{"_id":"5ce8f24abdec22077268a9ed","slug":"manish-sinha-cant-calculate-it-right-for-ghazipur-seat","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"पिछली बार 1.40 लाख वोटों से जीतने वाले मनोज सिन्हा इस बार गाजीपुर के गणित से नहीं पा सके पार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पिछली बार 1.40 लाख वोटों से जीतने वाले मनोज सिन्हा इस बार गाजीपुर के गणित से नहीं पा सके पार
Sat, 25 May 2019 01:14 PM IST
Amulya Rastogi
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला लखनऊ
Published by: Amulya Rastogi
Updated Sat, 25 May 2019 01:14 PM IST
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मनोज सिन्हा
- फोटो : अमर उजाला
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चुनावी समर में उत्तर प्रदेश के मैदान में उतरे केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्यों में अकेले मनोज सिन्हा नहीं जीत सके। सिन्हा की हार चौंकाने वाली है क्योंकि मोदी मंत्रिमंडल में रहते मनोज सिन्हा के कराए कामों के लिए उनके विरोधी भी कायल हैं। फिर भी सिन्हा 2014 के मुकाबले 1.40 लाख ज्यादा वोट पाने के बावजूद हार गए।
फौरी तौर पर इसकी वजह अगर कुछ नजर आती है तो वह है गाजीपुर का सामाजिक समीकरण और इस सीट का गणित। इस गणित से पार पाना सिन्हा के लिए काफी मुश्किल था। यही वजह रही कि सिन्हा इतने ज्यादा मतों की बढ़ोतरी के बावजूद हार गए। उनके मुकाबले गठबंधन से बसपा के टिकट पर उतरे अफजाल अंसारी वोटों में सिर्फ 50 हजार की वृद्धि करके चुनाव जीत गए।
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फौरी तौर पर इसकी वजह अगर कुछ नजर आती है तो वह है गाजीपुर का सामाजिक समीकरण और इस सीट का गणित। इस गणित से पार पाना सिन्हा के लिए काफी मुश्किल था। यही वजह रही कि सिन्हा इतने ज्यादा मतों की बढ़ोतरी के बावजूद हार गए। उनके मुकाबले गठबंधन से बसपा के टिकट पर उतरे अफजाल अंसारी वोटों में सिर्फ 50 हजार की वृद्धि करके चुनाव जीत गए।
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यह है समीकरण
गाजीपुर सीट पर यादव, मुस्लिम और अनुसूचित जाति के मतदाता काफी निर्णायक हैं। इनकी संख्या 9 लाख के आसपास है। इनमें मुस्लिम लगभग दो लाख हैं। जनसंघ के संस्थापकों में शामिल रहे पं. दीनदयाल उपाध्याय यूं ही नहीं कहा करते थे कि जिस दिन वह गाजीपुर सीट जीत लेंगे, उस दिन प्रदेश में जनसंघ की सरकार बन जाएगी।
ऐसा कहने के पीछे वजह गाजीपुर के सामाजिक समीकरण और वहां की जमीन से सरजू पांडेय, विश्वनाथ शास्त्री तथा विश्वनाथ गहमरी जैसे विद्रोही तेवरों वाली शख्सियतों का होना है। इस कारण पिछड़े, अनुसूचित जाति व मुस्लिम एक खेमे में रहते हैं और हिंदुओं की अगड़ी जातियां, खास तौर से भूमिहार दूसरे खेमे में।
ऐसा कहने के पीछे वजह गाजीपुर के सामाजिक समीकरण और वहां की जमीन से सरजू पांडेय, विश्वनाथ शास्त्री तथा विश्वनाथ गहमरी जैसे विद्रोही तेवरों वाली शख्सियतों का होना है। इस कारण पिछड़े, अनुसूचित जाति व मुस्लिम एक खेमे में रहते हैं और हिंदुओं की अगड़ी जातियां, खास तौर से भूमिहार दूसरे खेमे में।
यह भी है वजह
पुराने लोग बताते हैं कि सरजू पांडेय, विश्वनाथ शास्त्री और गहमरी ने गरीबों को उनका हक दिलाने और गरीबी के खिलाफ जिस तरह संघर्ष किया, उसके चलते गाजीपुर में ये खांचे बन गए। गहमरी समाजवादी थे तो पांडेय व शास्त्री कम्युनिस्ट।
दिलचस्प यह है कि मनोज सिन्हा और अफजाल अंसारी स्कूल में साथ पढ़े हैं। दोनों ही लोग सांसद रह चुके हैं, पर पूर्वांचल में भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या में जब अफजाल के भाई मुख्तार अंसारी का नाम आया और मनोज सिन्हा ने कृष्णानंद हत्याकांड में मुख्तार के खिलाफ पैरवी की, तबसे गाजीपुर में मुस्लिम और भूमिहारों के बीच गहरी खाई खिंच गई।
इसमें गाजीपुर के सामाजिक समीकरणों ने भी भूमिका निभाई और जातीय गोलबंदी गहरी होती चली गई, जिसे इस रंजिश ने और बढ़ाया।
दिलचस्प यह है कि मनोज सिन्हा और अफजाल अंसारी स्कूल में साथ पढ़े हैं। दोनों ही लोग सांसद रह चुके हैं, पर पूर्वांचल में भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या में जब अफजाल के भाई मुख्तार अंसारी का नाम आया और मनोज सिन्हा ने कृष्णानंद हत्याकांड में मुख्तार के खिलाफ पैरवी की, तबसे गाजीपुर में मुस्लिम और भूमिहारों के बीच गहरी खाई खिंच गई।
इसमें गाजीपुर के सामाजिक समीकरणों ने भी भूमिका निभाई और जातीय गोलबंदी गहरी होती चली गई, जिसे इस रंजिश ने और बढ़ाया।
समझने की जरूरत
सरजू पांडेय की छवि गरीबों के मसीहा वाली थी। अफजाल अंसारी ने भी उन्हीं के सान्निध्य में सियासी पारी शुरू की। अफजाल कम्युनिस्ट पार्टी से ही विधायक रहे। शायद यही वजह है कि अफजाल की भी पिछड़ी जातियों और अनुसूचित जाति में पैठ व पहचान है।
कृष्णानंद राय हत्याकांड के चलते मुस्लिम उनके साथ लामबंद रहता ही है। इस बार सपा और बसपा के गठबंधन के नाते अफजाल का पक्ष और ज्यादा मजबूत हो गया। पिछड़ी और अनुसूचित जातियों की एकजुटता का उन्हें लाभ मिला।
2014 के लोकसभा चुनाव में इस सीट पर सपा और बसपा को अलग-अलग मिले वोटों का जोड़ सिन्हा को मिले वोटों से लगभग एक लाख अधिक था। पर, सिन्हा को विरोधी वोटों में बंटवारे का लाभ मिल गया था। इस बार ऐसा नहीं हो पाया। हालांकि गठबंधन को पिछली बार की तुलना में लगभग एक प्रतिशत वोट कम मिला। फिर भी अफजाल एक लाख से अधिक वोटों से जीत गए।
बताया यह भी जा रहा है कि अफजाल ने चुनावी लड़ाई को अपने और मनोज सिन्हा के बीच ही केंद्रित रखने को ताकत लगाई और इसमें सफल भी रहे। इसी वजह से प्रदेश में जहां अन्य स्थानों पर मोदी फैक्टर चला, वहीं गाजीपुर की लड़ाई मनोज सिन्हा पर ही केंद्रित रह गई। रही-सही कसर पूरी कर दी बाहर से गाजीपुर पहुंचे भूमिहार चेहरों ने, जिनकी भीड़ ने भी सिन्हा विरोधियों की गोलबंदी बढ़ाई।
कृष्णानंद राय हत्याकांड के चलते मुस्लिम उनके साथ लामबंद रहता ही है। इस बार सपा और बसपा के गठबंधन के नाते अफजाल का पक्ष और ज्यादा मजबूत हो गया। पिछड़ी और अनुसूचित जातियों की एकजुटता का उन्हें लाभ मिला।
2014 के लोकसभा चुनाव में इस सीट पर सपा और बसपा को अलग-अलग मिले वोटों का जोड़ सिन्हा को मिले वोटों से लगभग एक लाख अधिक था। पर, सिन्हा को विरोधी वोटों में बंटवारे का लाभ मिल गया था। इस बार ऐसा नहीं हो पाया। हालांकि गठबंधन को पिछली बार की तुलना में लगभग एक प्रतिशत वोट कम मिला। फिर भी अफजाल एक लाख से अधिक वोटों से जीत गए।
बताया यह भी जा रहा है कि अफजाल ने चुनावी लड़ाई को अपने और मनोज सिन्हा के बीच ही केंद्रित रखने को ताकत लगाई और इसमें सफल भी रहे। इसी वजह से प्रदेश में जहां अन्य स्थानों पर मोदी फैक्टर चला, वहीं गाजीपुर की लड़ाई मनोज सिन्हा पर ही केंद्रित रह गई। रही-सही कसर पूरी कर दी बाहर से गाजीपुर पहुंचे भूमिहार चेहरों ने, जिनकी भीड़ ने भी सिन्हा विरोधियों की गोलबंदी बढ़ाई।
2014
प्रत्याशी दल वोट मत प्रतिशत
मनोज सिन्हा भाजपा 3,06,929 31.11
शिवकन्या कुशवाहा सपा 2,74,477 27.82
कैलाश नाथ सिंह यादव बसपा 2,41,645 24.49
2019
मनोज सिन्हा भाजपा 4,46,690 40.4
अफजाल अंसारी गठबंधन 5,66,082 51.20
प्रत्याशी दल वोट मत प्रतिशत
मनोज सिन्हा भाजपा 3,06,929 31.11
शिवकन्या कुशवाहा सपा 2,74,477 27.82
कैलाश नाथ सिंह यादव बसपा 2,41,645 24.49
2019
मनोज सिन्हा भाजपा 4,46,690 40.4
अफजाल अंसारी गठबंधन 5,66,082 51.20