फिर आई मैगी से जुड़ी एक बुरी खबर, दर्ज हुआ केस
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नेस्ले इंडिया के उत्पाद मैगी को लेकर गोरखपुर की लैब के बाद सेंट्रल लैब कोलकता ने भी निर्माण फार्मूले में गड़बड़ी की पुष्टि कर दी है। रिपोर्ट में मोनोसोडियम ग्लूटामेट पाए जाने की बात सामने आई है, जबकि रैपर पर मोनोसोडियम के नहीं डाले जाने का जिक्र किया गया है।
मामले में खाद्य एवं औषधि आयुक्त स्तर से अनुमति मिलते ही अभिहीत अधिकारी ने एडीएम सिटी की कोर्ट में शनिवार को नेस्ले इंडिया, डीपो नारायण डिस्ट्रीब्यूटर और उसके नॉमिनी मयंक दूबे पर मुकदमा दायर किया है। जबकि रुदौली के श्याम एजेंसी और उसके संचालक पर मुकदमा चलाने के लिए शासन से अनुमति मांगी गई है।
नेस्ले इंडिया की नारायण डिस्ट्रीब्यूटर से आठ मई 2015 को मैगी के दो नमूने संकलित किए गए थे। मुख्य खाद्य सुरक्षा अधिकारी रत्नाकर पांडेय ने मैगी के 280 ग्राम पैकेट को और खाद्य सुरक्षा अधिकारी सूर्यमणि ने 70 ग्राम के पैकेट का एक-एक नमूना संकलित किया था।
वहीं खाद्य सुरक्षा अधिकारी विवेक कुमार ने रुदौली कस्बे की श्याम एजेंसी से मैगी के 70 ग्राम पैकेट का एक नमूना संकलित किया था। संकलित किए गए तीनों नमूने जांच के लिए खाद्य एवं औषधि प्रयोगशाला गोरखपुर भेजे गए, जहां से 10 जुलाई 2015 को आई रिपोर्ट में नियमों के उल्लंघन की पुष्टि की गई।
जानिए क्या हैं मोनोसोडियम ग्लूटामेट के नुकसान
केंद्रीय प्रयोगशाला की रिपोर्ट में नेस्ले की मैगी में मोनोसोडियम ग्लूटामेट पाए जाने की पुष्टि की गई है, जबकि रैपर पर मोनोसोडियम के नहीं डाले जाने का जिक्र किया गया है। रिपोर्ट आते ही नेस्ले कंपनी के साथ उसके डीपो होल्डर नारायण डिस्ट्रीब्यूटर और उसके नामिनी मयंक दूबे पर सात मई को एडीएम सिटी के न्यायालय में खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत मुकदमा दायर कर दिया गया है।
जिला अस्पताल के वरिष्ठ फीजिशियन नानक सरन कहते हैं कि मोनोसोडियम ग्लूटामेट एक साल तक के बच्चों को बिल्कुल भी नहीं दिया जाना चाहिए। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। मोनोसोडियम ग्लूटामेट संबंधित खाद्य पदार्थ का आदि बना देता है।
बच्चे ज्यादा खाने लगते हैं, इससे उनका वजन व लीवर पर असर पड़ता है। यह ऐसा तत्व है जो कृत्रिम रूप से मैगी के स्वाद को बढ़ा देता है। यही कारण है कि बच्चे इसे चाव से अधिक खाते हैं। इसकी अधिक मात्रा बच्चों की सेहत को नुकसान पहुंचाती है।