जो कभी रहे थे खास मायावती ने एक-एक कर किया बाहर
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पूर्व मुख्यमंत्री मायावती कांशीराम की छाप वाली बसपा को अपने चेहरे वाली बसपा में बदलने की ओर एक-एक कदम आगे बढ़ा रही हैं। इसमें बसपा संस्थापक के खास लोगों के साथ हर उस व्यक्ति को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाना शामिल है, जिसकी पब्लिक के बीच मायावती का खास और पार्टी में पावरफुल होने की धारणा बनने लगी।
पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी इसी रणनीति के अगले शिकार हैं। अपने भाई आनंद को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर मायावती ने कांशीराम की बसपा से अलहदा अपनी आगे की रणनीति का संकेत पहले ही कर दिया है।
बसपा संस्थापक कांशीराम के समय मायावती के अलावा जो चुनिंदा चेहरे पार्टी की सियासत के केंद्र में होते थे, उनमें राजबहादुर, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा, स्वामी प्रसाद मौर्य, आरके चौधरी, जंग बहादुर पटेल, डॉ. मसूद अहमद, सुधीर गोयल, सोनेलाल पटेल, बरखूराम वर्मा, दीनानाथ भास्कर, रामलखन पासी, दद्दू प्रसाद, कमलाकांत गौतम जैसे नाम बताए जाते हैं।
इनमें स्वामी प्रसाद मौर्य सहित चुनिंदा लोगों को छोड़ दें तो लगभग हर नेता को मायावती ने समय-समय पर बाहर का रास्ता दिखाया। मौर्य को मायावती पढ़ नहीं पाईं और उन्होंने आरोपों की सीधी बौछार कर बसपा से नाता तोड़ लिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मायावती को सिर्फ जी-हुजूरी वाले लोग ही पसंद हैं। जिसने भी नेता बनने की कोशिश की, उसे बाहर हो जाना पड़ा।
नसीमुद्दीन सहित कई नेताओं को किया बाहर
सपा-बसपा सरकार में वे मंत्री भी बने। आगे चलकर मायावती से उनकी मतभिन्नता इतनी बढ़ी कि वे पार्टी छोड़ने को मजबूर हो गए। इसी तरह बरखूराम वर्मा विधानसभा अध्यक्ष थे।
अचानक उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधि की तोहमत मढ़कर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। आज वे इस दुनिया में नहीं हैं। दीनानाथ भास्कर कांशीराम के विश्वस्त सहयोगियों में माने जाते थे।
1993 में वे बसपा-सपा गठबंधन सरकार में मंत्री बने। मायावती से उनकी मतभिन्नता बढ़ी तो उन्हें भी बाहर होना पड़ा। कुछ समय बाद वे फिर बसपा में आए लेकिन ज्यादा दिन रह नहीं सके।
पिछले विधानसभा चुनाव के पहले भास्कर भाजपा में शामिल हो गए और लंबे अर्से बाद विधायक बन सके। कांशीराम की टीम में नसीमुद्दीन सिद्दीकी इस समय इकलौते प्रमुख नेता थे जो बसपा में अहम भूमिका में थे। मायावती ने अब सिद्दीकी को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया है।
एक-एक करके बिछड़ते गए साथी...
- डॉ. मसूद अहमद भी सपा-बसपा सरकार में शिक्षामंत्री थे। मायावती को उनकी तेजी पसंद नहीं आई तो उन्हें मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया।
- पूर्व मंत्री दद्दू प्रसाद बसपा के मिशनरी नेताओं में गिने जाते थे। मायावती ने पहले उन्हें प्रदेश के बाहर दूसरे राज्यों की जिम्मेदारी दी फिर बाहर का रास्ता दिखा दिया। हाल में वे फिर बसपा में लौट आए हैं। उन्हें फिर दूसरे राज्य की जिम्मेदारी मिली है।
- सोनेलाल पटेल बसपा में पिछड़ा वर्ग के चेहरे हुआ करते थे। वे तेजी से जनाधार बढ़ा रहे थे। उन्हें भी बसपा से बाहर होना पड़ा। आगे चलकर उन्होंने अपना दल बनाया।
- बाबू सिंह कुशवाहा बसपा सुप्रीमो के सबसे विश्वस्त लोगों में गिने जाते थे। तब उनकी हैसियत पार्टी में नंबर दो की मानी जाती थी। पिछड़े वर्ग में उनका आधार भी था। एनआरएचएम घोटाले में कुशवाहा का नाम आया तो मायावती ने उन्हें पार्टी से बाहर करने में तनिक भी देर नहीं लगाई।
- कुशवाहा के बाद स्वामी प्रसाद मौर्य की भूमिका बसपा में नंबर दो की हो गई थी। विधानसभा चुनाव से पहले टिकट बंटवारे को लेकर मायावती व मौर्य की मतभिन्नता इस कदर बढ़ी कि मौर्य ने सबसे मुखर आरोपों की बौछार कर बसपा छोड़ दी।
- आरके चौधरी बसपा संस्थापक कांशीराम के अहम सहयोगियों में थे। एक बार बसपा से बाहर होने के बाद वे दोबारा फिर बसपा में शामिल हुए। पर, ज्यादा दिन टिक नहीं पाए। विधानसभा चुनाव के पहले चौधरी को फिर बसपा छोड़नी पड़ी।
बसपा में जुगुल किशोर, ब्रजेश पाठक , दारा सिंह चौहान सहित तमाम चेहरे जो कभी लाइमलाइट में हुआ करते थे, आज अलग होकर अपनी सियासत आगे बढ़ा रहे हैं।