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Awadh: अवध की 14 लोकसभा सीटों में से आठ में निर्णायक हैं मुस्लिम मतदाता, 35 फीसदी तक है आबादी, एक रिपोर्ट
Wed, 27 Mar 2024 01:37 PM IST
ishwar ashish
संवाद न्यूज एजेंसी, सुल्तानपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सुल्तानपुर
Published by: ishwar ashish
Updated Wed, 27 Mar 2024 01:37 PM IST
सार
अलहदा अवध की अपनी अलग ही शान है। अदब-ओ-आदाब और नफासत के लिए पूरी दुनिया में पहचान। यहां होली के रंग साझा होते हैं तो ईद की सेवइयां भी मिलकर खाई जाती हैं। इसीलिए यहां के बाशिंदे आम चुनावों में गंगा-जमुनी तहजीब पर मुहर लगाते हैं और बेहतर नुमाइंदे चुनते हैं। प्रस्तुत है एक रिपोर्ट...
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- फोटो : amar ujala
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विस्तार
अवध की 14 लोकसभा सीटों में आठ ऐसी हैं जहां मुस्लिम मत निर्णायक हैं। इनकी आबादी करीब 20 से लेकर 35 फीसदी तक है। खुद लखनऊ में इनकी आबादी 25 फीसदी से ज्यादा है, लेकिन आज तक यहां कोई मुस्लिम सांसद नहीं चुना गया। वहीं, 17 फीसदी आबादी वाले सुल्तानपुर ने दो-दो बार मुस्लिम प्रत्याशियों को संसद तक पहुंचाया।
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चार सीटों पर ही चुने गए मुस्लिम सांसद
अवध की सुल्तानपुर, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती सीट ही ऐसी हैं, जहां से मुस्लिम सांसद चुने गए। इन सीटों पर भी अब तक केवल 13 बार ही मुस्लिम सांसद चुने गए हैं। 33.53 फीसदी मुस्लिम आबादी वाली बहराइच सीट ने सबसे ज्यादा पांच बार मुस्लिम सांसद चुने। 1980 में कांग्रेस के मौलाना सैयद मुजफ्फर हुसैन पहले मुस्लिम प्रत्याशी थे जो बहराइच से जीते। 1984 में कांग्रेस से आरिफ मोहम्मद खान, 1989 में जनता दल और 1998 में बसपा से भी बाजी मारी। बीच में दो बार कांग्रेस के टिकट पर उन्हें हार का सामना करना पड़ा। 2004 में अंतिम बार सपा से रुबाब सइदा ने चुनाव जीता।
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अवध क्षेत्र में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाली सीट श्रावस्ती (पूर्व में बलरामपुर) है, लेकिन यहां 1989 में कांग्रेस से फसी-उर-रहमान उर्फ मुन्ना खान और 1998, 1999 में सपा के रिजवान जहीर खान ही जीतने में कामयाब हुए। इसके अलावा सुल्तानपुर सीट पर 1977 की लहर में जनता पार्टी के ज़ुल्फिकार उल्ला ने जीत दर्ज की। दूसरी बार 2004 में मोहम्मद ताहिर खान (बसपा) ने कामयाबी हासिल की। सीतापुर लोकसभा सीट से 1996 में सपा प्रत्याशी मुख्तार अनीस ने भाजपा के दिग्गज जनार्दन मिश्रा को हराया और 2009 में बसपा प्रत्याशी कैसर जहां ने सपा के महेंद्र सिंह वर्मा को मात दी।
आरिफ मोहम्मद खान ने बदली सोच
बहराइच से तीन बार सांसद और अब केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान सिर्फ मुस्लिम होने के नाते ही नहीं जीते, वह प्रगतिवादी मुस्लिम चेहरा भी माने जाते हैं। राजीव सरकार के उस फैसले का विरोध किया था जिसमें शाहबानो केस को अध्यादेश के जरिए पलट दिया गया था। उन्होंने तत्कालीन सरकार में राज्यमंत्री पद से इस्तीफा भी दे दिया।
नवाबों की राजधानियां रहीं अछूती
अवध की पहली राजधानी फैजाबाद (अब अयोध्या) हो या फिर लखनऊ, दोनों में कभी मुस्लिम सांसद नहीं चुने जा सके। फैजाबाद में तो अपेक्षाकृत मुस्लिम आबादी कम है, लेकिन लखनऊ में मुस्लिम आबादी 25 फीसदी से ज्यादा होने के बावजूद कभी कोई मुस्लिम प्रत्याशी नहीं जीता।
- अलबत्ता, 1980 और 1984 में दूसरा स्थान जरूर हासिल किया। बाकी चुनावों में मुस्लिम प्रत्याशियों को जमानत बचानी भी मुश्किल रही।
लखनऊ की तर्ज पर चला कैसरगंज
लखनऊ की तरह ही कैसरगंज में भी मुस्लिम आबादी एक चौथाई से ज्यादा है। बावजूद इसके आज तक कोई मुस्लिम प्रत्याशी नहीं जीता।
- 2004 के लोकसभा चुनावों में भाजपा प्रत्याशी के रूप में आरिफ मोहम्मद खान जरूर करीबी मुकाबले तक पहुंचे, लेकिन उन्हें भी सपा प्रत्याशी बेनी प्रसाद वर्मा से करीब 12 हजार वोटों से शिकस्त मिली थी।
लोकसभा क्षेत्र, मुस्लिम आबादी
लखनऊ -- 26.36
मोहनलालगंज -- 21.16
मिश्रिख -- 15.29
रायबरेली -- 12.13
अमेठी -- 19
फैजाबाद -- 16.37
बाराबंकी -- 22.61
अंबेडकरनगर -- 16.75
कैसरगंज -- 25.27
गोंडा -- 19.67
सुल्तानपुर -- 17.14
सीतापुर -- 19.93
बहराइच -- 33.53
बलरामपुर/श्रावस्ती -- 34.83 (आंकड़े 2011 की जनगणना के अनुसार। आबादी प्रतिशत में।)