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आधी आबादी को नहीं मिली पूरी भागीदारी, इन सीटों पर अब तक नहीं चुनी गई कोई महिला सांसद
Fri, 10 May 2019 06:05 PM IST
Amulya Rastogi
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला लखनऊ
Published by: Amulya Rastogi
Updated Fri, 10 May 2019 06:05 PM IST
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- फोटो : PTI
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जिस प्रदेश ने इंदिरागांधी के रूप में देश को अब तक एकमात्र महिला प्रधानमंत्री दिया। जहां सरोजिनी नायडू के रूप में एक महिला पहली राज्यपाल नियुक्त हुईं और जहां से विजय लक्ष्मी पंडित, शिवराजवती नेहरू और सुचेता कृपलानी जैसी महिलाएं सांसद बनीं।
उसी प्रदेश से आजादी के सात दशक बाद भी संसद में आधी आबादी को करीब आधी सीटों से अब तक प्रतिनिधित्व करने का मौका नहीं मिला। प्रदेश में तकरीबन तीन दर्जन संसदीय सीटें हैं जहां से अभी तक महिला सांसद नहीं चुनी गई हैं। नजर सिर्फ आगे के दो चरणों की बची 27 सीटों पर डालें तो इनमें 17 सीटें ऐसी हैं जहां से अभी तक कोई महिला सांसद नहीं चुनी गई हैं।
अगले दो चरणों की जिन 17 सीटों की बात हो रही है उनमें सुल्तानपुर, गोरखपुर, वाराणसी और बलिया की सीट भी शामिल है। कुछ सीटों पर महिलाएं सांसद रह चुकी हैं लेकिन एक या दो बार। सिर्फ प्रतापगढ़, फूलपुर, अंबेडकरनगर व मिर्जापुर ही ऐसी सीटें हैं जहां से अब तक तीन-तीन बार महिलाओं को संसद जाने का मौका मिला।
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उसी प्रदेश से आजादी के सात दशक बाद भी संसद में आधी आबादी को करीब आधी सीटों से अब तक प्रतिनिधित्व करने का मौका नहीं मिला। प्रदेश में तकरीबन तीन दर्जन संसदीय सीटें हैं जहां से अभी तक महिला सांसद नहीं चुनी गई हैं। नजर सिर्फ आगे के दो चरणों की बची 27 सीटों पर डालें तो इनमें 17 सीटें ऐसी हैं जहां से अभी तक कोई महिला सांसद नहीं चुनी गई हैं।
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अगले दो चरणों की जिन 17 सीटों की बात हो रही है उनमें सुल्तानपुर, गोरखपुर, वाराणसी और बलिया की सीट भी शामिल है। कुछ सीटों पर महिलाएं सांसद रह चुकी हैं लेकिन एक या दो बार। सिर्फ प्रतापगढ़, फूलपुर, अंबेडकरनगर व मिर्जापुर ही ऐसी सीटें हैं जहां से अब तक तीन-तीन बार महिलाओं को संसद जाने का मौका मिला।
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इसके अलावा छह सीटों पर अब तक सिर्फ एक-एक बार ही महिलाओं को लोकसभा सदस्य बनने का मौका मिला है। इस स्थिति में किसी बड़े परिवर्तन की उम्मीद भी नहीं है। कारण, अभी जिन 27 सीटों पर चुनाव होने हैं उनमें से सात सीटों पर प्रमुख दलों ने सिर्फ आठ महिलाओं को ही टिकट दिया है।
इनमें लालंगज से भाजपा ने नीलम सोनकर को और बसपा ने संगीता आजाद को प्रत्याशी बनाया है। नीलम मौजूदा सांसद हैं। कांग्रेस ने प्रतापगढ़ से सांसद रह चुकीं रत्ना सिंह को फिर मैदान में उतारा है। इसके अलावा शिवकन्या कुशवाहा को चंदौली, सुप्रिया श्रीनेत को महराजगंज से टिकट दिया है।
सुप्रिया अगर जीतती हैं तो वह महराजगंज से पहली और शिवकन्या जीतती हैं तो चंदौली से दूसरी महिला सांसद होंगी। चंदौली से अब तक कांग्रेेस के वरिष्ठ नेता कमलापति त्रिपाठी की बहू चंदा त्रिपाठी ही एकमात्र महिला सांसद रही हैं।
वहीं, भाजपा की डॉ. रीता बहुगणा जोशी इलाहाबाद से जीतती हैं तो दूसरी और जीतने पर केशरीदेवी पटेल फूलपुर से चौथी महिला सांसद होंगी। मेनका जीतती हैं तो वे सुल्तानपुर की पहली महिला सांसद होंगी।
इनमें लालंगज से भाजपा ने नीलम सोनकर को और बसपा ने संगीता आजाद को प्रत्याशी बनाया है। नीलम मौजूदा सांसद हैं। कांग्रेस ने प्रतापगढ़ से सांसद रह चुकीं रत्ना सिंह को फिर मैदान में उतारा है। इसके अलावा शिवकन्या कुशवाहा को चंदौली, सुप्रिया श्रीनेत को महराजगंज से टिकट दिया है।
सुप्रिया अगर जीतती हैं तो वह महराजगंज से पहली और शिवकन्या जीतती हैं तो चंदौली से दूसरी महिला सांसद होंगी। चंदौली से अब तक कांग्रेेस के वरिष्ठ नेता कमलापति त्रिपाठी की बहू चंदा त्रिपाठी ही एकमात्र महिला सांसद रही हैं।
वहीं, भाजपा की डॉ. रीता बहुगणा जोशी इलाहाबाद से जीतती हैं तो दूसरी और जीतने पर केशरीदेवी पटेल फूलपुर से चौथी महिला सांसद होंगी। मेनका जीतती हैं तो वे सुल्तानपुर की पहली महिला सांसद होंगी।
मोहनलालगंज व रायबरेली से सबसे अधिक महिला सांसद
कई सीटों पर अब तक जहां एक भी महिला सांसद नहीं चुनी गईं, वहीं मोहनलालगंज और रायबरेली दो ऐसी संसदीय सीटें भी हैं जिनसे आठ-आठ बार महिला सांसद चुनी गई हैं। देश में इतने बार महिला सांसदों को चुनने वाली चुनिंदा संसदीय सीटें ही होंगी।
मोहनलालगंज में पहले आम चुनाव से ही लगातार तीन बार गंगादेवी सांसद रहीं। रायबरेली से इंदिरागांधी व शीला कौल सांसद रहीं। अब सोनिया गांधी सांसद हैं। अलीगढ़ से सात बार महिला सांसद चुनी गईं हैं।
मोहनलालगंज में पहले आम चुनाव से ही लगातार तीन बार गंगादेवी सांसद रहीं। रायबरेली से इंदिरागांधी व शीला कौल सांसद रहीं। अब सोनिया गांधी सांसद हैं। अलीगढ़ से सात बार महिला सांसद चुनी गईं हैं।
दावों से दूर हकीकत
महिला आरक्षण के नारे व दावे काफी पुराने हो गए। हालांकि सियासी दल जब-तब 33 फीसदी आरक्षण देने की बात करते हैं। भाजपा ने तो संगठन के संविधान में महिलाओं की 33 प्रतिशत हिस्सेदारी देने की व्यवस्था कर रखी है। पर टिकट देने में सभी दल कंजूसी दिखा गए।
इसकी वजह कोई जिताऊ महिला उम्मीदवार न मिलना बता रहा है तो कोई समीकरणों की दुहाई दे रहे हैं। जो भी हो लेकिन इस बार भी लोकसभा की 80 सीटों में भाजपा ने गठबंधन सहित सिर्फ 11 महिलाओं को टिकट दिया है। पिछली बार गठबंधन सहित 13 महिलाओं को दिया गया था। कांग्रेस ने इस बार 12 और गठबंधन ने 10 महिलाओं को मैदान में उतारा है।
इसकी वजह कोई जिताऊ महिला उम्मीदवार न मिलना बता रहा है तो कोई समीकरणों की दुहाई दे रहे हैं। जो भी हो लेकिन इस बार भी लोकसभा की 80 सीटों में भाजपा ने गठबंधन सहित सिर्फ 11 महिलाओं को टिकट दिया है। पिछली बार गठबंधन सहित 13 महिलाओं को दिया गया था। कांग्रेस ने इस बार 12 और गठबंधन ने 10 महिलाओं को मैदान में उतारा है।
महिलाओं को ही करनी होगी पहल
समाजशास्त्री डॉ. विनोद चंद्रा कहते हैं कि सिर्फ घोषणाओं और कानून बनाने से महिलाओं को पूरा प्रतिनिधित्व नहीं मिल जाएगा। इसके लिए महिलाओं को खुद आगे आना होगा। राजनीतिक दलों को दोष देना ठीक नहीं है। चुनाव संख्या का खेल है।
इसलिए हर राजनीतिक दल जीतने वाले उम्मीदवार पर ही दांव लगाना चाहता है। इसलिए महिलाओं को अपनी नेतृत्व क्षमता विकसित कर यह साबित करना होगा कि लोगों से संपर्क व संवाद में वह किसी से कम नहीं हैं। वे भी चुनाव जीतने की क्षमता रखती हैं।
इसलिए हर राजनीतिक दल जीतने वाले उम्मीदवार पर ही दांव लगाना चाहता है। इसलिए महिलाओं को अपनी नेतृत्व क्षमता विकसित कर यह साबित करना होगा कि लोगों से संपर्क व संवाद में वह किसी से कम नहीं हैं। वे भी चुनाव जीतने की क्षमता रखती हैं।
यह भी एक पहलू
डॉ. चंद्रा कहते हैं कि सोचने की बात यह भी है कि जिस प्रदेश में एक समय इंदिरा गांधी, सुचेता कृपलानी, मोहसिना किदवई, शीला कौल, स्वरूप कुमारी बख्शी, सरस्वती अम्माल जैसी महिला नेत्री थीं और उनका अपना-अपना प्रभाव था।
उसी प्रदेश में आज महिला नेतृत्व के नाम पर सिर्फ मायावती नजर आती हैं। पर उनकी पार्टी में भी दूसरी किसी महिला का चेहरा नेतृत्व का संदेश देता नहीं दिखता। कांग्रेस से सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी का नाम लिया जा सकता है, लेकिन इनकी सक्रियता भी अब तक यूपी में सीमित ही रही है।
पा में भी महिला नेतृत्व पर नजर डालें तो घूम-फिरकर डिंपल यादव पर निगाह टिकती है। कमोबेश यही हाल सभी दलों का है।
उसी प्रदेश में आज महिला नेतृत्व के नाम पर सिर्फ मायावती नजर आती हैं। पर उनकी पार्टी में भी दूसरी किसी महिला का चेहरा नेतृत्व का संदेश देता नहीं दिखता। कांग्रेस से सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी का नाम लिया जा सकता है, लेकिन इनकी सक्रियता भी अब तक यूपी में सीमित ही रही है।
पा में भी महिला नेतृत्व पर नजर डालें तो घूम-फिरकर डिंपल यादव पर निगाह टिकती है। कमोबेश यही हाल सभी दलों का है।
इन सीटों पर अब भी उम्मीद नहीं
डुमरियागंज, बस्ती, संतकबीरनगर, गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, घोसी, सलेमपुर, बलिया, जौनपुर, मछलीशहर, गाजीपुर, भदोही और सैदपुर।
प्रमुख पार्टियों ने 80 सीटों में दिए सिर्फ 32 महिलाओं को दिया टिकट
प्रमुख पार्टियों ने 80 सीटों में दिए सिर्फ 32 महिलाओं को दिया टिकट
- कांग्रेस 12
- भाजपा 10 +1 (अपना दल सहित)
- सपा 6
- बसपा 4
बचे दो चरणों में महिला उम्मीदवार
- लालगंज (सु.) : नीलम सोनकर (भाजपा) और संगीता आजाद (गठबंधन)
- सुल्तानपुर : मेनका गांधी (भाजपा)
- इलाहाबाद : डॉ. रीता बहुगुणा जोशी (भाजपा)
- फूलपुर : केशरी देवी पटेल (भाजपा)
- महराजगंज : सुप्रिया श्रीनेत (कांग्रेस)
- चंदौली : शिवकन्या कुशवाहा (कांग्रेस)
- वाराणसी : शालिनी यादव (गठबंधन)
- मिर्जापुर : अनुप्रिया पटेल (अपना दल)
यूपी से महिला सांसद
इस समय : 13 महिला सांसद