आईएएस-आईपीएस में ठनी, आईपीएस बोले- क्राइम कंट्रोल करना पुलिस का काम, डीएम सिर्फ निगरानी करें
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पुलिस के कार्यक्षेत्र में आईएएस अफसरों की बढ़ती ‘घुसपैठ’ को लेकर प्रदेश के आईएएस और आईपीएस अफसर एक बार फिर आमने-सामने आ गए हैं। जिले में होने वाली क्राइम मीटिंग डीएम की अध्यक्षता में किए जाने के मुख्य सचिव के फरमान से यह स्थिति बनी है।
अब तक यह मीटिंग एसएसपी या एसपी करते थे। इसी तरह थानाध्यक्षों की तैनाती में भी डीएम की सलाह अनिवार्य कर दी गई है। इस मामले को लेकर आईपीएस एसोसिएशन ने मंगलवार को आपात बैठक बुलाई है। आईपीएस अधिकारियों का कहना है कि यह आदेश पुलिस विभाग के कार्यों में हस्तक्षेप है।
प्रशासनिक प्रमुख होने के नाते डीएम कानून-व्यवस्था की निगरानी तो कर सकते हैं, लेकिन जहां तक अपराध नियंत्रण का मामला है, तो यह सिर्फ पुलिस के क्षेत्राधिकार का मामला है। इस आदेश से पुलिस अधिकारियों का मातहतों पर नियंत्रण भी कमजोर पड़ सकता है।
उधर, आईएएस लॉबी का तर्क है कि यह व्यवस्था पहले से ही चली आ रही है। पुलिस मैनुअल में डीएम को ‘हेड ऑफ द क्रिमिनल एडमिनिट्रेशन’ माना गया है। जब डीएम, एडीएम या एसडीएम थाने का मुआयना कर सकता है तो क्राइम मीटिंग में डीएम की मौजूदगी को गलत नहीं माना जाना चाहिए। पहले भी थानेदारों की नियुक्ति डीएम की ही संस्तुति से होती थी।
डीजीपी दफ्तर ने जताई आपत्ति
जिले की क्राइम मीटिंग में डीएम की अध्यक्षता करने संबंधी आदेश पर डीजीपी दफ्तर ने भी आपत्ति दर्ज करा दी है। डीजीपी की ओर से शासन को भेजे गए पत्र में सुझाव दिया गया है कि डीएम कानून-व्यवस्था की समीक्षा तो कर सकते हैं, लेकिन क्राइम मीटिंग में डीएम की अध्यक्षता से पुलिस अधीक्षक की अथॉरिटी कमजोर होगी। अपराध नियंत्रण में भी दिक्कतें होंगी। शांति व्यवस्था कायम करने में मजिस्ट्रेट व सीओ के समन्वय से काम होना चाहिए।
अपने-अपने तर्क
आईपीएस एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रवीण सिंह का कहना है कि यह आदेश अव्यावहारिक है। क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन में एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेसी का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। एक-दो दिन में आईपीएस एसोसिएशन की बैठक करके इस मुद्दे पर विचार कर शासन को सुझाव भेजा जाएगा।
वहीं, आईएएस एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रवीर कुमार ने कह कि यह व्यवस्था तो बहुत पहले ही चली आ रही है। डीएम को जिले की सारी व्यवस्था के लिए जिम्मेदार माना जाता है। वैसे भी आईएएस व आईपीएस मिलकर काम करते हैं। इसे किसी के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं माना जाना चाहिए।