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आंखें देखती रहेंगी दुनिया, पर दिल को नहीं मिला धड़कने का मौका
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लखनऊ। शाहजहांपुर निवासी रंजीत सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी आंखें किसी की दुनिया में छाए अंधेरे दूर कर सकेंगी। उनका दिल भी किसी के सीने में धड़क सकता था, पर तय समय में अंगदान लेने वाला कोई नहीं मिला। किडनी के लिए ऑपरेशन थियेटर में शव ले जाने पर पता चला कि वह दान के लायक ही नहीं है। ऐसे में सिर्फ कॉर्निया ही प्राप्त हो सकी। इसे केजीएमयू की आई बैंक में जमा करा दिया गया है।
संस्थान में करीब दो साल बाद ब्रेन डेड मरीज का शरीर परिवार वालों ने दान किया, ताकि किसी जरूरतमंद को अंगदान किया जा सके। कुलपति ले. जनरल डॉ. बिपिन पुरी की पहल के बाद मरीज के परिवार वाले दान के लिए आगे आए। शाहजहांपुर निवासी रंजीत सिंह (50) को 17 सितंबर को हुए सड़क हादसे में सिर में गंभीर चोट लगी थी। उन्हें 18 सितंबर को केजीएमयू में भर्ती किया गया था। इलाज के दौरान उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया। डॉक्टरों के अनुसार, मरीज की कभी भी मौत हो सकती थी। दो राउंड की काउंसिलिंग के बाद घरवाले शरीर दान के लिए मान गए। इसके बाद राज्य, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण संस्थान को सूचना दी गई। पर दिल, फेफड़ा और आंत के दान के लिए कोई जरूरतमंद मरीज नहीं मिला। ऑपरेशन थियेटर में शव ले जाने पर पता चला कि दान के लायक नहीं है। ऐसे में किडनी भी नहीं मिल सकी। सिर्फ कॉर्निया ही प्राप्त हो सकी।
चार घंटे में प्रत्यारोपित हो जाना चाहिए दिल
केजीएमयू के पीयूष श्रीवास्तव ने बताया कि सभी संस्थानों को सूचना देने के बाद इंतजार किया गया। मरीज की हालत खराब हो रही थी। इसलिए उसे ऑपरेशन थियेटर ले जाना पड़ा। शरीर से दिल निकालने के बाद अधिकतम चार घंटे में इसका प्रत्यारोपण हो जाना चाहिए। इसके अलावा लिवर प्रत्यारोपण आठ से 12 घंटे, आंतों का प्रत्यारोपण 12 घंटे, किडनी का प्रत्यारोपण 24 घंटे में हो जाना चाहिए। वहीं, कॉर्निया का प्रत्यारोपण छह दिन बाद तक किया जा सकता है।
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संस्थान में करीब दो साल बाद ब्रेन डेड मरीज का शरीर परिवार वालों ने दान किया, ताकि किसी जरूरतमंद को अंगदान किया जा सके। कुलपति ले. जनरल डॉ. बिपिन पुरी की पहल के बाद मरीज के परिवार वाले दान के लिए आगे आए। शाहजहांपुर निवासी रंजीत सिंह (50) को 17 सितंबर को हुए सड़क हादसे में सिर में गंभीर चोट लगी थी। उन्हें 18 सितंबर को केजीएमयू में भर्ती किया गया था। इलाज के दौरान उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया। डॉक्टरों के अनुसार, मरीज की कभी भी मौत हो सकती थी। दो राउंड की काउंसिलिंग के बाद घरवाले शरीर दान के लिए मान गए। इसके बाद राज्य, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण संस्थान को सूचना दी गई। पर दिल, फेफड़ा और आंत के दान के लिए कोई जरूरतमंद मरीज नहीं मिला। ऑपरेशन थियेटर में शव ले जाने पर पता चला कि दान के लायक नहीं है। ऐसे में किडनी भी नहीं मिल सकी। सिर्फ कॉर्निया ही प्राप्त हो सकी।
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चार घंटे में प्रत्यारोपित हो जाना चाहिए दिल
केजीएमयू के पीयूष श्रीवास्तव ने बताया कि सभी संस्थानों को सूचना देने के बाद इंतजार किया गया। मरीज की हालत खराब हो रही थी। इसलिए उसे ऑपरेशन थियेटर ले जाना पड़ा। शरीर से दिल निकालने के बाद अधिकतम चार घंटे में इसका प्रत्यारोपण हो जाना चाहिए। इसके अलावा लिवर प्रत्यारोपण आठ से 12 घंटे, आंतों का प्रत्यारोपण 12 घंटे, किडनी का प्रत्यारोपण 24 घंटे में हो जाना चाहिए। वहीं, कॉर्निया का प्रत्यारोपण छह दिन बाद तक किया जा सकता है।
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