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जबड़े के हिस्से में थोड़ा सा बदलाव कर हो जाएगा खर्राटे की समस्या का इलाज
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लखनऊ। यदि किसी को खर्राटे की समस्या है तो जबड़े के निचले में हिस्से में थोड़ा बदलाव कर समस्या को काफी हद तक दूर किया जा सकता है। यह तकनीक अन्य के मुकाबले काफी सस्ती व सुविधाजनक है। केजीएमयू के प्रोस्थोडेंटिक्स विभाग शोध में यह बात सामने आई है। इसके साथ ही एक अन्य रिसर्च के लिए एक-एक हजार अमेरिकी डॉलर का पुरस्कार मिला है। इंटरनेशनल कॉलेज ऑफ प्रोस्थोडोंटिस्ट्स, यूएसए ने हाल ही में वर्चुअल कॉन्फ्रेंस में दुनिया के 53 शोध को पुरस्कृत किया है।
विभागाध्यक्ष प्रो. पूरन चंद ने बताया कि विभाग की एमडी स्टूडेंट डॉ. ज्योत्सना विमल के साथ ही डॉ. बालेन्द्र प्रताप सिंह, डॉ. पूरन चंद, डॉ. रघुवर दयाल सिंह और डॉ. सुनीत कुमार जुरेल ने अपने अध्ययन में पता लगाया कि जिन लोगों को खर्राटे की समस्या है उनके जबड़े को थोड़ा सा आगे कर खर्राटे की समस्या दूर की जा सकती है। असल में नाक और गले के बीच समस्या होने से सांस में लेने में कुछ तकलीफ होती है। इसकी वजह से खर्राटे आने लगते हैं। जबड़े को थोड़ा एडजस्ट करने पर ऑक्सीजन पर्याप्त मात्रा में पहुंचने लगती हे। इससे खर्राटे आने बंद हो जाते हैं। इसके अलावा अन्य तकनीक सी-पैप है, लेकिन यह काफी खर्चीली प्रणाली है। इसका खर्च 20 हजार से एक लाख रुपये तक आता है। जबकि इस नई तकनीक में महज एक हजार रुपये में ही यह समस्या दूर हो सकती है। इसी तरह प्रो. बालेंद्र प्रताप सिंह ने अपने शोध में पता लगाया कि जिन लोगों को कृत्रिम दांत लगाए गए हैं तथा अपनी मर्जी से सामान्य भोजन कर रहे हैं, उन्हें अलग से पोषण देने की जरूरत नहीं पड़ती है। जबकि दांत का ढांचा सही न बनने पर मरीज को अलग से पोषण तत्व देने पड़ सकते हैं।
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विभागाध्यक्ष प्रो. पूरन चंद ने बताया कि विभाग की एमडी स्टूडेंट डॉ. ज्योत्सना विमल के साथ ही डॉ. बालेन्द्र प्रताप सिंह, डॉ. पूरन चंद, डॉ. रघुवर दयाल सिंह और डॉ. सुनीत कुमार जुरेल ने अपने अध्ययन में पता लगाया कि जिन लोगों को खर्राटे की समस्या है उनके जबड़े को थोड़ा सा आगे कर खर्राटे की समस्या दूर की जा सकती है। असल में नाक और गले के बीच समस्या होने से सांस में लेने में कुछ तकलीफ होती है। इसकी वजह से खर्राटे आने लगते हैं। जबड़े को थोड़ा एडजस्ट करने पर ऑक्सीजन पर्याप्त मात्रा में पहुंचने लगती हे। इससे खर्राटे आने बंद हो जाते हैं। इसके अलावा अन्य तकनीक सी-पैप है, लेकिन यह काफी खर्चीली प्रणाली है। इसका खर्च 20 हजार से एक लाख रुपये तक आता है। जबकि इस नई तकनीक में महज एक हजार रुपये में ही यह समस्या दूर हो सकती है। इसी तरह प्रो. बालेंद्र प्रताप सिंह ने अपने शोध में पता लगाया कि जिन लोगों को कृत्रिम दांत लगाए गए हैं तथा अपनी मर्जी से सामान्य भोजन कर रहे हैं, उन्हें अलग से पोषण देने की जरूरत नहीं पड़ती है। जबकि दांत का ढांचा सही न बनने पर मरीज को अलग से पोषण तत्व देने पड़ सकते हैं।
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