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लखनऊ की फिजा में घुली है कश्मीरियत की खुशबू, घाटी से यहां आए और यहीं के होकर रह गए
Tue, 06 Aug 2019 05:26 PM IST
Amulya Rastogi
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: Amulya Rastogi
Updated Tue, 06 Aug 2019 05:26 PM IST
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लखनऊ में खुुशी मनाते कश्मीरी
- फोटो : amar ujala
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पं. बृजनारायण चकबस्त, पं. आनंद नारायण मुल्ला, पंडित रतननाथ सरसार, पंडित दयाशंकर नसीम, स्वरूप कुमारी बख्शी... ये वे नाम हैं, जिन पर लखनऊ को फख्र है। इस शहर की नजाकत, नफासत, रवायत को इन्होंने पहचान दी और एक मुकाम तक पहुंचाया। हालांकि, आपको यह जानकर हैरत होगी कि ये सभी कश्मीरी हैं, जो लखनऊ आए और यहीं के होकर रह गए।
लखनऊ की फिजा में घुली कश्मीरियत की खुशबू इन कश्मीरी पंडितों व मुसलमानों से ही है। इतिहासकार योगेश प्रवीण ने बताया कि जब लखनऊ को बसाया गया तो दो तरह के कश्मीरी यहां आकर बसे। कश्मीरी पंडित और कश्मीरी मुसलमान। कश्मीरी पंडितों ने कश्मीरी मुहल्ले में आशियाने बनाए, जबकि मुसलमानों ने शाहगंज में। दरअसल, कश्मीरी पहले फैजाबाद गए, जहां उनके पुरखे बसे। फिर जब 1774 में नवाब आसिफुद्दौला ने फैजाबाद को छोड़कर लखनऊ को राजधानी बना लिया तो सारे यहां आ गए।
बताया कि पंडित रतननाथ सरसार ने किताब ‘फसाना-ए-आजाद’ उर्दू में थी, जिसका मुंशी प्रेमचंद ने हिंदी में अनुवाद किया और नाम रखा ‘आजाद कथा’। नवल किशोर प्रेस में इसे छापा गया था। पंडित दयाशंकर नसीम, पं. बृजनारायण चकबस्त, पं. आनंद नारायण मुल्ला भी कश्मीरी ब्राह्मणों के घराने थे। गोलागंज में लाल कोठी आनंद नारायण मुल्ला का निवास है। इतिहासकार ने बताया कि दयाशंकर नसीम ने उर्दू शायरी के गुर सरायमाले खां में रहने वाले शायर आतिश से ही सीखे।
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लखनऊ की फिजा में घुली कश्मीरियत की खुशबू इन कश्मीरी पंडितों व मुसलमानों से ही है। इतिहासकार योगेश प्रवीण ने बताया कि जब लखनऊ को बसाया गया तो दो तरह के कश्मीरी यहां आकर बसे। कश्मीरी पंडित और कश्मीरी मुसलमान। कश्मीरी पंडितों ने कश्मीरी मुहल्ले में आशियाने बनाए, जबकि मुसलमानों ने शाहगंज में। दरअसल, कश्मीरी पहले फैजाबाद गए, जहां उनके पुरखे बसे। फिर जब 1774 में नवाब आसिफुद्दौला ने फैजाबाद को छोड़कर लखनऊ को राजधानी बना लिया तो सारे यहां आ गए।
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बताया कि पंडित रतननाथ सरसार ने किताब ‘फसाना-ए-आजाद’ उर्दू में थी, जिसका मुंशी प्रेमचंद ने हिंदी में अनुवाद किया और नाम रखा ‘आजाद कथा’। नवल किशोर प्रेस में इसे छापा गया था। पंडित दयाशंकर नसीम, पं. बृजनारायण चकबस्त, पं. आनंद नारायण मुल्ला भी कश्मीरी ब्राह्मणों के घराने थे। गोलागंज में लाल कोठी आनंद नारायण मुल्ला का निवास है। इतिहासकार ने बताया कि दयाशंकर नसीम ने उर्दू शायरी के गुर सरायमाले खां में रहने वाले शायर आतिश से ही सीखे।
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कश्मीरी मुहल्ले में मोतीलाल नेहरू खेलते थे शतरंज
योगेश प्रवीण ने बताया कि कश्मीरी पंडितों के लिए ही कश्मीरी मुहल्ला बसाया गया था। यहां मनोहर निवास हवेली है, जो पंडित मनोहर लाल शरगाह की थी। उनके बेटे बैकुंठ नाथ थे। पंडित मोतीलाल नेहरू जब भी लखनऊ आते तो कश्मीरी मुहल्ले जरूर जाते और वहां शतरंज खेलते थे। इतना ही नहीं कमला नेहरू भी कश्मीरी मुहल्ले में रही हैं। वह यहां के स्कूल में पढ़ी हैं।
कश्मीरियों ने बनवाए शिवालय व बाग
पुराने लखनऊ में कई शिवालय कश्मीरी ब्राह्मणों ने बनवाए हैं। रानी कटरा के बड़ा शिवालय की आज भी बहुत मान्यता है। इसमें कई शिवलिंग हैं। इसके अतिरिक्त राजाजीपुरम का कश्मीरी बाग कश्मीरियों की ही देन है।
कश्मीरी मुस्लिमों की कला थी ‘भांड’
योगेश प्रवीण ने बताया कि जो कश्मीरी मुस्लिम लखनऊ आए, वे शाहगंज में बसे। यहां उनकी बड़ी आबादी थी। दरअसल, ये कश्मीरी मुसलमान भांड (नाचने-गाने वाले) थे और इस कला को एक मुकाम तक पहुंचाने में इनका योगदान नकारा नहीं जा सकता। जहांगीर इस कला के आखिरी कलाकार थे, जो कश्मीरी थे।
कश्मीरियों ने बनवाए शिवालय व बाग
पुराने लखनऊ में कई शिवालय कश्मीरी ब्राह्मणों ने बनवाए हैं। रानी कटरा के बड़ा शिवालय की आज भी बहुत मान्यता है। इसमें कई शिवलिंग हैं। इसके अतिरिक्त राजाजीपुरम का कश्मीरी बाग कश्मीरियों की ही देन है।
कश्मीरी मुस्लिमों की कला थी ‘भांड’
योगेश प्रवीण ने बताया कि जो कश्मीरी मुस्लिम लखनऊ आए, वे शाहगंज में बसे। यहां उनकी बड़ी आबादी थी। दरअसल, ये कश्मीरी मुसलमान भांड (नाचने-गाने वाले) थे और इस कला को एक मुकाम तक पहुंचाने में इनका योगदान नकारा नहीं जा सकता। जहांगीर इस कला के आखिरी कलाकार थे, जो कश्मीरी थे।