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UP: चुनाव खर्च सीमा सिरदर्द... लेकिन सही हिसाब भी नहीं देते प्रत्याशी; यूपी में इस तरह बढ़ती गई खर्च सीमा
Fri, 29 Mar 2024 02:12 PM IST
शाहरुख खान
अभिषेक गुप्ता, अमर उजाला, लखनऊ
अभिषेक गुप्ता, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: शाहरुख खान
Updated Fri, 29 Mar 2024 02:12 PM IST
सार
लोकसभा चुनाव में खर्च सीमा सिरदर्द है, लेकिन प्रत्याशी भी सही हिसाब नहीं देते हैं। पहले चरण में बड़े दलों के प्रत्याशियों की जेब से 9 करोड़, तो अंतिम चरण वालों के 20 करोड़ रुपये खर्च हो जाएंगे।
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Lok Sabha Election 2024
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
लोकसभा प्रत्याशियों के लिए चुनाव खर्च सीमा 95 लाख तय है। प्रत्याशियों का कहना है कि यह नाकाफी है, इतने कम में खर्च चलाना मुश्किल है, इसमें बढ़ोतरी की जानी चाहिए। हालांकि, यह भी सही है कि प्रत्याशी चुनावी खर्च का सही हिसाब-किताब देने में कोताही बरतते हैं।
कुछ जानकारों के मुताबिक तो 20 करोड़ तक खर्च होता है लेकिन ब्यौरा देते समय यह तय खर्च सीमा के अंदर ही रहता है। पिछले चुनाव की तुलना में खर्च सीमा 25 लाख रुपये बढ़ाई गई है। पहले यह 70 लाख थी।
एक अनुमान के मुताबिक पहले चरण के मतदान तक बड़े दलों के प्रत्याशियों की जेब से 9 करोड़ तो अंतिम चरण के मतदान तक 20 करोड़ रुपये खर्च हो जाएंगे। चुनाव आयोग ने प्रत्याशियों के खर्चों पर नजर रखने के लिए माइक्रो स्तर पर तैयारी की है।
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वर्ष 2019 के चुनाव में खर्च सीमा 70 लाख रुपये तय थी। इसकी समीक्षा के लिए निर्वाचन आयोग ने वर्ष 2020 में एक कमेटी बनाई थी। कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर चुनावी खर्च की सीमा को बढ़ाकर 95 लाख रुपये किया गया।
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कुछ जानकारों के मुताबिक तो 20 करोड़ तक खर्च होता है लेकिन ब्यौरा देते समय यह तय खर्च सीमा के अंदर ही रहता है। पिछले चुनाव की तुलना में खर्च सीमा 25 लाख रुपये बढ़ाई गई है। पहले यह 70 लाख थी।
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एक अनुमान के मुताबिक पहले चरण के मतदान तक बड़े दलों के प्रत्याशियों की जेब से 9 करोड़ तो अंतिम चरण के मतदान तक 20 करोड़ रुपये खर्च हो जाएंगे। चुनाव आयोग ने प्रत्याशियों के खर्चों पर नजर रखने के लिए माइक्रो स्तर पर तैयारी की है।
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वर्ष 2019 के चुनाव में खर्च सीमा 70 लाख रुपये तय थी। इसकी समीक्षा के लिए निर्वाचन आयोग ने वर्ष 2020 में एक कमेटी बनाई थी। कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर चुनावी खर्च की सीमा को बढ़ाकर 95 लाख रुपये किया गया।
महंगाई दर से तय होती है खर्च की सीमा
चुनाव में कितना खर्च कर सकते हैं, इसे महंगाई दर से तय किया जाता है। इसके लिए मुद्रास्फीति सूचकांक को देखा जाता है। इससे पता किया जाता है कि पिछले पांच वर्ष में सेवा और उत्पादों के दाम कितने बढ़ गए हैं। फिर निर्वाचन आयोग राज्य की जनसंख्या और मतदाताओं की संख्या के आधार पर चुनाव खर्च तय करता है।
चुनाव में कितना खर्च कर सकते हैं, इसे महंगाई दर से तय किया जाता है। इसके लिए मुद्रास्फीति सूचकांक को देखा जाता है। इससे पता किया जाता है कि पिछले पांच वर्ष में सेवा और उत्पादों के दाम कितने बढ़ गए हैं। फिर निर्वाचन आयोग राज्य की जनसंख्या और मतदाताओं की संख्या के आधार पर चुनाव खर्च तय करता है।
खास बात यह है कि हर मद में खर्च की फेहरिस्त आयोग ने बना रखी है। प्रत्याशी मनमाने रेट नहीं लगा सकता। जैसे एक कप चाय आठ रुपये और समोसा 10 रुपये का ही माना जाएगा। चाहे प्रत्याशी ने किसी भी रेट पर ही क्यों न खरीदा हो।
यूपी में इस तरह बढ़ती गई खर्च सीमा
लोस चुनाव खर्च सीमा
1951 25 हजार
1967 25 हजार
1971 35 हजार
1977 35 हजार
2004 25 लाख
2009 25 लाख
2014 70 लाख
2019 70 लाख
2024 95 लाख
लोस चुनाव खर्च सीमा
1951 25 हजार
1967 25 हजार
1971 35 हजार
1977 35 हजार
2004 25 लाख
2009 25 लाख
2014 70 लाख
2019 70 लाख
2024 95 लाख
खर्च करोड़ों में, 90 फीसदी से ज्यादा दिखाते ही नहीं
लोकसभा प्रत्याशी लंबे से मांग कर रहे हैं कि चुनावी खर्च की सीमा को व्यावहारिक किया जाए। करीब 80 दिन तक चलने वाले चुनाव को देखते हुए खर्च की लिमिट बढ़ाई जाए। हालांकि इस बार खर्च सीमा 25 लाख बढ़ाई गई है, फिर भी प्रत्याशियों की नजर में ये ऊंट के मुंह में जीरा भी नहीं है।
लोकसभा प्रत्याशी लंबे से मांग कर रहे हैं कि चुनावी खर्च की सीमा को व्यावहारिक किया जाए। करीब 80 दिन तक चलने वाले चुनाव को देखते हुए खर्च की लिमिट बढ़ाई जाए। हालांकि इस बार खर्च सीमा 25 लाख बढ़ाई गई है, फिर भी प्रत्याशियों की नजर में ये ऊंट के मुंह में जीरा भी नहीं है।
बड़े दलों के कुछ वर्तमान और पूर्व प्रत्याशियों के चार्टर्ड अकाउंटेंट्स व अधिवक्ताओं ने नाम नहीं प्रकाशित करने की शर्त पर चुनावी खर्चों का असली ब्योरा दिया। उनके मुताबिक ये खर्च 16 मार्च को लागू आचार संहिता की तारीख से जोड़ लेंगे तो भी वास्तविकता के करीब पहुंच जाएंगे। 90 प्रतिशत से ज्यादा सही खर्च दिखाते ही नहीं। भीषण गर्मी में कार्यकर्ताओं को मैदान पर दौड़ाने के लिए ‘बहुत कुछ’ करना पड़ता है। पहले चरण वाले प्रमुख प्रत्याशियों को 35 दिन में करीब 9 करोड़ रुपये का खर्च आएगा। वहीं आखिरी चरण वाले प्रत्याशियों में से प्रत्येक की जेब से 20 करोड़ निकल जाएंगे।
रोचक तथ्य यह भी
यूपी की आबादी लगभग 25 करोड़ है। विश्व में केवल तीन देशों- चीन, अमेरिका और इंडोनेशिया की ही जनसंख्या यूपी से ज्यादा है।
यूपी में कुल 403 विधानसभा सीटें हैं। यानी एक लोकसभा सीट के दायरे में औसतन 5 विधानसभा क्षेत्र आते हैं।
यूपी में कुल मतदाताओं की संख्या 15.30 करोड़ है। यानी एक प्रत्याशी को लगभग 19 लाख मतदाताओं से संपर्क करना होगा।
यूपी 2,40,928 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है। यानी एक लोकसभा क्षेत्र का औसत दायरा 3011 वर्ग किलोमीटर है।
यूपी की आबादी लगभग 25 करोड़ है। विश्व में केवल तीन देशों- चीन, अमेरिका और इंडोनेशिया की ही जनसंख्या यूपी से ज्यादा है।
यूपी में कुल 403 विधानसभा सीटें हैं। यानी एक लोकसभा सीट के दायरे में औसतन 5 विधानसभा क्षेत्र आते हैं।
यूपी में कुल मतदाताओं की संख्या 15.30 करोड़ है। यानी एक प्रत्याशी को लगभग 19 लाख मतदाताओं से संपर्क करना होगा।
यूपी 2,40,928 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है। यानी एक लोकसभा क्षेत्र का औसत दायरा 3011 वर्ग किलोमीटर है।
प्रमुख दलों का एक-एक प्रत्याशी इतना तो करता ही है खर्च
खाना-पीना : 1200 लोगों का- 150 रुपये प्रति व्यक्ति और 100 रुपये शराब (नाश्ते से लेकर रात का भोजन तक)
विज्ञापन और प्रचार : 5 करोड़ न्यूनतम
बूथ मैनेजमेंट : 1800 से 2000 बूथ (प्रति बूथ कम से कम 4500 रुपये खर्च। इसमें तंबू, मेज, कुर्सी, पानी, नाश्ता आदि सब शामिल है)
चुनाव कार्यालय : एक केंद्रीय कार्यालय व हर विधानसभा क्षेत्र में एक-एक कार्यालय। इसके अतिरिक्त बड़े वार्ड में मिनी कार्यालय। एक लाख रुपये प्रतिदिन का खर्च
पेट्रोल खर्च चार पहिया वाहन : 15 लीटर न्यूनतम (कम से कम 50 चार पहिया वाहन)
पेट्रोल खर्च दोपहिया वाहन : 2 लीटर रोज ( न्यूनतम 200 से 400 दोपहिया वाहन)
पर्ची बांटने पर खर्च : कम से कम 2000 की ड्यूटी। आठ दिन घर-घर जाकर पर्ची बांटना। ( प्रति व्यक्ति 500 रुपये का खर्च)
बैनर-पोस्टर : 50 लाख रुपये
बैठक व रैली : 5 लाख एक सभा पर औसत खर्च (छोटी बड़ी कम से कम 30)। इसमें स्टार प्रचारकों का खर्च शामिल नहीं है।
अकाउंटेंट सीए व एडवोकेट फर्म : 10 से 20 लाख रुपये तक
खाना-पीना : 1200 लोगों का- 150 रुपये प्रति व्यक्ति और 100 रुपये शराब (नाश्ते से लेकर रात का भोजन तक)
विज्ञापन और प्रचार : 5 करोड़ न्यूनतम
बूथ मैनेजमेंट : 1800 से 2000 बूथ (प्रति बूथ कम से कम 4500 रुपये खर्च। इसमें तंबू, मेज, कुर्सी, पानी, नाश्ता आदि सब शामिल है)
चुनाव कार्यालय : एक केंद्रीय कार्यालय व हर विधानसभा क्षेत्र में एक-एक कार्यालय। इसके अतिरिक्त बड़े वार्ड में मिनी कार्यालय। एक लाख रुपये प्रतिदिन का खर्च
पेट्रोल खर्च चार पहिया वाहन : 15 लीटर न्यूनतम (कम से कम 50 चार पहिया वाहन)
पेट्रोल खर्च दोपहिया वाहन : 2 लीटर रोज ( न्यूनतम 200 से 400 दोपहिया वाहन)
पर्ची बांटने पर खर्च : कम से कम 2000 की ड्यूटी। आठ दिन घर-घर जाकर पर्ची बांटना। ( प्रति व्यक्ति 500 रुपये का खर्च)
बैनर-पोस्टर : 50 लाख रुपये
बैठक व रैली : 5 लाख एक सभा पर औसत खर्च (छोटी बड़ी कम से कम 30)। इसमें स्टार प्रचारकों का खर्च शामिल नहीं है।
अकाउंटेंट सीए व एडवोकेट फर्म : 10 से 20 लाख रुपये तक
कागजों में यूपी के प्रत्याशी खर्च कर रहे केवल 46 लाख रुपये
अजब खेल है। चुनाव आयोग ने चुनावी खर्च की सीमा 95 लाख रुपये तय की है, लेकिन यूपी के प्रत्याशियों ने पिछले दो लोकसभा चुनाव में कागजों में आधे से भी कम खर्च किया। यहां तक कि खर्च के मामले में नाॅर्थ-ईस्ट, उत्तराखंड के राज्य यूपी के नेताओं से आगे हैं।
अजब खेल है। चुनाव आयोग ने चुनावी खर्च की सीमा 95 लाख रुपये तय की है, लेकिन यूपी के प्रत्याशियों ने पिछले दो लोकसभा चुनाव में कागजों में आधे से भी कम खर्च किया। यहां तक कि खर्च के मामले में नाॅर्थ-ईस्ट, उत्तराखंड के राज्य यूपी के नेताओं से आगे हैं।
कब-कितना खर्च दिखाया
2014 का लोकसभा चुनाव
यूपी के प्रत्याशियों ने औसत खर्च दिखाया : 39.76 लाख रुपये
ये चुनावी खर्च सिक्किम (51 लाख), असम (44 लाख), (मेघालय 58 लाख), त्रिपुरा (47 लाख) और उत्तराखंड (46 लाख) से भी कम है।
2019 का लोकसभा चुनाव
यूपी के प्रत्याशियों का औसत चुनावी खर्च : 46.70 लाख रुपये
(ये खर्च त्रिपुरा 65.89 लाख, हिमाचल 61.22 लाख, उत्तराखंड 58.71 लाख, बिहार 55.81 लाख, ओडिशा 54.33 लाख, असम 53.39 लाख से भी कम है)
यूपी के प्रत्याशियों ने औसत खर्च दिखाया : 39.76 लाख रुपये
ये चुनावी खर्च सिक्किम (51 लाख), असम (44 लाख), (मेघालय 58 लाख), त्रिपुरा (47 लाख) और उत्तराखंड (46 लाख) से भी कम है।
2019 का लोकसभा चुनाव
यूपी के प्रत्याशियों का औसत चुनावी खर्च : 46.70 लाख रुपये
(ये खर्च त्रिपुरा 65.89 लाख, हिमाचल 61.22 लाख, उत्तराखंड 58.71 लाख, बिहार 55.81 लाख, ओडिशा 54.33 लाख, असम 53.39 लाख से भी कम है)
प्रत्याशियों का कहां-कितना खर्च
- बिना स्टार प्रचारकों के बैठकों पर : 29.9 फीसदी
- वाहनों पर : 21.5 फीसदी
- स्टार प्रचारकों के साथ बैठक आदि पर : 17.8 फीसदी
- प्रचार सामग्री पर : 10.2 फीसदी
- कार्यकर्ताओं पर : 9.1 फीसदी
- अन्य खर्चे : 6.6 फीसदी
- इलेक्ट्राॅनिक व प्रिंट मीडिया के माध्यम से प्रचार पर : 4.6 फीसदी
- आपराधिक मामलों की फाइलिंग आदि पर : 0.4 फीसदी
खर्च को कोई भी दे सकता है चुनौती
चुनाव परिणाम घोषित होने के 45 दिन के अंदर किसी भी सांसद के खिलाफ चुनाव याचिका दायर की जा सकती है। आमतौर पर सांसद चुनाव परिणाम के 30 दिन के अंदर चुनावी खर्च का विवरण दाखिल करते हैं। यानी सांसदों के विरुद्ध चुनाव याचिका दायर करने के लिए आम नागरिक को केवल 15 दिन का समय मिलता है। इसे और बढ़ाए जाने की जरूरत है।