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माउजर खरीदने के लिए लूटा था काकोर में खजाना

Mon, 01 Jul 2019 02:06 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Mon, 01 Jul 2019 02:06 AM IST
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loot in kakori for mouser
1 जुलाई
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‘माउजर’ खरीदने के लिए लूटा काकोरी में खजाना
अंग्रेजों से मोर्चा लेने के लिए क्रांतिकारियों को ‘माउजर’ पिस्तौल की सख्त जरूरत थी। उस जमाने में जब एक रुपये का 18-20 किलो दूध और 30 किलो गेहूं मिलता था तब इसकी कीमत 75 रुपये थी। चोरी से यह 300 रुपये की मिलती थी। संयोग से उन्हीं दिनों जर्मनी में तैराकी प्रतियोगिता हो रही थी। शचीन्द्रनाथ बख्शी तैराकी संघ के मंत्री थे। उनके दल में एक अन्य कुशल तैराक केशव चक्रवर्ती थे। योजना के तहत केशव को तैराकी प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए जर्मनी भेजा गया। उन्होंने कई अदद ‘माउजर’ पिस्तौल भेजने की व्यवस्था जर्मन कार्गों से कर ली और भारत लौट आए। पिस्तौल लेकर आने वाला जहाज 1925 में जुलाई के अंतिम सप्ताह कलकत्ता बंदरगाह पर पहुंचने वाला था। रुपयों का इंतजाम करना था। अंग्रेजी हुकूमत में खुफिया विभाग में कार्यरत रहे धर्मेन्द्र गौड़ ने संस्मरण में लिखा है, ‘6 अगस्त 1925 को क्रांतिकारी शाहजहांपुर में एकत्र हुए और 9 अगस्त को काकोरी के निकट 8 डाउन ट्रेन से जाते हुए सरकारी खजाने पर हाथ साफ करने की योजना बनी। क्रांतिकारियों के हाथ 8600 रुपये लगे। कुछ रुपयों से दल का कर्ज चुकाया गया और शेष रकम लेकर शचीन्द्रनाथ बख्शी और राजेन्द्र लाहिड़ी ‘माउजर’ पिस्तौलों की डिलीवरी लेने कलकत्ता पहुंचे। अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक, देश की समुद्री सीमा से बाहर का समुद्र किसी भी राष्ट्रीय नियम से मुक्त होता है। वहां का क्षेत्र उसी देश का माना जाता है जिस देश का जहाज वहां होता है। तब भारत की समुद्र सीमा तीन मील थी अत: बिना अड़चन के पिस्तौलों का बंडल वहीं से छुड़ाया जा सकता था। बख्शी बंगाल की खाड़ी में समुद्र में तीन मील तैरकर अंदर गए और नगद भुगतान करके वहीं जहाज से ‘माउजर’ पिस्तौलें हासिल कीं और फिर अंधेरे में तैरकर वापस आ गए। इन्हीं ‘माउजर’ पिस्तौलों से राजगुरू ने साण्डर्स का सिर चकनाचूर किया और यही पिस्तौल चंद्रशेखर आजाद की अंतिम साथी बनी।’
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