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बेमिसाल: केनेडी स्पेस सेंटर पहुंचा कार ड्राइवर का बेटा
लखनऊ/मनीष कुमार सिंह
Updated Wed, 21 Aug 2013 02:38 PM IST
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राजधानी का होनहार मोहम्मद उबैद सिद्दीकी अमेरिका के जॉन एफ कैनेडी स्पेस सेंटर (नासा) से वापस लौटा है।
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आर्थिक तंगी, तमाम परेशानियों को मोहम्मद उबैद सिद्दीकी (15) ने अपने हुनर के दम पर हरा दिया, लेकिन अब भविष्य को लेकर उसके साथ ही पूरा परिवार परेशान है।
एक निजी स्कूल में कार ड्राइवर का बेटा स्पेस शटल चलाना चाहता है, लेकिन उसकी उम्मीदों और सपनों पर मुफलिसी भारी पड़ रही है।
केंद्रीय विद्यालय, गोमतीनगर में ग्यारहवीं के छात्र उबैद ने स्कूल में राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित परीक्षा ‘आई कैन साइंटिफिका’ के कई दौर की परीक्षा पास की और 11 जून को नासा के जॉन एफ कैनेडी स्पेस सेंटर के लिए रवाना हुआ।
हालांकि, यहां तक पहुंचने का सफर इतना आसान नहीं था। पहले स्कूल स्तर पर हुई नेशनल लेव की प्रतियोगिता को तो उसने आसानी से पार कर लिया, लेकिन दूसरा दौर आसान नहीं था।
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इसमें हुई मॉडल प्रतियोगिता में पूरे देश में उसने पूरे देश में तीसरा स्थान हासिल किया और फाइनल राउंड के लिए दिल्ली पहुंचा। यहां उसने ‘फोर लेग इंसेटरी वोरस रोबोट’ प्रोजेक्ट पर काम कर पहला स्थान हासिल किया।
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इस परीक्षा को पास करने के बाद इंटरनेशनल राउंड क्वालीफाई करने के लिए मुंबई पहुंचा। यहां तीन दिन की वर्कशॉप के बाद उसने कांट्रैप्शन रोबोटिक्स पर आठ मॉडल बनाए।
यह मॉडल ऐसा था कि सर्किट से एक मॉडल को जोड़ देने भर से बाकी सारे सात मॉडल काम करने लगते थे। इस बेहतरीन मॉडल के लिए उसे यहां भी पहला स्थान मिला।
उबैद ने बताया कि जॉन एफ कैनेडी स्पेस सेंटर में काफी कुछ सीखने को मिला। वहां दुनिया भर से आए बच्चों को स्पेस ड्रेस तैयार करने की बारीकियां बताई गईं। इसके साथ ही जॉन एफ कैनेडी सेंटर के म्यूजियम में रखे स्पेस शटल अपोलो-7 की खासियतों से रूबरू कराया गया।
बेटे उबैद की आंखों में नासा के सपने तैर रहे हैं, लेकिन गरीबी और महंगी शिक्षा व्यवस्था उनके हौसले को तोड़ दे रही है। मां शमां कहती हैं कि बेटा पढ़ाई लिखाई में चाहें कितना भी तेज हो लेकिन पैसा नहीं है तो सब बेकार है।
मुख्यमंत्री से नहीं मिली कोई मदद
होनहार बेटे के भविष्य को लेकर चिंतित पिता अब्दुल हारूल मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के दरबार के चक्कर भी लगा चुके हैं। वो बताते हैं कि बेटे का भविष्य खतरे में न पड़े इसलिए मुख्यमंत्री से सहायता राशि के लिए जून 2012 में गुहार लगाई।
सितंबर में लेखपाल घर आए और तमाम जानकारियां लेकर वापस चले गए। अब एक साल होने को है, लेकिन कोई सूचना नहीं मिली। बस इसी बात को लेकर अब चिंता सताने लगी है कि पैसे की कमी कहीं होनहार बेटे की राह में रोड़ा न बन जाए।
स्कूल ने फीस भी माफ नहीं की
पांच हजार की नौकरी में घर का किराया, स्कूल की फीस और परिवार की देखभाल कैसे होती होगी ये सिर्फ मैं ही समझ सकता हूं। डबडबाई आंखों से उबैद के पिता अब्दुल हारूल बताते हैं कि स्कूल में फीस माफ करने के लिए प्रधानाध्यापक अरविंद गौर से मिला लेकिन उन्होंने बीपीएल कार्ड की मांग कर दी।
अब जब अपना कोई ठिकाना नहीं है तो कार्ड कैसे बनेगा। मकान मालिक से भी बात की लेकिन उन्होंने भी कोई मदद करने से साफ मना कर दिया। अब तो बस अल्लाह पर भरोसा है वहीं उबैद को उसके मंजिल पर पहुंचाएंगे।
21 जून को उबैद को लेने दिल्ली जा रहे हारूल का सड़क हादसे में दाहिना भी पैर टूट गया है। दो महीने से घर में बैठे हैं और अब घर-परिवार का खर्च चलाना भी मुश्किल हो गया है लेकिन कहीं से मदद की उम्मीद नहीं दिख रही है।