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ब्लड मार्कर से गांठ न होने पर भी पता चल सकेगा कैंसर, ये ऐसे करेगा काम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Updated Mon, 05 Feb 2018 02:44 PM IST
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ब्लड मार्कर की जानकारी देते डॉ वेद प्रकाश
- फोटो : amarujala
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फेफड़े का कैंसर है या नहीं, इसका पता करने के लिए बायोप्सी और अलग-अलग जांचें नहीं करानी पड़ेगी। न ही महीनों जांच रिपोर्टों के लिए इंतजार करना पड़ेगा। अब कई अन्य कैंसर की तरह महज खून की जांच से ही फेफड़े के कैंसर की भी पुष्टि हो सकेगी। केजीएमयू के विशेषज्ञों का दावा है कि उन्होंने एक ब्लड मार्कर खोज लिया है जिससे खून की जांच से ही फेफड़े के कैंसर का पता लगाया जा सकता है।
रिसर्च में शामिल रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के डॉ. वेद प्रकाश और डॉ. सतेंद्र सिंह ने का दावा है कि उन्होंने एक ब्लड मार्कर ढूंढ लिया है। सेल्युलर लेवल से हटकर यह रिसर्च अब मॉलीक्युलर लेवल पर की जा रही है। विशेषज्ञों ने ब्लड में मौजूद माइक्रो आरएनए (एमआईआरएनए) के जरिये मार्कर ढूंढा है, जिससे ब्लड की जांच से लंग कैंसर का पता चल सकेगा।
मार्कर क्या है : आसान शब्दों में कहें तो हमारे शरीर की कोशिकाएं कुछ खास केमिकल पैदा करती हैं। कुछ ऐसे केमिकल होते हैं जिनका बढ़ना कैंसर की ओर इशारा करता है। ऐसे केमिकल की मार्क कर लेना यानी पहचान कर लेना ही मार्कर है। प्रॉस्टेट कैंसर में ऐसे ब्लड मार्कर टेस्ट का इस्तेमाल होता है।
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रिसर्च में शामिल रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के डॉ. वेद प्रकाश और डॉ. सतेंद्र सिंह ने का दावा है कि उन्होंने एक ब्लड मार्कर ढूंढ लिया है। सेल्युलर लेवल से हटकर यह रिसर्च अब मॉलीक्युलर लेवल पर की जा रही है। विशेषज्ञों ने ब्लड में मौजूद माइक्रो आरएनए (एमआईआरएनए) के जरिये मार्कर ढूंढा है, जिससे ब्लड की जांच से लंग कैंसर का पता चल सकेगा।
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मार्कर क्या है : आसान शब्दों में कहें तो हमारे शरीर की कोशिकाएं कुछ खास केमिकल पैदा करती हैं। कुछ ऐसे केमिकल होते हैं जिनका बढ़ना कैंसर की ओर इशारा करता है। ऐसे केमिकल की मार्क कर लेना यानी पहचान कर लेना ही मार्कर है। प्रॉस्टेट कैंसर में ऐसे ब्लड मार्कर टेस्ट का इस्तेमाल होता है।
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ऐसे चलेगा कैंसर का पता
डॉ वेद प्रकाश
- फोटो : amarujala
ये काम कैसे करेगा : डॉ. वेद प्रकाश बताते हैं कि माइक्रोआरएनए (मॉलीक्यूल्स) कोशिकाओं को रेगुलेट यानी उनको नियंत्रित करते हैं। न्यूरो व स्टेम को छोड़ कर शरीर के सभी सेल्स 100 दिनों में मरते और बदलते रहते हैं, यानी 100 दिनों में बॉडी कोशिकीय स्तर पर बदलती रहती है। सामान्य लोगों में नई कोशिकाएं हमेशा अनुशासित तरीके से ही बढ़ते हैं। अगर इन सेल्स का डीरेगुलेशन होता है तो यह सेल्स की असामान्य ग्रोथ कैंसर की निशानी हो सकती है।
ऐसे चलेगा कैंसर का पता :डॉ. वेद के मुताबिक 80 मरीजों पर शोध में पाया गया कि जिन्हें कैंसर की शिकायत थी, उनके सैंपल में एमआईआरएनए का स्तर असामान्य रूप से बढ़ा हुआ पाया गया। शोध में लिए गए छह एमआईआरएनए मार्कर का काम करेंगे, जिससे ब्लड की जांच से ही ब्लड में मौजूद यह मार्कर बता देंगे कि लंग कैंसर है या नहीं।
यह रिसर्च अहम क्यों : दरअसल फेफड़े के कैंसर के लक्षण जब तक खुलकर सामने आते हैं कैंसर आखिरी स्टेज में पहुंच चुका होता है। ऐसे में मरीज का बचना लगभग नामुमकिन हो जाता है। अगर महज ब्लड की जांच से इसका पता चल जाए तो खांसी जैसी समस्या होने पर भी आसानी से लंग कैंसर की जांच कराई जा सकती है।
ब्लड मार्कर के जरिये फेफड़े के कैंसर का पता लगाना क्या अन्य विधियों से आसान है, इस सवाल पर रिसर्च में शामिल केजीएमयू के डॉ. सतेंद्र बताते हैं कि फेफड़े की कोशिकाएं बहुत सॉफ्ट होती हैं। अगर गांठ होने पर इसका पता किसी जांच में भी नहीं चल पाता तो इससे कैंसर पकड़ में नहीं आता है।
ऐसे चलेगा कैंसर का पता :डॉ. वेद के मुताबिक 80 मरीजों पर शोध में पाया गया कि जिन्हें कैंसर की शिकायत थी, उनके सैंपल में एमआईआरएनए का स्तर असामान्य रूप से बढ़ा हुआ पाया गया। शोध में लिए गए छह एमआईआरएनए मार्कर का काम करेंगे, जिससे ब्लड की जांच से ही ब्लड में मौजूद यह मार्कर बता देंगे कि लंग कैंसर है या नहीं।
यह रिसर्च अहम क्यों : दरअसल फेफड़े के कैंसर के लक्षण जब तक खुलकर सामने आते हैं कैंसर आखिरी स्टेज में पहुंच चुका होता है। ऐसे में मरीज का बचना लगभग नामुमकिन हो जाता है। अगर महज ब्लड की जांच से इसका पता चल जाए तो खांसी जैसी समस्या होने पर भी आसानी से लंग कैंसर की जांच कराई जा सकती है।
ब्लड मार्कर के जरिये फेफड़े के कैंसर का पता लगाना क्या अन्य विधियों से आसान है, इस सवाल पर रिसर्च में शामिल केजीएमयू के डॉ. सतेंद्र बताते हैं कि फेफड़े की कोशिकाएं बहुत सॉफ्ट होती हैं। अगर गांठ होने पर इसका पता किसी जांच में भी नहीं चल पाता तो इससे कैंसर पकड़ में नहीं आता है।
अब तक बायोप्सी ही है एकमात्र विकल्प
cancer
वहीं कई बार गांठ न होने पर भी मरीज को कैंसर होता है। इस ब्लड टेस्ट के जरिये अगर मरीज को गांठ बिना भी कैंसर है, तो इसका भी पता चल जाएगा। छह माह के भीतर यह शोध पूरा हो जाएगा। विश्व कैंसर दिवस पर मीडिया से बातचीत में केजीएमयू के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के डॉ. वेद प्रकाश ने बताया कि लंग कैंसर का शुरुआती दौर में पता नहीं चल पाता है।
जब तक मरीज में लक्षण आते हैं, तब तक वह कैंसर की अंतिम स्टेज तक पहुंच चुका होता है। उस स्टेज में कीमोथेरेपी की आखिरी इलाज बचता है। ऐसे में उन्हें बचा पाना लगभग नामुमकिन होता है। उन्होंने बताया कि अगर सही समय पर जांच से पता चल जाए तो जान बचाई जा सकती है। अगर महज ब्लड की जांच से इसका पता चल जाए तो खांसी जैसी समस्या होने पर भी आसानी से लंग कैंसर की जांच कराई जा सकती है।
रिसर्च में शामिल डॉ. वेद प्रकाश और डॉ. सतेंद्र सिंह ने बताया कि रिसर्च लगातार खांसी, सीने मे दर्द, सांस लेने में तकलीफ की समस्या लेकर केजीएमयू पहुंचे 80 मरीजों पर की गई है। इन मरीजों की हिस्टोपैथोलॉजी (टिशु के जरिये) जांच की गई, जिसमें 80 में से 66 (52 पुरुष व 14 महिलाएं) मरीजों में लंग कैंसर की पुष्टि हुई। उसके बाद मरीजों की जांच करने को लिए गए सैंपल के एक और हिस्से को शोध के लिए संरक्षित कर लिया गया।
अब तक लंग कैंसर का पता लगाने के लिए बायोप्सी समेत कई जांचें कराई जाती थीं। जांच कराने और रिपोर्ट आने तक माह भर से अधिक समय लग जाता है। ऐसे में अगर मरीज को कैंसर है तो उसका न सिर्फ समय बर्बाद होता है बल्कि अधिक पैसे भी खर्च हो जाते हैं।
जब तक मरीज में लक्षण आते हैं, तब तक वह कैंसर की अंतिम स्टेज तक पहुंच चुका होता है। उस स्टेज में कीमोथेरेपी की आखिरी इलाज बचता है। ऐसे में उन्हें बचा पाना लगभग नामुमकिन होता है। उन्होंने बताया कि अगर सही समय पर जांच से पता चल जाए तो जान बचाई जा सकती है। अगर महज ब्लड की जांच से इसका पता चल जाए तो खांसी जैसी समस्या होने पर भी आसानी से लंग कैंसर की जांच कराई जा सकती है।
रिसर्च में शामिल डॉ. वेद प्रकाश और डॉ. सतेंद्र सिंह ने बताया कि रिसर्च लगातार खांसी, सीने मे दर्द, सांस लेने में तकलीफ की समस्या लेकर केजीएमयू पहुंचे 80 मरीजों पर की गई है। इन मरीजों की हिस्टोपैथोलॉजी (टिशु के जरिये) जांच की गई, जिसमें 80 में से 66 (52 पुरुष व 14 महिलाएं) मरीजों में लंग कैंसर की पुष्टि हुई। उसके बाद मरीजों की जांच करने को लिए गए सैंपल के एक और हिस्से को शोध के लिए संरक्षित कर लिया गया।
अब तक लंग कैंसर का पता लगाने के लिए बायोप्सी समेत कई जांचें कराई जाती थीं। जांच कराने और रिपोर्ट आने तक माह भर से अधिक समय लग जाता है। ऐसे में अगर मरीज को कैंसर है तो उसका न सिर्फ समय बर्बाद होता है बल्कि अधिक पैसे भी खर्च हो जाते हैं।
लंग कैंसर दुनिया का सबसे खतरनाक तीसरा कैंसर
डेमो
- फोटो : amar ujala
डॉ. वेद प्रकाश ने बताया कि केजीएमयू में लंग कैंसर के मरीजाें की जांच की राह पहले से काफी आसान हो गई है। पहले थोरेकोस्कोपी के जरिये जांच की जाती थी। इस विधि से जांच में रिपोर्ट पूरी तरह क्लीयर नहीं होती थी। अब ब्रांकोस्कोपी की आधुनिक विधि से ईबस मशीन से न केवल बायोप्सी बल्कि अल्ट्रासाउंड भी किया जाता है।
इस जांच से लंग में कहां-कहां पर कैंसर है, इसका पता आसानी से लगाया जा सकता है। डॉ. सतेंद्र ने बताया कि दुनिया में कैंसर के कारण हो रही मौतों में तीसरा सबसे बड़ा कारण लंग कैंसर है। उन्होंने बताया कि दुनिया में सर्वाइकल कैंसर से सबसे अधिक मौतें हो रही हैं। वहीं दूसरे नंबर पर ब्रेस्ट कैंसर है।
वहीं तीसरे नंबर कैंसर के मौत का कारण लंग का कैंसर है। इसका सबसे बड़ा कारण आखिरी स्टेज में पता चलना है। डॉ. वेद प्रकाश ने बताया कि केजीएमयू में लंग कैंसर की शिकायत के हर साल 1000 मरीज आते हैं। सभी मरीज कैंसर की एडवांस स्टेज में आते हैं। ऐसे में उनकी सर्जरी की भी गुंजाइश नहीं बचती।
ऐसे मरीजों को रेडियोथेरेपी व कीमोथेरेपी देना ही एकमात्र विकल्प होता है। यही कारण है कि यहां भी लंग कैंसर के मरीजों का सर्वाइवल रेट बेहद कम है। इनमें से करीब 10 प्रतिशत मरीज स्मॉल सेल लंग कैंसर, वही नॉन स्मॉल सेल लंग कैंसर के 90 प्रतिशत मरीज होते हैं।
इस जांच से लंग में कहां-कहां पर कैंसर है, इसका पता आसानी से लगाया जा सकता है। डॉ. सतेंद्र ने बताया कि दुनिया में कैंसर के कारण हो रही मौतों में तीसरा सबसे बड़ा कारण लंग कैंसर है। उन्होंने बताया कि दुनिया में सर्वाइकल कैंसर से सबसे अधिक मौतें हो रही हैं। वहीं दूसरे नंबर पर ब्रेस्ट कैंसर है।
वहीं तीसरे नंबर कैंसर के मौत का कारण लंग का कैंसर है। इसका सबसे बड़ा कारण आखिरी स्टेज में पता चलना है। डॉ. वेद प्रकाश ने बताया कि केजीएमयू में लंग कैंसर की शिकायत के हर साल 1000 मरीज आते हैं। सभी मरीज कैंसर की एडवांस स्टेज में आते हैं। ऐसे में उनकी सर्जरी की भी गुंजाइश नहीं बचती।
ऐसे मरीजों को रेडियोथेरेपी व कीमोथेरेपी देना ही एकमात्र विकल्प होता है। यही कारण है कि यहां भी लंग कैंसर के मरीजों का सर्वाइवल रेट बेहद कम है। इनमें से करीब 10 प्रतिशत मरीज स्मॉल सेल लंग कैंसर, वही नॉन स्मॉल सेल लंग कैंसर के 90 प्रतिशत मरीज होते हैं।