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मायावती का लोकसभा चुनाव 2024 से पहले बड़ा दांव: अब आकाश के सियासी प्रबंधन के सहारे बसपा, भतीजे के लिए बड़ी चुनौती
Mon, 28 Mar 2022 10:54 AM IST
शाहरुख खान
अमित मुद्गल, अमर उजाला, लखनऊ
अमित मुद्गल, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: शाहरुख खान
Updated Mon, 28 Mar 2022 10:54 AM IST
सार
वोट शेयर लगातार गिरने से चिंतित बसपा थिंक टैंक का मानना है कि आकाश को यदि अहम दलित चेहरे के रूप में स्थापित कर दिया जाए तो दलित वोटर तो बसपा के साथ खड़ा रहेगा ही। इस विस चुनाव में बसपा की हालत बेहद पतली हो गई। बसपा को इस चुनाव में कुल 12.9 फीसदी वोट मिले।
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फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अब बसपा मायावती के भतीजे आकाश आनंद के सहारे सियासी प्रबंधन तलाश रही है। मायावती ने उन्हें पार्टी का इकलौता नेशनल कोऑर्डिनेटर बरकरार रखा है और कहा है कि उन्हें यूपी में पार्टी के कार्यों की प्रगति रिपोर्ट लेने के लिए समय-समय पर भेजा जाएगा।
दरअसल वोट शेयर लगातार गिरने से चिंतित बसपा थिंक टैंक का मानना है कि आकाश को यदि अहम दलित चेहरे के रूप में स्थापित कर दिया जाए तो दलित वोटर तो बसपा के साथ खड़ा रहेगा ही। इस विस चुनाव में बसपा की हालत बेहद पतली हो गई। बसपा को इस चुनाव में कुल 12.9 फीसदी वोट मिले।
माना जा रहा है कि यूपी में वह दलित वोटर ही बसपा को पूरा नहीं मिल पाया जो बसपा की राजनीति का आधार है। चूंकि यूपी में दलित वोटरों की संख्या लगभग तीन करोड़ है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है बसपा का काडर वोट बैंक बड़ी संख्या में शिफ्ट हुआ। अब बसपा की निगाह 2024 के लोकसभा चुनाव पर है और उसी हिसाब से आगे की रणनीति तय करने की मशक्कत है।
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दलित चेहरे को आगे करने की कवायद
इस चुनाव में मायावती 2007 की तरह से सोशल इंजीनियरिंग करना चाहती थीं। इसके लिए पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा को आगे किया गया। इरादा था कि उनके कारण ब्राह्मण वोटर साथ होंगे। दलित और मुस्लिम जुड़ गए तो नैया पार हो जाएगी। उन्होंने खूब सम्मेलन भी किए पर सारा प्लान धरा का धरा रह गया। दलित भी शिफ्ट हो गए। ब्राह्मण आए नहीं और मुस्लिमों ने सपा का दामन थामा। यही कारण है कि मायावती अब अपने भतीजे आकाश को आगे कर उन्हें दलित चेहरे के रूप में स्थापित करने की कोशिश में हैं ताकि अपने काडर वोटर को बचाया जा सके।
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दरअसल वोट शेयर लगातार गिरने से चिंतित बसपा थिंक टैंक का मानना है कि आकाश को यदि अहम दलित चेहरे के रूप में स्थापित कर दिया जाए तो दलित वोटर तो बसपा के साथ खड़ा रहेगा ही। इस विस चुनाव में बसपा की हालत बेहद पतली हो गई। बसपा को इस चुनाव में कुल 12.9 फीसदी वोट मिले।
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माना जा रहा है कि यूपी में वह दलित वोटर ही बसपा को पूरा नहीं मिल पाया जो बसपा की राजनीति का आधार है। चूंकि यूपी में दलित वोटरों की संख्या लगभग तीन करोड़ है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है बसपा का काडर वोट बैंक बड़ी संख्या में शिफ्ट हुआ। अब बसपा की निगाह 2024 के लोकसभा चुनाव पर है और उसी हिसाब से आगे की रणनीति तय करने की मशक्कत है।
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दलित चेहरे को आगे करने की कवायद
इस चुनाव में मायावती 2007 की तरह से सोशल इंजीनियरिंग करना चाहती थीं। इसके लिए पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा को आगे किया गया। इरादा था कि उनके कारण ब्राह्मण वोटर साथ होंगे। दलित और मुस्लिम जुड़ गए तो नैया पार हो जाएगी। उन्होंने खूब सम्मेलन भी किए पर सारा प्लान धरा का धरा रह गया। दलित भी शिफ्ट हो गए। ब्राह्मण आए नहीं और मुस्लिमों ने सपा का दामन थामा। यही कारण है कि मायावती अब अपने भतीजे आकाश को आगे कर उन्हें दलित चेहरे के रूप में स्थापित करने की कोशिश में हैं ताकि अपने काडर वोटर को बचाया जा सके।
आकाश के लिए बड़ी चुनौती
मायावती बार-बार कहती रहीं हैं कि उनका उत्तराधिकारी दलित ही होगा। हालांकि साथ में यह भी कहती रही हैं कि अभी वह बिल्कुल स्वस्थ हैं और लंबे समय तक राजनीति में सक्रिय रहने वाली हैं पर साथ ही अपने काडर वोटर को मजबूत करने के लिए दलित उत्तराधिकारी का दांव खेलना नहीं भूलती हैं।
चर्चा है कि मायावती का यह कदम इसी दिशा में बढ़ा हुआ नजर आ रहा है। हालांकि आकाश के लिए खुद को इस कसौटी पर खरा उतरने की चुनौती भी है। वह यूपी में मंच पर तो कई बार नजर आए पर बड़ी जिम्मेदारी के साथ जिस तरह से वर्ष 2024 लोकसभा चुनाव के लिए उनकी भूमिका तैयार की जा रही है, वह उनके लिए चुनौती भरी होगी।
चर्चा है कि मायावती का यह कदम इसी दिशा में बढ़ा हुआ नजर आ रहा है। हालांकि आकाश के लिए खुद को इस कसौटी पर खरा उतरने की चुनौती भी है। वह यूपी में मंच पर तो कई बार नजर आए पर बड़ी जिम्मेदारी के साथ जिस तरह से वर्ष 2024 लोकसभा चुनाव के लिए उनकी भूमिका तैयार की जा रही है, वह उनके लिए चुनौती भरी होगी।