मेट्रो के लिए हर किसी को चुकानी पड़ेगी कीमत
मेट्रो रेल प्रोजेक्ट को साकार करने के एवज में राजधानी के लगभग हर एक बाशिंदे को करीब एक हजार रुपये के विदेशी कर्ज से दबना पड़ेगा।
दरअसल परियोजना के नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर के लिए करीब 3500 करोड़ रुपये का कर्ज लिया जाएगा। इसकी अदायगी राजधानी की 35 लाख की आबादी की जेब से ही होगी।
जब तक कर्ज का भुगतान नहीं होगा, तब तक शहर की जनता कर्जदार रहेगी। ऐसे में जितने अधिक लोग मेट्रो की सवारी करेंगे, उतनी ही जल्दी कर्ज चुकाया जा सकेगा।
लोन के लिए मिली हरी झंडी
मेट्रो रेल परियोजना में 60 फीसदी बजट विदेशी ऋण के माध्यम से लिया जाएगा। जिसके लिए मेट्रो रेल कॉरपोरेशन जापानी एजेंसी जाइका, एशियन डवलपमेंट बैंक और यूरोपियन इन्वेस्टमेंट बैंक के साथ लगातार संपर्क में है
सभी एजेंसियों से बहुत ही सकारात्मक संकेत मिले हैं। सभी बैंकों की ब्याजदर भी बहुत कम होगी। करीब 1.25 से 1.50 फीसदी के करीब ब्याज दर होगी।
मेट्रो के नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर के लिए तय किए गए 6800 करोड़ रुपये के कुल बजट में लगभग 3500 करोड़ रुपये के लोन की जरूरत होगी।
यूरोपियन इन्वेस्टमेंट बैंक से करीब 1600 करोड़ रुपये के ऋण को लेकर हरी झंडी मिलती दिख रही है। दूसरी ओर बाकी ऋण जाइका और एडीबी से भी मिल सकता है।
जनता की जेब से अदा करेंगे कर्ज
एलएमआरसी के एक अधिकारी ने बताया कि मेट्रो की राइडरशिप (यात्री संख्या) जितनी अधिक होगी, कर्ज उतारना उतना ही आसान होगा।
प्रत्येक बैंक 15 से 20 साल के बीच ऋण देती है। बैंकों के ऋण देने का आधार भी मेट्रो में सफर करने वाले यात्रियों की संख्या और उससे होने वाला फायदा ही होता है।
राजधानी में शुरुआत में हर रोज 2 लाख यात्रियों के मेट्रो में सफर करने की उम्मीद है। यह संख्या साल 2024 तक आठ लाख यात्री रोजाना तक पहुंच जाएगी। करीब 15 फीसदी आबादी 2024 तक रोज मेट्रो ट्रेन में बैठेगी।
ट्रांसपोर्ट नगर से मुंशीपुलिया तक का किराया करीब 38 रुपये होगा। जबकि, बीच के स्टेशनों के लिए अलग-अलग किराया तय होगा।
35 लाख शहरी होंगे मेट्रो के यात्री
राजधानी में शहरी आबादी जो मेट्रो का उपयोग कर सकती है, वह करीब 35 लाख है। ऐसे में 3500 करोड़ रुपये कर्ज के हिसाब से प्रत्येक नागरिक पर एक हजार रुपये का कर्ज केवल सामान्य परिस्थितियों में हो जाएगा।
इसके अलावा प्रत्येक वर्ष के ब्याज और उस पर विदेशी मुद्रा और भारतीय मुद्रा के हर साल बढ़ने वाले अंतर से प्रत्येक वर्ष इस औसत में कोई खास अंतर नहीं आएगा। जितना ब्याज और मुद्रा से कर्ज बढ़ेगा उतनी ही आबादी बढ़ेगी।
ऐसे में एक हजार रुपये के कर्ज का यह औसत लंबे समय तक बना रहेगा। जितना अधिक लोग मेट्रो में सफर करेंगे, उतनी ही जल्दी भुगतान किया जा सकेगा।