप ले लेती है। ऐसे युवाओं की संख्या करीब 30 फीसदी है। यह बातें पीजीआई चंडीगढ़ के प्रोफेसर डॉ. संजीव ग्रोवर ने कहीं। वह शनिवार को इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी की ओर से आयोजित समारोह को संबोधित कर रहे थे।

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डॉ. ग्रोवर ने बताया कि लगातार सोशल साइटों पर समय बिताने वाले यह देखते रहते हैं कि किसने उन्हें अनफ्रेंड किया, किसने फ्रेंडशिप का मैसेज भेजा, उनकी पोस्ट पर किसने क्या कमेंट दिया, कितने लाइक मिले आदि। ये सारी बातें धीरे-धीरे मानसिक तनाव का कारण बनने लगती हैं। इस दौरान अमेरिकी मनोचिकित्सक डॉ. अश्विन ने अवसाद और व्यसन के दुष्चक्र पर चर्चा की। लंदन के डॉ. एड्रियन जेम्स ने मानसिक रोग के क्षेत्र में कानूनी मुद्दों, डॉ. ब्रायन मार्टिस ने पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर पर चर्चा की। 
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डब्ल्यूएचओ ने मोबाइल की लत को माना विकार इंटरनेट की लत को हाल ही में डब्ल्यूएचओ ने एक विकार के रूप में मान्यता दी है। ऐसे में अभिभावकों को यह ध्यान रखना हेगा कि बच्चा मोबाइल पर क्या देख रहा है और उसपर कितना समय दे रहा है। 
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- डॉ. संजीव ग्रोवर, पीजीआई चंडीगढ़

बुजुर्ग रास्ता भूलें तो हो जाएं सावधान
यदि आपके परिवार के बुजुर्ग किसी दिन घर का ही रास्ता भूल जाएं तो सावधान हो जाएं। इसे बुढ़ापे का असर न समझें बल्कि साइकियाट्रिस्ट को दिखाएं। अवसाद में रहने वाले 30 से 40 फीसदी लोगों में भी भूलने की बीमारी हो जाती है। इसे इलाज से ठीक किया जा सकता है। केजीएमयू के सर्वे में यह बात साबित हुई है कि घर से गायब होने वाले बुजुर्ग तीन किलोमीटर के दायरे में ही रहते हैं, इसलिए उन्हें घर के आसपास जरूर ढूंढें।
- डॉ. श्रीकांत श्रीवास्तव, विभागाध्यक्ष जीरियाटिक मेडिसिन, केजीएमयू

तनाव से घटती है कार्यक्षमता
काम का बोझ बढ़ने की वजह से युवाओं में मानसिक बीमारियां बढ़ रही हैं। तनाव होने की वजह से दिमाग की नसें प्रभावित होती हैं। धीरे-धीरे इसका असर पाचन क्षमता से लेकर शरीर के विभिन्न अंगों की कार्यप्रणाली पर पड़ता है। क्योंकि दिमाग से मिले संदेश के अनुसार ही शरीर के अन्य अंग काम करते हैं। जब तनाव अधिक होगा तो कार्यक्षमता घटेगी। दिनभर में कम से कम एक घंटे खिलखिलाकर हंसाना जरूरी है।
- डॉ. रोहित राव, मानसिक चिकित्सा विशेषज्ञ 

तंत्र-मंत्र के चक्कर में होते हैं दुराचार
कम उम्र की बच्चियों से रेप के ज्यादातर मामले तंत्र-मंच के चक्कर में होते हैं। आरोपियों की काउंसलिंग के दौरान यह बात सामने आई कि परेशान लोगों को तंत्र-मंत्र वाले अपने चंगुल में फंसाकर रुपये ऐंठते हैं। वे ऐसी चीजें बताते हैं, जो व्यक्ति कर न पाए। ऐसे में परेशान व्यक्ति आस-पड़ोस और कई बार अपने ही परिवार की बच्ची को निशाना बनाता है। किसी भी व्यक्ति को कोई दिक्कत हो तो तांत्रिक के चक्कर में कतई न पड़े। हर मर्ज का इलाज है।

- डॉ. मुकेश पी, जागीवाला, कोषाध्यक्ष, सायकियाट्रिस्ट एसोसिएशन

जेनेटिक बीमारी है नशा
नशा सिर्फ लत नहीं है बल्कि यह जेनेटिक बीमारी है। इसको बढ़ावा देने केपीछे जीन की अहम भूमिका होती है। पंजाब में हुए एक रिसर्च में यह खुलासा हुआ है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कॉलेज में 10 छात्र शौकिया तौर पर नशा करते हैं, लेकिन पूरी तरह से नशेड़ी कोई एक ही होता है। इस पर कुछ संस्थानों ने शोध शुरू किया है, लेकिन अभी तक उस क्रोमोसोम की पूरी तरह से शिनाख्त नहीं हो पाई है। हालांकि दवा से नशा करने वाले को सुधारा जा सकता है। 
- डॉ. उपेंद्र कपूर, पंजाब

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