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एलडीए बाबुओं के कारनामें: नौकरी तो पार्ट टाइम है, बिजनेस फुलटाइम
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Fri, 10 Nov 2017 03:42 PM IST
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एलडीए में भूखंडों के फ्रॉड करके बाबुओं और दूसरे स्टाफ ने खूब मलाई काटी है। इसमें सुपरवाइजर से लेकर बाबू तक शामिल हैं। भ्रष्टाचार की कमाई का पैसा हाथ आया तो कोई साहूकार बन गया तो कोई बिल्डर व जमीनों की खरीद-फरोख्त का ब्रोकर बन गया। विकास प्राधिकरण में इनकी पहचान इनके काम से ही बन गई है।
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अगर कोई इनका काम ही बता दे तो लोग नाम खुद ही जान जाते हैं। सबसे दिलचस्प यह रहा कि अब तक रहे अधिकारियों को भी इनकी जानकारी रही। इसके बाद भी कार्रवाई नहीं हुई।
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अब कुछ बाबुओं और दूसरे स्टाफ पर अनिवार्य सेवानिवृत्ति और बर्खास्तगी की तलवार लटकी है। लेकिन, अब भी इनके हौसले बुलंद हैं। वजह, एलडीए की नौकरी तो पार्टटाइम है। अब तो असली काम दूसरे ही हैं।
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ठेकेदार भी इनसे मांगते उधारी
एलडीए के लालबाग कार्यालय में एक सुपरवाइजर है। इसका असली काम तो बंद हो चुका है। अब यह फील्ड में जाने की जगह दफ्तर में एलडीए से कम अपनी व्यक्तिगत फाइलों का हिसाब-किताब देखता है। ये फाइलें भी एलडीए से जुड़ी ही होती हैं। बस इनमें वे सूचनाएं होती हैं जिनमें उसने किस-किस को उधार बांटा हुआ है। करोड़ों रुपये इसकी उधारी एलडीए के स्टाफ से लेकर प्राधिकरण के लिए काम करने वाले ठेकेदारों के ऊपर तक है। कई बड़े ठेकेदार तक उससे पैसा उधार लेकर काम करते हैं। भुगतान होने पर ब्याज सहित उसका पैसा लौटाना होता है।
एलडीए में बाबू और साथ में बिल्डर भी
एलडीए में इस बाबू के पास एक करोड़ रुपये की गाड़ी होने की भी खूब चर्चा हुई। उसके शौक भी बड़े-बड़े हैं। उसकी अपनी खुद की एक बिल्डर कंपनी भी लखनऊ में चलती है। इस पर कई बार ठगी करने के आरोप भी लग चुके हैं। इसके बाद भी बाबू पर आरोप साबित नहीं हो पाए तो क्लीन चिट मिल गई। केवल जरूरी काम होने पर ही यह महाशय एलडीए आते हैं। काम खत्म होने के बाद उनके कार्यालय का समय भी खत्म हो जाता है। अधिकारियों को भी इन्हें काम जरूरी होने पर बुलाना होता है।
नौकरी गई तो क्या, माल बहुत कमाया
एलडीए वीसी प्रभु एन सिंह ने हाल ही में अपने शातिराना अंदाज की वजह से चर्चित बाबू को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी। बाबू ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति से पहले एलडीए के भूखंडों को रीसेल में खरीद दिखाकर खूब माल कमाया। इसके लिए विवादित भूखंडों को पहले समायोजन किया जाता। इसके बाद अपने या परिजनों के नाम रजिस्ट्री करा ली जाती। ऐसे में तकनीकी रूप से एलडीए से भूखंड आवंटित करने के आरोप भी साबित नहीं हो पाए। अब यह बाबू कहते हुए सुना जाता है कि नौकरी का क्या है? खूब माल कमाया। अब कुछ दिन रिटायरमेंट के भी फायदे लिए जाएं।