ग्राउंड रिपोर्ट: लॉकडाउन ने सब्जी उत्पादक किसानों की तोड़ी कमर, खेतों में सड़ गया मेहनत का फल
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लंबे लॉकडाउन ने सब्जी उत्पादक किसानों की कमर तोड़ दी है। किसी के खेत में टमाटर और बैंगन सड़ रहे हैं तो किसी ने दो लाख रुपये की लागत से तैयार चुकंदर की फसल खेत में ही जुतवा दी। टिंडे-परवल जैसे उत्पाद भी किसान सस्ते में बेचने को मजबूर हैं।
तंबाकू की फसल भी घर में डंप पड़ी है। स्थानीय स्तर पर खपत न होने और सामान्य दिनों की तरह बाहर माल न जाने से बड़ा संकट पैदा हो गया है। मांग और आपूर्ति के प्रबंधन व संतुलन में अफसर फेल दिख रहे हैं, तो किसान को भी कोई राह नहीं दिख रही है।
हाईवे के किनारे के खेत हों या फिर संपर्क मार्ग पर स्थित गांव, सभी जगह एक जैसे हालात हैं। किसानों का यही कहना है कि पहले की तरह शहरों के लिए बड़े पैमाने पर माल भेजने की व्यवस्था जब तक शुरू नहीं होती, हालात ऐसे ही रहेंगे।
'अमर उजाला’ के संवाददाता ने विभिन्न जिलों में किसानों के बीच जाकर जमीनी हकीकत को समझा। किसानों ने न केवल अपनी पीड़ा साझा की, बल्कि उच्चस्तर तक अपने इस दर्द को पहुंचाने की अपेक्षा भी की।
मिट्टी के भाव भी कोई नहीं पूछ रहा
रायबरेली की तहसील लालगंज के गांव तौधकपुर में सब्जी की खेती करने वाले किसान आशा शंकर मिले। नाराजगी भरे लहजे में कहते हैं, करेला, लौकी और तोरई को तो कोई पूछ ही नहीं रहा है। लौकी के तो हमें प्रति किलो पांच रुपये भी नहीं मिल रहे।
खेत में ही सड़ गया 30-35 क्विंटल टमाटर
बाराबंकी के गांव मालिनपुर के किसान प्रदीप कुमार यादव चिंतित नजर आते हैं। वह बताते हैं कि 30-35 क्विंटल टमाटर खेत में ही सड़ गया। करते भी क्या, स्थानीय हाट-बाजार बंद हैं और मंडी में भी माल बिक नहीं रहा। पांच रुपये किलो के हिसाब से टमाटर बेचना तो घाटे का ही सौदा था।
लॉकडाउन से पहले खराब से खराब स्थिति में भी मंडी में टमाटर 16-18 रुपये प्रति किलो बिक जाया करता था। अख्तियारपुर (फैजाबाद) के किसान राम उजागिर वर्मा बताते हैं कि टमाटर की 25 किलो की कैरेट बमुश्किल 100-150 रुपये में बिक रही है, जबकि पिछले साल इन दिनों में एक कैरेट 800-1100 रुपये में बिकी थी।
जानवरों को न खिलाएं तो क्या करें?
कहती हैं कि भिंडी एक रुपये प्रति किग्रा बेचने की नौबत आ गई तो खेत ही जुतवा डाला। कहती हैं कि भिंडी की एक घंटे की तोड़ाई में ही 25-30 रुपये मजदूरी देनी होती है। ऐसे में खड़ी फसल को जुतवाने के अलावा चारा क्या था?
तीन बीघा चुकंदर खेत में जुतवाया, फूल की खेती भी बर्बाद
बाहर माल जा नहीं रहा और स्थानीय स्तर पर खपत है नहीं। तीन बीघा चुकंदर खेत में ही जुतवा चुके हैं। यह हाल तब है जब उनके खेत से मात्र 12 किमी. की दूरी पर नवाबगंज में मंडी है। वह दुखी होकर बताते हैं कि बेटी को बीएससी नर्सिंग करा रहे हैं। चिंता यह है कि उसकी फीस कैसे जाएगी? वे इस बार भिंडी, बैंगन और धनिया की फसल भी जुतवा चुके हैं।
कहते हैं कि चीनी मिल समय से पेमेंट नहीं देती थी। इसलिए सब्जी और फूलों की खेती शुरू की थी। अभी उनके खेत में 4 बीघा गेंदा के फूल भी खड़े हैं, जिन्हें जुतवाने की नौबत आ चुकी है।
स्थानीय स्तर पर लोग खरीद नहीं रहे
गोंडा के ही गांव गेडसर के किसान मंशाराम, राम जियावन जोत, रघुवीर, दुखकरन बताते हैं कि सब्जी की फसल बंपर हुई है। लेकिन, भाव न मिलने से वे खेत में खड़ी फसल जुतवाने की सोच रहे हैं। दुल्लापुर के किसान श्रीपाल बताते हैं कि खरबूज का रेट पांच रुपये किलो भी नहीं मिल रहा है। वहीं रंजीत निषाद बताते हैं कि तंबाकू तैयार है, लेकिन गोरखपुर के व्यापारी माल लेने नहीं आए। इसलिए घर पर ही पड़ी है। इस बार अच्छा दाम मिलने की उम्मीद ही नहीं है। अकबरपुर के गांव गौरा बसंतपुर के किसान भोला प्रसाद मौर्य कहते हैं कि पैसे के अभाव में स्थानीय स्तर पर लोग पहले की तरह सब्जियां नहीं खरीद रहे हैं। लोबिया खेत में ही जुतवाना पड़ रहा है।
उन्नाव के ब्लॉक सुमरेपुर के ऊंचगांव के किसान रामसजीवन पासवान के पास पौन एकड़ जमीन है। वह बताते हैं, हम हर साल सब्जी उगाते हैं। गांव के आसपास ही फेरी लगाकर लौकी-तोरई 30-35 रुपये प्रति किलो बेच लेते थे, लेकिन इस बार 5-10 रुपये किलो भी नहीं मिल रहे हैं। इसी जिले की ग्राम पंचायत बक्सर के किसान राकेश कुशवाहा बताते हैं कि किसान की लौकी, कद्दू, भिंडी, टमाटर और बैंगन मिट्टी के भाव जा रही है। आसपास के गांवों में भी उन्होंने फेरी लगाई, पर कोई फायदा नहीं हुआ।
सब्जियां बाहर भिजवाने की व्यवस्था करवा दे सरकार
सीतापुर की ग्राम पंचायत गंधौली और उसके आसपास का इलाका दूर-दूर तक सब्जी उत्पादन के लिए पहचाना जाता है। एक ही खेत में कई सब्जियां देखने को मिल जाएंगी। यहां के किसानों को पता लगा कि गांव में ‘अमर उजाला’ के संवाददाता आए हैं तो अपनी पीड़ा बताने आ गए। रामकुमार ने बताया कि लोग एक रुपये में भी एक लौकी लेने को तैयार नहीं हो रहे। वहीं राजवीर ने बताया कि दो बीघा में खीरा लगाया था। 20 हजार रुपये की लागत लगाई। दाम नहीं मिला तो पूरा खेत जुतवा दिया। गांव-गांव घूमे 2-3 रुपये प्रति किलो भी भिंडी नहीं बिकी तो घर लौटकर उसे जानवरों को खिला दिया।
राहुल बताते हैं कि सिंचाई का खर्च भी नहीं निकल रहा है। हाईवे के नजदीक होने के कारण पहले यहां से माल दिल्ली, गोरखपुर, सीतापुर और लखनऊ समेत तमाम जगहों पर जाता था। अब तो 25 किलोमीटर दूर मानपुर इंटाजौ मंडी तक में माल नहीं बिक रहा है। कमलेंद्र शुक्ला ने 100 बीघा जमीन में बैंगन, भिंडी और लौकी लगाई है। अभी फूल निकल रहे हैं। अब तो हम यही प्रार्थना कर रहे हैं कि बारिश हो जाए। सब्जी उत्पादन गिर जाएगा तो सही दाम मिल जाएगा। इस समय तो सब्जी की बड़ी ही बर्बादी हो रही है। सरकार सिर्फ सब्जियों को बाहर भिजवाने की व्यवस्था शुरू करवा दे, दाम खुद ब खुद मिलने लगेंगे।
कटरी के टिंडा-परवल उत्पादक किसानों को भारी घाटा
फतेहपुर में गंगा किनारे का गांव गुनीर टिंडा और परवल की खेती के लिए जाना जाता है। यहां से दिल्ली तक ये सब्जियां जाती हैं। फिलहाल पहले की तरह माल बाहर नहीं जा पा रहा है। यहां के किसान ओमप्रकाश बताते हैं कि मंडी में टिंडा 10 रुपये प्रति किलो और परवल 12 रुपये प्रति किलो बिक रहा है। जबकि, सामान्य दिनों में इसके रेट कहीं ज्यादा मिलते थे। वह कहते हैं, हमने ही शहर में परवल 40-45 रुपये और टिंडा 70 रुपये प्रति किलोग्राम तक बेचा है।
किसी भाव खरीदने को तैयार नहीं लोग
पुवायां (शाहजहांपुर) के गांव हरदुआ के किसान विश्वमोहन मिश्रा ने करीब साढ़े तीन बीघा खेत में तोरई, मिर्च, लौकी लगाई है। बताते हैं कि तोरई और मिर्च के 4-5 रुपये प्रति किलो ही दाम मिल पा रहे हैं। लौकी तो डेढ़ रुपये प्रति पीस ही बड़ी मुश्किल से बिक पा रही है। यहीं के किसान पंकज मिश्रा अपने खेत में बोरी में रखी 20 किलोग्राम भिंडी दिखाते हुए कहते हैं कि इसे किसी भाव खरीदने वाले लोग नहीं हैं। मोहम्मदी (लखीमपुर खीरी) के किसान अतुल भी इसी तरह के हालात बयां करते हैं।
किसान खुद संगठन बनाकर बचें, यही इस समस्या का निदान
कृषि एवं कृषि विपणन के प्रमुख सचिव डॉ. देवेश चतुर्वेदी कहते हैं कि शादी-ब्याह नहीं हो रहे हैं। सब्जियों की मांग कम है। आलू का ज्यादा उपयोग हो रहा है, इसलिए आलू के रेट अच्छे मिल रहे हैं। जैसे-जैसे रेस्टोरेंट खुलेंगे, वैसे-वैसे डिमांड बढ़ेगी। कहीं-कहीं सब्जियां न बिकने या कम दाम में बिकने की स्थितियां आई हैं। मंडियों से व्यापारी तभी माल ले जाएगा, जब डिमांड होगी। फलों व सब्जियों की बिक्री व रेट पूरी तरह से मांग आधारित हो गई है। किसानों को अपने उत्पादों का तभी वाजिब दाम मिलेगा, जब वे सीधे ग्राहकों को माल बेचेंगे। कृषक उत्पादक संगठन (एफपीओ) बनाकर यह काम हो सकता है। इसमें व्यापारी और बिचौलिए बीच में नहीं आते हैं। वहीं, 46 तरह की फलों व सब्जियों को मंडी शुल्क से मुक्त कर दिया गया है। सहारनपुर, बाराबंकी और लखनऊ में एफपीओ अच्छा कार्य कर रहे हैं। हमें ज्यादा से ज्यादा इस दिशा में कार्य करना है।