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एमएलसी चुनाव : नतीजों से ज्यादा अहम है जीत का संदेश, सपा ही नहीं पूरे विपक्ष को झटका व नसीहत

Wed, 13 Apr 2022 11:01 AM IST
पंकज श्रीवास्‍तव अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Wed, 13 Apr 2022 11:01 AM IST
सार

भाजपा ने 24 सीटों पर जीत के साथ विजय रथ को और आगे बढ़ा दिया है। पार्टी के 9 प्रत्याशी पहले ही निर्वाचित होकर विधान परिषद में पहुंच गए हैं। दो पर निर्दलीय और एक पर रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया की पार्टी जनसत्ता दल का उम्मीदवार जीता है। सपा को एक भी सीट नहीं मिली।

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MLC elections: The message of victory is more important than the results, not only the SP, but the entire opposition is shocked and admonished
जीत के बाद भाजपा मुख्यालय में जश्न मनाते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व अन्य। (फाइल फोटो) - फोटो : amar ujala

विस्तार

विधान परिषद के स्थानीय प्राधिकारी क्षेत्र की 36 सीटों में 27 के लिए हुए चुनाव के नतीजों में भाजपा ने 24 सीटों पर जीत के साथ विजय रथ को और आगे बढ़ा दिया है। पार्टी के 9 प्रत्याशी पहले ही निर्वाचित होकर विधान परिषद में पहुंच गए हैं। दो पर निर्दलीय और एक पर रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया की पार्टी जनसत्ता दल का उम्मीदवार जीता है। सपा को एक भी सीट नहीं मिली। जीत-हार के नजरिये से भाजपा ने 100 सदस्यों वाले उच्च सदन में अब न सिर्फ  दो तिहाई बहुमत हासिल कर लिया है बल्कि खुद की पकड़ व पहुंच के लगातार मजबूत होने का प्रमाण दिया है। पर, इन नतीजों को सीधे-सीधे देखने से ज्यादा इनके संदेशों पर गौर करने की जरूरत नजर आ रही है। जिनमें कम से कम उत्तर प्रदेश की भावी सियासत की पदचाप सुनी जा सकती है। जो आने वाले दिनों में राष्ट्रीय राजनीति पर भी प्रभाव डालेगी। ये संदेश कुछ सवालों पर भाजपा से भी मंथन करने की अपेक्षा करते नजर आ रहे हैं।

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प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी सपा सिर्फ  यह कहकर इन नतीजों के निष्कर्षों या संदेशों से अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती कि ये चुनाव तो आमतौर पर होते ही हैं सत्तारूढ़ दल के पक्ष में, इसलिए भाजपा ने कौन सा तीर मार लिया? खासतौर पर 2022 के विधानसभा चुनाव के नतीजों की तस्वीर के बाद इस चुनाव में दिखे जमीनी हालात तथा भविष्य की परिस्थिति व चुनौती देखते हुए सपा का यह तर्क पूरी तरह ठीक नहीं है। यह आकलन सपा और विपक्ष को पराजय के कारणों पर आत्ममंथन करने से पीछा छुड़ाने का बहाना तो दे सकता है, लेकिन उसके भाजपा का विकल्प बनने के सपनों के पूरा होने की राह में बाधा बनकर खड़े हुए तथ्यों को नहीं झुठला सकता।
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अखिलेश की बढ़ेगी चुनौती
दरअसल, पंचायत चुनाव में भाजपा तथा विपक्ष के सभी प्रमुख दलों ने अपने उम्मीदवार उतारे थे। नतीजों के बाद सपा ने पंचायत चुनाव को विधानसभा चुनाव  2022 का सेमी फाइनल बताते हुए भाजपा की विदाई का दावा किया था। पंचायत चुनाव में उसने जिस तरह भाजपा को कड़ी टक्कर दी, उसको देखते हुए लोगों को उसके दावे में काफी मजबूती भी दिखने लगी थी। विधानसभा चुनाव में सपा सरकार नहीं बना पाई, लेकिन जिस तरह भाजपा के साथ सपा का सीधा मुकाबला हुआ, सपा का आंकड़ा सौ सीटों से ऊपर पहुंचा उसको देखते हुए कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह निष्कर्ष निकालने लगे थे कि आने वाले दिनों में सपा भाजपा के विजय रथ रोकने में कामयाब हो सकती है। पर, एमएलसी चुनाव के नतीजों ने न सिर्फ  इन संभावनाओं की राह में बाधा खड़ी की है बल्कि अखिलेश की चुनौती भी बढ़ा दी है ।
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बिखर तो नहीं रहे समीकरण
यह सवाल यूं ही नहीं है। इस चुनाव में अखिलेश के कई करीबी या कहें किचन कैबिनेट के सदस्यों ने मैदान में उतरने से परहेज किया। कुछ ने नाम वापस ले लिया। चुनाव के दौरान सपा के स्थानीय नेताओं के बीच कई जिलों में खेमेबाजी दिखी और वे विधानसभा चुनाव की पराजय का हिसाब-किताब बराबर करते नजर आए। इस सबसे ऊपर विधानसभा चुनाव में सपा का झंडा और बैनर लेकर चले कई पंचायत प्रतिनिधि समर्पण की मुद्रा या पहले से ही पराजय सुनिश्चित मानकर कार्य करते दिखे। इससे यह सवाल खड़ा हो रहा है कि सपा का सियासी समीकरण जिसमें मुस्लिम और यादव की बात कही जाती थी वह क्या कमजोर हो रहा है? 

वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र भट्ट कहते हैं कि विधान परिषद का यह संभवत: पहला ऐसा चुनाव था, जिसमें सरकारी तंत्र का हस्तक्षेप नहीं दिखा। पहले इन चुनाव के दौरान आए दिन सत्ता-प्रशासन के दबाव की खबरें छाई रहती थीं। बावजूद इसके सपा का प्रदर्शन प्रभावी नहीं रहा। इसलिए अखिलेश या सपा यदि भविष्य में भाजपा का मुकाबला करना चाहते हैं तो उन्हें सरकार या शासन पर आरोप लगाने के बजाय उन कारणों पर विचार करना चाहिए कि उनके कार्यकर्ता इस बार उत्साह के साथ चुनाव में क्यों नहीं जुटे? कहीं ऐसा तो नहीं है कि विधानसभा चुनाव के दौरान बना सपा के वोटों का समीकरण बिखर रहा है? आजमगढ़  सहित कई गढ़ों में सपा की पराजय इसका प्रमाण है। सपा को 2024 के मद्देनजर इन पहलुओं पर विचार करना पड़ेगा।  


भाजपा की स्वीकार्यता में बढ़ोतरी
विपक्ष पराजय का कुछ भी तर्क दे पर, इन नतीजों ने भाजपा की स्वीकार्यता और प्रभाव में बढ़ोतरी पर मुहर जरूर लगाई है। नतीजों ने साफ  कर दिया है कि लोगों के बीच लगातार रहने वाले स्थानीय निकायों व पंचायतों के जनप्रतिनिधियों को भी जनआकांक्षाओं की पूर्ति के लिए भाजपा की नीतियां प्रभावित करने लगी है। इस सबके बावजूद दो स्थानों पर निर्दलीयों की जीत और एक स्थान पर जनसत्ता दल के उम्मीदवार की जीत के मद्देनजर भाजपा को भी भविष्य की रणनीति पर मंथन करने की जरूरत दिख रही है। राजनीतिक विश्लेषक प्रो. ए.पी. तिवारी कहते भी हैं कि यह जीत भाजपा को 2024 के लिए मनोवैज्ञानिक बढ़त दिलाने वाली है। आने वाले दिनों में विपक्ष को ज्यादा मेहनत करना पड़ेगी। पर, भाजपा को यह भी सोचना पड़ेगा कि यशवंत सिंह जैसे नेताओं का निष्कासन ठीक था या इस निर्णय के पूर्व आकलन में भाजपा के रणनीतिकारों से चूक हुई। कारण, यशवंत भाजपा से ही विधान परिषद सदस्य हैं। ऐसे में यदि उनके पुत्र की जीत की संभावनाएं थीं तो फिर किसी दूसरे को टिकट देने का क्या मतलब था? इसी तरह, वाराणसी और प्रतापगढ़ में भाजपा की पराजय भले ही इस बड़ी जीत के सामने बहुत मायने रखती नहीं दिखती, लेकिन कुछ सवाल जरूर उठा रही है? जो अन्य दो उम्मीदवार जीते हैं उनके परिवार भी पहले भी किसी न किसी रूप में भाजपा के साथ की ही भूमिका में रहे हैं। ऐसे में भाजपा को मंथन करना चाहिए कि उसे ऐसे लोगों के खिलाफ  उम्मीदवार उतारकर पराजय हासिल करने से क्या मिला?

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