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लखीमपुर हिंसा : हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी, अजय मिश्र धमकी नहीं देते तो शायद लखीमपुर हिंसा नहीं होती
Tue, 10 May 2022 12:06 PM IST
पंकज श्रीवास्तव
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: पंकज श्रीवास्तव
Updated Tue, 10 May 2022 12:06 PM IST
सार
न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह ने अपने आदेश में कहा, जैसा कि प्रस्तुत किया गया है, यह घटना नहीं होती अगर केंद्रीय गृह राज्य मंत्री ने कथित धमकी भरा बयान नहीं दिया होता। जैसा कि जांच एजेंसी की ओर से दायर जवाबी हलफनामे में बताया गया है और चार्जशीट में भी उल्लेख किया गया है।
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सांकेतिक तस्वीर।
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने लखीमपुर हिंसा मामले में अंकित दास, लवकुश, सुमित जायसवाल व शिशुपाल की जमानत अर्जी खारिज करते हुए सोमवार को अहम टिप्पणी की। न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह ने अपने आदेश में कहा, जैसा कि प्रस्तुत किया गया है, यह घटना नहीं होती अगर केंद्रीय गृह राज्य मंत्री ने कथित धमकी भरा बयान नहीं दिया होता। जैसा कि जांच एजेंसी की ओर से दायर जवाबी हलफनामे में बताया गया है और चार्जशीट में भी उल्लेख किया गया है।
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न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह ने कहा कि आरोप पत्र में केंद्रीय मंत्री के बेटे और अन्य आरोपियों के खिलाफ भारी सुबूतों का खुलासा होगा जिसे क्रूर, शैतानी, बर्बर, वीभत्स और अमानवीय करार दिया गया है। इनकी कथित कायरतापूर्ण हरकत से पांच लोगों की जान चली गई। आरोप पत्र में कहा गया है कि किसान आंदोलन कर रहे थे और वे केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के उस बयान के खिलाफ शांतिपूर्वक विरोध कर रहे थे, जिसमें कथित तौर पर कहा गया था कि किसानों को खीरी जिले से खदेड़ दिया जाएगा। राज्य सरकार की तरफ से अपर महाधिवक्ता विनोद कुमार शाही ने भी इन सभी की जमानत का विरोध किया।
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कानून निर्माताओं गैर-जिम्मेदाराना बयान नहीं देना चाहिए
‘कानून निर्माताओं को कानून का उल्लंघन करने वाले के रूप में नहीं देखा जा सकता। उच्च पदों पर आसीन राजनीतिक व्यक्तियों को समाज में इसके प्रभावों को देखते हुए सभ्य भाषा में सार्वजनिक भाषण देना चाहिए। उन्हें गैर-जिम्मेदाराना बयान नहीं देना चाहिए, क्योंकि उन्हें अपनी स्थिति और उच्च पद की गरिमा के अनुरूप आचरण करना होता है।’
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- हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ
मुख्य आरोपी आशीष की जमानत पर सुनवाई 25 को
सुप्रीम कोर्ट से जमानत रद्द होने के बाद केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी के बेटे और मुख्य आशीष मिश्र उर्फ मोनू की तरफ से हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में दोबारा दायर जमानत अर्जी पर न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने अगली सुनवाई 25 मई को नियत की है।
हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उठाए सवाल, धारा 144 लागू थी तो कुश्ती प्रतियोगिता रद्द क्यों नहीं की गई
लखीमपुर हिंसा के चार आरोपियों की जमानत याचिका खारिज करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह ने कहा कि यह भी काफी दिलचस्प है कि जब इलाके में धारा 144 लागू कर दी गई तो कुश्ती प्रतियोगिता को रद्द क्यों नहीं किया गया। कानून निर्माताओं को कानून का उल्लंघन करने वाले के रूप में नहीं देखा जा सकता है।
न्यायालय यह विश्वास नहीं कर सकता है कि यह राज्य के उपमुख्यमंत्री की जानकारी में नहीं रहा होगा कि क्षेत्र में धारा 144 सीआरपीसी के प्रावधानों को लागू किया गया था और किसी भी सभा को प्रतिबंधित किया गया था। इसके बावजूद कुश्ती प्रतियोगिता का आयोजन किया गया और केंद्रीय गृह राज्य मंत्री एवं उपमुख्यमंत्री ने कार्यक्रम में मुख्य अतिथि आदि के रूप में उपस्थित रहने का निर्णय लिया।
कोर्ट ने कहा कि मैंने विशेष जांच दल द्वारा एकत्र किए गए आरोप-पत्र और साक्ष्य का अवलोकन किया है। विशेष जांच दल अपराध की स्वतंत्र, निष्पक्ष, निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच करने के लिए पूर्ण श्रेय का पात्र है। आरोप पत्र में आरोपी-आवेदक और अपराध के अन्य सह-अभियुक्तों के खिलाफ भारी सुबूतों का खुलासा होगा, जिसे क्रूर, शैतानी, बर्बर, भ्रष्ट, भीषण और अमानवीय करार दिया गया है।
आरोपी-आवेदक और मुख्य आरोपी आशीष मिश्रा उर्फ मोनू बहुत प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों से ताल्लुक रखते हैं और अभियोजन पक्ष द्वारा न्याय की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने, सुबूतों से छेड़छाड़ करने और गवाहों को प्रभावित करने की आशंका से इस स्तर पर इंकार नहीं किया जा सकता है। इसके मद्देनजर, मुझे यह एक उपयुक्त मामला नहीं लगता है, जहां आरोपी-आवेदक को जमानत पर रिहा किया जा सकता है। तद्नुसार, आरोपी अंकित दास की जमानत अर्जी खारिज की जाती है।
धारा 144 लागू थी तो कुश्ती प्रतियोगिता रद्द क्यों नहीं की गई
लखीमपुर हिंसा के चार आरोपियों की जमानत याचिका खारिज करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह ने कहा कि यह भी काफी दिलचस्प है कि जब इलाके में धारा 144 लागू कर दी गई तो कुश्ती प्रतियोगिता को रद्द क्यों नहीं किया गया। कानून निर्माताओं को कानून का उल्लंघन करने वाले के रूप में नहीं देखा जा सकता है।
न्यायमूर्ति ने कहा कि न्यायालय यह विश्वास नहीं कर सकता है कि यह राज्य के उपमुख्यमंत्री की जानकारी में नहीं रहा होगा कि क्षेत्र में धारा 144 लागू था और किसी भी सभा को प्रतिबंधित किया गया था। इसके बावजूद कुश्ती प्रतियोगिता का आयोजन किया गया और केंद्रीय गृह राज्य मंत्री व उपमुख्यमंत्री ने कार्यक्रम में मुख्य अतिथि आदि के रूप में उपस्थित रहने का निर्णय लिया। कोर्ट ने कहा कि मैंने विशेष जांच दल के आरोपपत्र व साक्ष्य का अवलोकन किया है।
जांच दल अपराध की स्वतंत्र, निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच के लिए पूर्ण श्रेय का पात्र है। आरोप पत्र में आरोपी-आवेदक और अपराध के अन्य सह-अभियुक्तों के खिलाफ भारी सुबूतों का खुलासा होगा, जिसे क्रूर, शैतानी, बर्बर, भ्रष्ट, भीषण और अमानवीय करार दिया गया है।
सुबूतों से छेड़छाड़ की आशंका से इनकार नहीं
अदालत ने कहा कि आरोपी-आवेदक और मुख्य आरोपी आशीष मिश्रा उर्फ मोनू बहुत प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों से ताल्लुक रखते हैं और अभियोजन पक्ष द्वारा न्याय की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने, सुबूतों से छेड़छाड़ करने व गवाहों को प्रभावित करने की आशंका से इस स्तर पर इनकार नहीं किया जा सकता है। इसके मद्देनजर, मुझे यह एक उपयुक्त मामला नहीं लगता है, जहां आरोपी-आवेदक को जमानत पर रिहा किया जा सकता है। तद्नुसार, आरोपी अंकित दास की जमानत अर्जी खारिज की जाती है।